पानी का मोल पहचानिए
जल को अब ‘ब्लू गोल्ड’ कहा जा रहा है। हम गोल्ड (सोना) को संभालने और ध्यान रखने में एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रहे हैं, लेकिन जल जो उतना ही कीमती है, उसके प्रति इतने सजग और जागरूक नज़र नहीं आते। इस लापरवाही की भारी कीमत भविष्य में चुकानी पड़ सकती है।
भारत में 45 से 50 प्रतिशत पुरुष खेती के काम पर निर्भर करते हैं। पानी की कमी करोड़ों किसानों व मज़दूरों की आय को प्रभावित करती है। उनके परिवार का भी होना न होना जल पर ही निर्भर है। पूरे देश में दस हज़ार से पन्द्रह हज़ार किसान आत्महत्या कर रहे हैं जिसके पीछे कर्ज, फसल नुकसान और जल संकट जैसे कारण होते हैं। जल संकट से फसलों को भारी नुकसान पहुंच सकता है और यह नुकसान अन्तत: परिवार पर आफत बन कर टूटता है। जल संकट में किसानी ही नहीं, उद्योग भी प्रभावित होते हैं। इस विश्व में 20 प्रतिशत ताजा पानी उद्योगों में इस्तेमाल होता है। जल संकट उत्पादन संकट और रोज़गार संकट को जन्म दे सकता है। विश्व बैंक ने अनुमान लगाया है कि आगामी कई दशकों तक यानी 2030 तक केवल जल संकट की वजह से ही भारत की जी.डी.पी. में 6 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।
अनुपम मिश्र एक जाने-माने पर्यावरणविद् थे। वह इस दिशा में तब से काम कर रहे थे जब देश में पर्यावरण रक्षा के लिए कोई विभाग तक नहीं था। उनके प्रयत्न से ही अलवर में जोकि सूखा ग्रस्त माना जाता था, जल संरक्षण का काम हुआ। सूख चुकी अरवरी नदी के पुनर्जीवन में उनकी कोशिश प्रशंसनीय मानी गई।
उनकी किताब ‘आज भी खरे हैं तालाब’ तेरह भाषाओं में प्रकाशित हो चुकी है। कहते हैं-हमारे कलेंडर और प्रकृति के कलेंडर में बहुत अंतर होता है। इस अंतर को न समझ पाने के कारण हम कभी किसी साल बरसात में खुश होते हैं, तो किसी साल बहुत उदास हो जाते हैं, लेकिन प्रकृति ऐसा नहीं सोचती। उसके लिए चार महीने की बरसात एक वर्ष में आठ महीनों की छोटी-छोटी बातों पर निर्भर करती है। प्रकृति को इन सब बातों का गुणा-भाग कर अपना फैसला लेना होता है। प्रकृति को ऐसा नहीं लगता लेकिन हमें ज़रूर लगता है कि अरे! इस साल पानी कम गिरा या फिर, लो इस साल तो हद से ज्यादा पानी बरस गया। जैसे पंजाब में पिछले वर्ष बाढ़ से गांवों के गांव बह गये थे।वक्त के साथ विकास के नए मॉडल में तालाब अपना अस्तित्व खोते चले गये। आंकड़े बताते हैं कि 1947 के समय देश में 24 लाख तालाब थे। 2017-18 से ही सिमट कर यह संख्या लगभग 5 लाख ही रह गई है जिनमें 20 प्रतिशत बेकार पड़े हैं। हम तालाबों को बचाकर रखना भूल ही गए हैं। अब हालत यह है कि राजधानी दिल्ली सहित देश के अन्य भागों में पानी की किल्लत बनी रहती है। तालाब कहीं कब्ज़े, तो कहीं अतिक्रमण, कहीं गंदगी, कहीं तकनीकी अभाव में सूखते चले जा रहे हैं।
भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक परम्परा में जल का संरक्षण करना हर व्यक्ति का परम कर्त्तव्य है। जब तक यह परम्परा थी देश में पानी की किल्लत नहीं थी। पानी सहेजने की पुरानी भारतीय परम्परा है। पानी के अत्याधिक दोहन और खप्त बढ़ने के कारण पिछले तीस-चालीस वर्षों में पानी की समस्या तेज़ी से बढ़ी है। संकट स्पष्ट है। सवाल यह है कि इस संकट का समाधान कैसे होगा? पहले हम सभी को सजग रहना होगा। पानी के फिजूल बहाव को रोकना होगा। सरकारों को इस कार्य के लिए सुनिश्चित योजना के साथ आगे आना होगा।



