यह युद्ध क्या कभी खत्म होगा ?
आजकल आसमान से मेघ घिरने पर पानी की बरसात नहीं होती। आकाश में इन्सानियत की हत्या का चीत्कार ठिठका है। महाभारत में अग्नि बाण चलते थे। आज कोसों दूर से मौत की आग बरसाते हुए अग्निपुंज नहीं मिज़ाइल चलाये जाते हैं, और तबाही देश पर बरस जाती है। इन्सान अदना हो गया है, सिर्फ मरने वाला एक आंकड़ा बन गया है। एक ऐसी सूची कि जिसमें मरे हुए लोगों के नाम और पते को स्वीकार करना भी देश-द्रोही काम है। इसलिए एक दूसरे के लिए मौत बांटती ये ताकतें सूचियां नकारने के काम में लगी हैं। क्योंकि जितना अधिक स्वीकार करोगे, उतना ही युद्ध में अपने पक्ष की हानि का स्वीकार अपने आप हो जाएगा।
इसलिए युद्ध में इमारतों के टूटने की बात होती है, पुलों के टूटने की बात होती है। एक दूसरे की जान प्राण ऊर्जा के कुओं को नष्ट कर देने की बात होती है, लेकिन इनको बनाने वाले हाथों के नष्ट हो जाने की बात कोई नहीं कहता। एक दूसरे के स्कूलों, अस्पतालों, और जीने के वसीलों पर बम गिराये जाते हैं, ताकि इन्सान के एक दिन उठ कर इन्सानियत की दुहाई देने की बात ही न उठ सके कभी। लेकिन इसकी बात कोई नहीं कहता।
सदियों पहले महाभारत हुई थी, कारण था, एक अपमानित औरत ने किसी आततायी को ‘अंधे का पुत्र अन्धा’ कह दिया था। पांच गांव तो क्या सूई की नोक के बराबर जगह दूसरे अधिकारी पक्ष को न देने की बात हुई थी। तब महाभारत हुआ था। आज यह नया महाभारत क्यों हो रहा है? किसी को कोई खबर नहीं। अगर शत्रु देश में सत्ता परिवर्तन की बात है, तो जो लोग आंख का कांटा बने थे, उनको तो पहले ही दिन समाप्त कर दिया गया था। अगर वह देश परमाणु बम बना कर शक्तिशाली न बन जाये, मंतव्य था तो वह तो पहले ही चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं, कि नहीं हमारी मंशा परमाणु बम बनाने की कभी नहीं रही। क्या हम अपनी दौलत का अपनी बेहतरी के लिए भी इस्तेमाल नहीं कर सकते?
जवाब मिलता है नहीं कर सकते। इसे हमारे हवाले कर दो क्योंकि हम बहुत ताकतवर हैं, और तुम्हें बताएंगे कि तुम्हें कैसे जीना है? ‘वैसे भी जो पिछड़ा हुआ है, उसे पिछड़ा ही रहना चाहिए क्योंकि उसकी तरक्की समृद्धि के लिए संकट है।’ ऐसा एक अलिखित नियम इस दुनिया में चलता है।
खैर यह युद्ध तो एक न एक दिन खत्म हो ही जाएगा। लेकिन ऐसा ही एक बड़ा युद्ध हम सड़क पर चलते लोग दिन-रात झेलते हैं। इसका खात्मा कब होगा?
ईरान और अमरीका का युद्ध छिड़ा और पहले ही दिन लड़कियों के एक स्कूल पर बम गिरा दिया गया। लगभग पौने दो सौ बच्चियां अपनी जान से हाथ धो बैठीं। हमारा देश इसमें संलिप्त नहीं, लेकिन हमारे शिक्षालयों पर इस जैसा एक बम रोज़ गिरता है, और शायद यह युद्ध खत्म होने के बाद भी गिरता रहेगा। हमने देश को डिजिटल बना दिया। कृत्रिम मेधा के ज़माने में हम कहीं पीछे नहीं रहे। शिक्षा से भी जागरूकता पैदा कर दी है। दावा है अब प्राइमरी स्तर पर हमारे लगभग सभी बच्चे स्कूल में जाते हैं, नया आंकड़ा है परन्तु सिर्फ प्राइमरी स्तर तक। इसके बाद मिडल या हायर सैकेंडरी स्तर तक आते-आते हमारे आधे बच्चे स्कूलों से भागने के लिए मजबूर हो जाते हैं, और अपना या अपने घर का पेट पालने के लिए घरों, दुकानों या ढाबों पर मुण्डूया या सेवा की नौकरी करते नज़र आते हैं, क्योंकि स्कूलों में जो पढ़ाया, उसका दैनिक जीवन की वीभत्स कुरूपताओं से कोई संबंध नहीं। आबादी रोज़ बढ़ती है, लेकिन नौकरियां बढ़ती नहीं बल्कि रिटायर होने पर खाली हो रही आसामियों को भी कच्ची नौकरियों से भरा जाता है। कुछ पक्की नौकरियां निकलती हैं तो पहले तीन साल आय के रूप में केवल मूल वेतन मिलता है, पूरा वेतन भत्तों सहित तीन साल के बाद शुरू होता है। यह मुफलिसी सही नहीं जाती। बच्चे स्कूलों-कालेजों से भाग निकलते हैं। जीने का निम्नतम स्वीकार करते हुए सस्ते राशन की दुकानों के बाहर कतार सजाते हैं। स्कूल, कालेज खाली हो रहे हैं। यह क्या ईरान के एक स्कूल में बम गिरने के बाद लड़कियों की ज़िन्दगियां फौत हो जाने से कम है? वहां तो एक स्कूल की बच्चियां मरीं, यहां तो पूरी शिक्षा प्रणाली में शिक्षा की डिग्रियां लेकर मरे हुए बच्चे सड़कों पर भटकने के लिए मजबूर हो रहे हैं। इन डिग्रियों का आने वाले कम्प्यूटर और चिप युग में कोई मोल नहीं। हां, देश में अनुदान और रेवड़ियां बांटने की नीतियां हैं, रोज़गार नीति कोई नहीं। समस्या का समाधान न बमों से लड़े जा रहे उस युद्ध में नज़र आ सकता है, न लाखों नौजवानों को निठल्ला बना रहे इस अघोषित युद्ध में कहीं।
क्योंकि आने वाले युग वैज्ञानिक, स्वचालित, और रोबोटों द्वारा महा-आधुनिक युद्ध हैं। अब देश में रोबोट काम करेंगे तो नौजवान क्या करेंगे? देश की बेकार संस्कृति का एक हिस्सा बनते हुए रेवड़ियों के रूप में सस्ता राशन बांटने वाली दुकानों के सामने कतार लगाएंगे। आपने नौकरशाही को खत्म करके सुविधा केन्द्र बना दिये, लेकिन साथ ही कदम-कदम पर दलाल और शार्टकट संस्कृति भी खड़ी कर दी। आपके सुविधा केन्द्रों के सर्वर बिगड़े रहते हैं, और आप दलालों का पता पूछ रहे हैं। इस सांस्कृतिक युग को आपने इसे शार्टकट संस्कृति का नाम दे दिया। अरे ईरान-अमरीका युद्ध तो खत्म हो जाएगा, लेकिन इस फटीचर होती जा रही भ्रष्ट ज़िन्दगी से कभी छुटकारा होगा कि नहीं? इसका तो युद्ध ही नहीं लड़ा गया, छुटकारा कैसे होगा।



