बैंगन हो तो थाली बदल कर दिखाओ
किसी एक के चले जाने के बाद जो पीछे छूट गया वह कैसे मुर्दा और निर्जीव हो जाता है, यह बात आज की जी. ज़ेन पीढ़ी को समझ नहीं आएगी। जी. ज़ेन वो युवा पीढ़ी है जो इसी सदी में पैदा हुई और जो भीड़ तंत्र में विश्वास रखती है। अर्थात सड़कों पर हज़ारों की तादाद में निकल कर सामूहिक प्रहार के साथ अपने-अपने व्यक्तिगत हित को साधने का प्रयास करना। आज व्यक्तिगत हित प्रथम हो गये, और सामूहिक प्रहार के साथ सम्पूर्ण कायाकल्प कर पाना, अर्थहीन। आज जीवन दर्शन बदल गया है। इसे किसी भी उम्र के कोष्ठक के साथ संलग्न या सीमित क्यों करें?
आजकल लैला-मजनू, शीरीं-फरहाद के अचूक प्यार की कहानी किसी को समझ नहीं आती। इससे दुनियावी स्वार्थ की गन्ध को कहीं न कहीं तलाशने की चेष्टा अवश्य की जाती है। नहीं मिलती तो आरोपित कर दो।
आजकल हीर-रांझा की कहानी से लेकर जीतन मांझी तक के बावले प्रयास किसी को अपने नहीं लगते ‘तू नहीं और सही, और नहीं और सही’ की इस दुनिया में किसी व्यक्ति के किसी के प्यार में मिट जाने की कहानियां काल्पनिक लगती हैं। यह प्रेम रोमांस की अमर कहानी भी हो सकती है जिसमें एक हिस्सेदार चला गया, और दूसरा पानी न मिलने से सूख गये बिरवे की तरह धीरे-धीरे अस्तित्वहीन हो गया। वह उसके बिना जी न पाया, आज किसी को समझ नहीं आता। यह कहना कितना काल्पनिक लगता है जबकि यह ज़माना ‘आया राम गया राम’ का हो गया है, और इसे कानूनी से लेकर व्यवहारिक वैधता तक दे दी गई है। आज जो प्रेमी मौसम बदलने की तरह प्रेमिका बदलते हैं, या कोट बदलने की तरह अपनी पार्टी, उसे ही देख कर बूड़े बूढ़े कहते हैं, ‘बेटा होनहार है जनाब, कमा खायेगा।’
आज किसी की वेबफाई से आहत होकर गद्दारी कर दोगे, तो वह इसे जातीय सन्दर्भ देकर सामूहिक अपमान बता देगा और इस ओढ़ी हुई कट्टरता को हिंसक बना देने का प्रयास करेगा।
सिखाया जाने लगा है, ‘जनाब ज़माना बदल गया है, इसलिए अब सार्थक मूल्यों की जगह मूल्यहीनता के नये धर्म ग्रन्थ लिख लो।’ इसे विरोधार्य करके उस एक नयी संस्कृति का निर्माण कर लो, जिसे शार्टकट संस्कृति कहते हैं। गुरु चाणक्य का यह सूत्र वाक्य कि अपना काम साम, दाम, दण्ड, भेद किसी तरीके से साध लो, उनका मार्ग दर्शन करता है, और हथेलियों पर सरसों जमा कर दिखा देना इसका परिणाम। अगर कल के रंक रात गुज़रते ही राजा बन गये, तो ‘रात ने क्या-क्या रंग दिखाये’ कह देना अभीष्ट नहीं है, बल्कि यह रात तो कदम-कदम पर गिरगिट की तरह रंग बदलती रहे, और जो कल कहीं नहीं थे, वे आज अपनी बातूनी क्रांति, और सफलता के मिथ्या आंकड़ों के साथ ताजदार बने नज़र आते हैं और घोर परिश्रम और अध्यवसाय की गैर हाज़िरी सभी ओर से आती है। आज टेढ़ी उंगलियों से घी निकाल कर कटोरा भर लेने वाले लोग सीधी उंगली से घी निकालने की उम्मीद रखने वाले लोगों को बौड़म बता रहे हैं।
शोध और तकनीकी प्रगति के बिना ज्ञान की बटमारी का सृजन किया जाता है। व्यक्ति की मेधा के विकास की जगह कृत्रिम मेधा का उपहार दिया जाता है और सही शोध और प्रशिक्षित अध्यायपकों के मार्ग दर्शन के बगैर ज्ञान-जागरण के सड़क छाप हो जाने की कल्पना हो जाती है। देश डिजीटल हो गया, श्रम के लिए रोबोटों की कल्पना करने लगा और अपनी नई सफलता के विज्ञापनों के लिए सोशल मीडिया के लाइक्स बटोरने लगा। आज युवा पीढ़ी को नई डिग्रियां नहीं अपेक्षित बैंड चाहिए, और इसे आपको जुटा कर देने वाले सिद्धहस्त मसीहे। जब वे भी कुछ न कर पायें, तो देश के भगौड़े ‘डंकी’ बनने के लिए तैयार हैं।
चाहे दुर्गम रास्तों की मार से वे दूसरी दुनिया का टिकट कटा लें, या विदेशी सरहद पर पकड़े जाने पर हथकड़ी, बेड़ियों में वापस लौटने की नियति झेलें। इस नियति से कौन डरता है? एक बार नहीं तो बार-बार फिर उन्हीं सरहदों पर जाने का प्रयास वे करेंगे। सरहदें जो उन्हें प्रेमिका की नई खिड़की लगती हैं, तभी तो विश्वविद्यालयों के सही शिक्षण के परिसर उन्हें बेकार लगने लगे हैं, और किसी एक देसी प्रेमिका से इसी लक्ष्य तक जीना उन्हें घोर प्रतिक्रियवादी और उबाऊ लगता है। जी हां, इसीलिए तो बेपेंदे का लोटा हो जाना, और जाली डिग्रियों के बल पर सफल विद्वान बन जाना उन्हें नये समय की आवाज़ लगता है। आवाज़ जो अंधेरे कुओं से निकलती है और उनके लिए नये इन्द्र-धनुष रचती है।



