कृषि में पानी की खपत को कम करने की ज़रूरत

इस वर्ष 2025-26 में सामान्य वर्षों से ज़्यादा बारिश हुई है। पंजाब में तो अकेले जनवरी माह में ही आम वर्षों से 15 एम.एम. ज़्यादा बारिश हुई। ऐसा कई वर्षों के बाद होता है। धान-गेहूं के फसली चक्र के कारण कई वर्षों तक भू-जल का स्तर लगातार नीचे जाता रहा। लगभग सभी ब्लॉकों में नए ट्यूबवेल लगाने असम्भव हो गए हैं। धान की फसल के लिए भू-जल की ज़रूरत बहुत बढ़ गई। बोर गहरे करने पड़े। हरियाणा में भी भू-जल का स्तर बहुत कम हो गया और कई ब्लॉकों में स्थिति चिंताजनक हो गई। 
पंजाब में तो बड़े रकबे पर भू-जल का स्तर बहुत गिर गया था। ज़मीन में से पानी की निकासी पुनर्भरण (रिचार्ज) से ज़्यादा है। लगभग 70 प्रतिशत से ज़्यादा रकबे की सिंचाई ट्यूबवैल से की जाती है, शेष रकबे में सिंचाई का आधार नहर का पानी और बारिश है। धान की बढ़ रही काश्त के कारण कृषि के लिए पानी का समुचित उपयोग बहुत ज़रूरी है, जो कि नहीं हो रहा। मुफ्त बिजली मिलने की वजह से पानी की ज़रूरत न होने पर भी मोटरें चलती रहती हैं और पानी बर्बाद होता रहता है। शहरों और कस्बों में रहने वाली आबादी के लिए पीने के पानी की भी कमी होती जा रही है। पानी के इस संकट से बचने के लिए, जो पानी बर्बाद होता है, उसे रोकने के अतिरिक्त बारिश के पानी का पूरा इस्तेमाल करने के लिए उसे ज़मीन में रचाने की ज़रूरत है। धरती के 70 प्रतिशत हिस्से पर पानी है, लेकिन फिर भी इसका संकट बढ़ता जा रहा है।
पुराने समय में खेतों में फसलों की सिंचाई चरसों के ज़रिए की जाती थी। फिर कुओं से बैलों की मदद से पानी निकाल कर फसलों को दिया जाता रहा। बिजली आने के बाद किसानों ने मोटरें लगा लीं। फसलों की काश्त का रकबा बढ़ने से पानी की ज़रूरत भी बढ़ गई, जिसके बाद भू-जल का स्तर और नीचे चला गया। जो मोटरें पटे से चलती थीं, किसानों ने पंखों के साथ जोड़ कर चलानी शुरू कर दीं। पानी और गहरा होने के बाद कुएं भी अधिक गहरे करने पड़े। फिर बिजली की मोटरें और डीज़ल पम्प लगने शुरू हो गए और सबमर्सिबल पम्प लगने लगे।
सब्ज़ क्रांति के बाद धान-गेहूं का फसली चक्र शुरू होने से कृषि क्षेत्र में पानी की ज़रूरत और बढ़ गई। धान को अन्य फसलों के मुकाबले पानी की ज़रूरत ज़्यादा थी। किसान वैकल्पिक फसलें ढूंढने लगे। अधिक मुनाफे के लिए कुछ किसानों ने आलू और बसंत ऋतु की मक्की की फसलें लगाना शुरू कर दीं। लेकिन इन फसलों की भी पानी की ज़रूरत कम नहीं थी। फिर जिन किसानों ने गन्ना और सूरजमुखी जैसी फसलें लेनी शुरू कीं, उनके लिए भी धान से कम पानी की ज़रूरत नहीं थी। जहां दूसरे तरीकों से पानी बचाने की ज़रूरत है, वहीं बारिश के पानी का पुनर्भरण भी बहुत ज़रूरी है। किसानों ने मिट्टी डालकर जिन पुराने कुओं को बंद कर दिया है, उन्हें फिर से खोद कर बारिश के पानी का इस्तेमाल किया जा सकता है। मेड़ों पर धान लगाकर भी पानी बचाया जा सकता है। क्यारियां छोटी होनी चाहिएं। धान की सीधी बुआई से भी पानी बचता है। धान लगाने से पहले यदि खेत को लेज़र कराहे से समतल कर लिया जाए तो भी फसल को कम पानी की ज़रूरत है। विशेषज्ञों के अनुसार इस तरीके से 15 से 25 प्रतिशत पानी बचता है और खाद तथा नदीननाशक ज़्यादा प्रभावी होते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है। पंजाब सरकार द्वारा बनाए गए पंजाब प्रीज़र्वेशन ऑफ सब-स्वायल वॉटर एक्ट-2009  के तहत मध्य जून से पहले धान की काश्त नहीं की जा सकती। उसे पूरी तरह अपनाने से पानी की खपत कम होगी। धान की कम समय में पकने वाली किस्में जैसे नई विकसित पूसा-1824, पूसा-2090 और बासमती की पूसा बासमती-1509 आदि लगाने से भी पानी की बचत होगी और उत्पादन एवं आय में वृद्धि होगी। धान की दोनों नई किस्में (पूसा -2090 और पूसा 1824) पूसा-44 का विकल्प हैं और उससे बहुत कम समय लेती हैं और ज़्यादा आय देती हैं। इनकी बुआई से भी पानी की बचत होगी। इसके अलावा पीएयू की पी.आर.-126 जैसी पी.आर. किस्में भी उपलब्ध हैं। जिन महीनों में अधिक बारिश होती है, उन महीनों में पानी का अनावश्यक उपयोग न किया जाए। अतिरिक्त पानी जमा करके फसलों की सिंचाई के लिए रखा जाए। पंजाब सरकार के नहर विभाग द्वारा बनाए गए कुओं, जिनका पुनर्भरण नहीं किया जा रहा, उन्हें इस्तेमाल में लाया जाए।


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