अलग-थलग होते जा रहे ट्रम्प
28 फरवरी से अमरीका-इज़रायल और ईरान के बीच शुरू हुए युद्ध को 34 दिन बीत हो चुके हैं। इस समय में लगातार बमबारी के कारण ईरान के ज्यादातर वरिष्ठ नेता और जरनैल मारे जा चुके हैं। इसके तेल प्लांट और व्यापक स्तर पर मूलभूत ढांचे का विनाश हो गया है। चाहे ट्रम्प ने लगातार ये बयान दिए हैं कि वह अभी तक इसलिए ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर हमला नहीं कर रहे, क्योंकि इससे विश्व भर में तेल की सप्लाई में भारी कमी आ जाएगी, परन्तु इसके बावजूद अमरीकी मिसाइलें तेहरान के साथ-साथ अन्य बड़े ईरानी शहरों को निशाना बनाए जा रही हैं। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप ईरान ने भी लगातार इज़रायल और खाड़ी देशों पर अपनी मिसाइलों से हमले जारी रखे हुए हैं। सऊदी अरब, यू.ए.ई., बहरीन और कुवैत के तेल प्लांटों के साथ-साथ खाड़ी देशों में स्थित अमरीकी अड्डों को भी अपना निशाना बनाया जा रहा है।
चाहे ट्रम्प के अपने देश अमरीका में भी उनके विरुद्ध व्यापक स्तर पर प्रदर्शन होने शुरू हो गए हैं परन्तु इसके बावजूद राष्ट्रपति लगातार अपने हमले जारी रख रहे हैं। 2 अप्रैल को उन्होंने राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कुछ ऐसी बातें कही हैं, जिनसे जल्दी कहीं युद्ध के खत्म होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। चाहे उन्होंने यह कहा कि अमरीका अपने लक्ष्य को पूरा करने के निकट है परन्तु साथ ही कहा कि अगले 2-3 सप्ताह तक वह ईरान पर और भीषण हमले करेगा। युद्ध शुरू होने के समय उन्होंने युद्ध का समय 4-5 सप्ताह तक निर्धारित किया था, जिसे अब उन्होंने दो-तीन सप्ताह और बढ़ा दिया है। इस सम्बोधन में उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वह होर्मुज जलडमरू को ईरान से आज़ाद नहीं करवाएंगे और यह भी कहा कि जिन देशों ने होर्मुज जलडमरू द्वारा तेल लेना है, वह स्वयं वहां जाएं। इससे एक तरह से वह इस बात से पीछे हट गए हैं। यह समुद्री रास्ता ऐसा है, जिससे विश्व के 20 प्रतिशत कच्चे तेल की सप्लाई होती है। ज्यादातर खाड़ी देश भी इस रास्ते द्वारा ही कच्चे तेल का निर्यात करते हैं। ट्रम्प ने यह भी कहा कि उन्होंने कभी भी ईरान में सत्ता परिवर्तन की बात नहीं की परन्तु नए नेता आने से सत्ता में परिवर्तन हो गया है। यह भी कि ईरानी सरकार गिरने में अभी समय लगेगा और यदि बातचीत सफल नहीं होती तो वह ईरान के पॉवर ग्रिड पर भी हमले करेंगे।
इस युद्ध में ईरान और खाड़ी देशों के समुद्री पानी को मीठे पानी में बदलने वाले प्लांट यदि तबाह हो जाते हैं तो पश्चिम एशिया में भारी संख्या में लोगों को पीने वाला पानी उपलब्ध नहीं होगा। दूसरी ओर ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने कहा है कि ईरान अपना संघर्ष जारी रखेगा और यह भी कहा कि अढ़ाई सौ वर्ष पहले बना अमरीका ईरान की 7000 वर्ष की पुरातन सभ्यता को तबाह नहीं कर सकता। इससे स्पष्ट है कि ईरान दृढ़ता से हर कीमत पर अमरीकी हमलों का मुकाबला करेगा। विश्व भर के देशों के लिए इस युद्ध ने अनेकानेक समस्याएं पैदा कर दी हैं। यदि यह युद्ध लम्बा चलता है तो हर तरफ आर्थिक संकट खड़ा हो जाएगा। ट्रम्प ने यूरोप के नाटो देशों को भी यह कहा था कि वह ईरान से होर्मुज जलडमरू का कब्ज़ा समाप्त करवाने के लिए उसकी मदद करें, परन्तु इन सभी देशों ने अमरीका के साथ इस युद्ध में कूदने से इनकार कर दिया है। इसलिए ट्रम्प ने अपने सम्बोधन में नाटो सहयोगियों के इनकार पर निराशा प्रकट की है और स्वयं को नाटो से अलग कर लेने की धमकी भी दी है, परन्तु इसके साथ ही उन्होंने अमरीकी विशेष ऑपरेशन में शामिल किए जाने वाले बड़ी संख्या में जल सैनिक और पैराशूटर मध्य पूर्व में भेज दिए हैं। ट्रम्प ने ईरान के खार्ग द्वीप को तबाह करने की भी धमकी दी है, जिसके द्वारा ईरान 90 प्रतिशत तेल निर्यात करता है।
अमरीकी राष्ट्रपति की इन मनमज़र्ी की कार्रवाइयों से निराश विश्व के बड़े देश इस नाज़ुक स्थिति से निकलने के लिए एकजुट हो रहे हैं। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर ने 35 देशों को विचार-विमर्श के लिए बुलाया है, जिसके लिए भारत को भी निमंत्रण दिया गया है। फ्रांस के साथ-साथ चीन ने भी इस बैठक में शामिल होने की इच्छा प्रकट की है। यहां तक कि खाड़ी देश यू.ए.ई., ओमान और बहरीन ने भी इस बातचीत के लिए सहमति दी है। इस तरह से अमरीकी राष्ट्रपति अलग-थलग होते दिखाई दे रहे हैं, परन्तु ऐसा होने पर भी क्या इस विनाशकारी युद्ध को समेटा जा सकेगा? इस संबंध में बड़ी अनिश्चितता बनी हुई है। भारत के लिए भी यह लम्बा होता युद्ध चिंता का विषय है, जिसके लिए उसे प्रत्येक पक्ष से सतर्क और तैयार रहने की ज़रूरत होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

