अमरीका-इज़रायल का भंवर

ईरान से अमरीका-इज़रायल का युद्ध लम्बा खिंच रहा है और मौजूदा हालात को देखते हुए अमरीका-इज़रायल मुश्किल में नज़र आ रहे हैं। ईरान अपने शीर्ष नेता को खो देने के बावजूद युद्ध क्षेत्र में आक्रामक नज़र आ रहा है। अगर युद्ध जल्दी समाप्त नहीं होता तो अमरीका और इज़रायल के संकटों में कोई कमी नहीं आने वाली।
ट्रम्प के खिलाफ अमरीका में भारी रोष उठने लगा है। ट्रम्प के ईरान युद्ध में शामिल होने के फैसले, इमिग्रेशन नीतियों और रहन-सहन की कीमतों में इज़ाफा होने के विरोध में अमरीका के 50 राज्यों में विरोध का स्वर तीव्र होने लगा है। आयोजकों ने ‘नो किंग्स’ के विरोध प्रदर्शन को हथियार बनाते हुए अमरीका के लाखों लोगों को विरोध प्रकट करने के लिए इकट्ठा कर लिया। ट्रम्प प्रशासन के विरुद्ध 3000 से अधिक ‘नो किंग्स’ प्रदर्शन एक दर्जन अन्य देशों में भी हुआ।
इस तेज़ी से बदलते युद्ध में हालात लगातार अमरीका और इज़रायल के खिलाफ होते चले गये हैं। उनके सामने होर्मुज जलडमरू मध्य की ईरान द्वारा नाकाबंदी ने विकट समस्या पैदा कर दी। अब अल मंदेब जलमार्ग भी बंद होने की अंदेशा पैदा हो गया है। यदि यही हुआ तो लाल सागर से होकर जाने वाला समुद्री रास्ता भी बंद हो जाएगा। होर्मुज के कारण दुनिया का व्यापार पहले से ही ठप्प हो रहा है। अल मंदेब के कारण ग्लोबल अर्थ व्यवस्था की तबाही निश्चित होगी। ट्रम्प और नेतन्याहू की जुगलबंदी का खामियाज़ा पूरी दुनिया को भुगतना पड़ रहा है। अगर यह युद्ध जल्दी बंद नहीं होता तो दुनिया भर के देशों की अर्थ-व्यवस्था चरमराने लगेगी। एक तरफ तो ईरान की तरफ से मिसाइलें दनादन इज़रायल पर गिर रही हैं। मध्य पूर्व में अमरीकी अड्डे तबाह हो रहे हैं। दूसरी तरफ हूती विद्रोहियों के ज़रिये अल मंदेब भी बंद होने वाला है। हूती खुद को अमरीका, इज़रायल और यहूदियों का दुश्मन मानते हैं और नारा लगाते हैं ‘अमरीका का खात्मा हो, इज़रायल का खात्मा हो।’ उन्हें ईरान से हथियार, ट्रेनिंग और मिसाइ-ड्रोन तकनीक मिलती है। वे लाल सागर में सैकड़ों जहाज़ों पर हमले कर चुके हैं।डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोपियन देशों से होर्मुज क्षेत्र को सुगम बनाने के लिए मदद मांगी थी, परन्तु नतीजा अच्छा नहीं निकला। ट्रम्प बेहद बौखलाहट में आ गए लगते हैं।
यमन के एक बड़े हिस्से पर हूती बागियों ने कब्ज़ा किया हुआ है। वर्ष 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी साना सहित काफी बड़े इलाके पर कब्ज़ा कर लिया था जिससे खाड़ी देशों के लिए और भी बड़ी चुनौती पैदा हो गई थी। हूतियों की अभी-अभी युद्ध में एंट्री हुई है। आगे क्या होने वाला है वह अमरीका-इज़रायल की प्रतिक्रिया और ईरान की रणनीति पर निर्भर करेगा।
उधर स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज जिनका संबंध स्पेन की स्पैनिश सोशलिस्ट वर्कर्स पार्टी से है, उन्होंने बड़ी स्पष्टता के साथ ट्रम्प और नेतन्याहू की कड़ी आलोचना की है। उनका मुख्य नज़रिया ‘नो टू वार’ जैसे जुमले के इर्द-गिर्द संगठित है। वह अन्तर्राष्ट्रीय कानून का सम्मान करने और शांतिपूर्ण, कूटनीतिक समाधान की वकालत करते हैं। वह अमरीका और इज़रायल की सैन्य कार्रवाइयों को अवैध, अनुचित और ़खतरनाक मानते हैं।  अब इस युद्ध में पानी को आग लग रही है। खाड़ी देशों में  पलायन का खतरा बढ़ रहा है। 

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