फायर ब्रांड योद्धा से बिहार के ‘सम्राट’ तक
नितीश युग के अंत के साथ ही बिहार को नया ‘सम्राट’ मिल गया है। मुख्यमंत्री पद पर सम्राट चौधरी का पहुंचना हाई कमान की पसंद और विधायकों को साधने की कला के साथ आक्रामक अंदाज की राजनीति, राजनीतिक अनुभव की पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ हमेशा एक नए युद्ध के लिए तैयार रहने की प्रवृत्ति का पारितोषिक कहा जा सकता है। सम्राट चौधरी का अभ्युदय बिहार की सियासत में अचानक नहीं, बल्कि लंबी राजनीतिक भटकनों, गठबंधनों और महत्वाकांक्षाओं की सीढ़ियां चढ़ते हुए हुआ है। उनका राजनीतिक सफर सरल रेखा में नहीं, बल्कि टेढ़े-मेढ़े रास्तों, सत्ता के समीकरणों और अवसरों की पहचान से बुना गया एक जटिल राजनीतिक सफर है, जिसमें विरासत, विद्रोह, विवाद, राजनीति के व्यवहारवाद को समझने की कला के साथ पढ़ने लड़ने और मंजिल पाने तक की ज़िद शामिल है।
सम्राट चौधरी के पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के चर्चित और प्रभावशाली नेता रहे, जिनकी पकड़ खासकर पिछड़े वर्ग की राजनीति में मजबूत मानी जाती थी। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने सम्राट को राजनीति का शुरुआती संस्कार तो दिया, लेकिन साथ ही यह दबाव भी कि उन्हें अपने नाम से पहचान बनानी होगी, सिर्फ पिता की विरासत से नहीं। बचपन से ही राजनीतिक माहौल में पले-बढ़े सम्राट के लिए सत्ता के गलियारों की भाषा नई नहीं थी, परन्तु उसे साधना आसान भी नहीं था। सम्राट चौधरी का झुकाव किताबों से ज्यादा सत्ता की चालों को समझने में रहा। यही वजह रही कि छात्र जीवन में ही वह राजनीतिक गतिविधियों से जुड़ गए। यह जुड़ाव वैचारिक कम और व्यावहारिक अधिक था। जहां अवसर दिखा, वहां कदम बढ़ाया, यही प्रवृत्ति आगे चलकर उनके पूरे राजनीतिक करियर की पहचान बनी।
बिहार के नए मुख्यमंत्री कई दलों के बीच झूलते रहे हैं। शुरुआत राष्ट्रीय जनता दल से की जो उस समय बिहार की सबसे प्रभावशाली ताकत थी। लालू प्रसाद यादव के दौर में आरजेडी के साथ जुड़ना एक सुरक्षित राजनीतिक निवेश माना जाता था लेकिन सम्राट की महत्वाकांक्षा सिर्फ एक सीमित भूमिका में सिमटने वाली नहीं थी। समय के साथ उन्होंने दल बदला और जनता दल (यूनाइटेड) का रुख किया जहां उन्हें सत्ता के करीब आने का मौका मिला हालांकि, यह ठहराव भी ज्यादा दिन नहीं चला। बिहार की राजनीति में अवसरों की तलाश करते हुए उन्होंने अंतत: भाजपा का दामन थामा और यहीं से उनके राजनीतिक कैरियर को नई दिशा मिली। उन्होंने खुद को एक आक्रामक और मुखर नेता के रूप में स्थापित किया। उनकी भाषा में धार थी, बयानबाजी में आक्रामकता और विरोधियों पर हमला करने में कोई संकोच नहीं। यही शैली उन्हें भाजपा के भीतर तेजी से ऊपर ले गई लेकिन इसी ने उन्हें विवादों के केंद्र में भी रखा।सम्राट चौधरी और विवादों का चोली दामन का साथ रहा है। उनके बयानों ने अक्सर राजनीतिक तापमान बढ़ाया है चाहे वह जातीय समीकरणों पर टिप्पणी हो या विपक्षी नेताओं पर व्यक्तिगत हमले। आलोचकों का कहना है कि उनकी राजनीति मुद्दों से ज्यादा उत्तेजना पैदा करने पर आधारित रही है। वहीं समर्थक इसे उनकी ‘बेबाकी’ और ‘स्पष्टवादिता’ बताते हैं लेकिन यह भी सच है कि बिहार जैसे संवेदनशील सामाजिक ताने-बाने वाले राज्य में इस तरह की राजनीति अक्सर आग से खेलने जैसी होती है। जब उन्होंने खुद को ‘माथे पर भगवा बांधने वाला’ नेता बताया और कहा कि वह तब तक इसे नहीं उतारेंगे जब तक उनकी राजनीतिक लड़ाई पूरी नहीं होती। इस बयान ने उन्हें भाजपा के कोर वोटबेस में लोकप्रिय तो बनाया, लेकिन साथ ही उन्हें एक कट्टर छवि में भी ढाल दिया। यह छवि उनके लिए लाभ और नुकसान दोनों का कारण बनी।
उनकी राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए बिहार की राजनीति को समझना जरूरी है। यहां जाति, गठबंधन और व्यक्तिगत समीकरण सत्ता की चाबी तय करते हैं। उन्होंने इन तीनों को साधने की कोशिश की। कुशवाहा समुदाय से आने वाले सम्राट ने अपने जातीय आधार को मजबूत करने के साथ-साथ भाजपा के व्यापक संगठनात्मक ढांचे का लाभ उठाया। यही संयोजन उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले जाने वाली सीढ़ी बना लेकिन यह सफर बिना विरोध के नहीं रहा। पार्टी के भीतर भी कई बार उनके नेतृत्व पर सवाल उठे। कुछ वरिष्ठ नेताओं को उनका तेजी से उभरना रास नहीं आया। वहीं विपक्ष ने उन्हें ‘दल-बदलू’ करार दिया-एक ऐसा नेता जो सत्ता के लिए किसी भी हद तक जा सकता है। इन आरोपों का जवाब सम्राट ने हमेशा आक्रामक अंदाज में दिया, कभी सफाई नहीं, बल्कि पलटवार किया। बिहार के नए मुख्यमंत्री की व्यक्तिगत ज़िंदगी अपेक्षाकृत सादगीपूर्ण रही है लेकिन राजनीतिक जीवन में उनकी छवि एक आक्रामक योद्धा की रही है। परिवार से मिले राजनीतिक संस्कारों को उन्होंने अपने तरीके से ढाला-जहां भावनाओं की जगह रणनीति ने ली और विचारधारा की जगह सत्ता के गणित ने। अब जब वह मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति की जीत नहीं, बल्कि उस राजनीति की भी जीत है जो लचीलापन, अवसरवाद और आक्रामकता को एक साथ लेकर चलती है।
फिलहाल, उनकी कहानी एक ऐसे नेता की है जिसने रास्ते खुद चुने, जोखिम खुद उठाए और अब सत्ता की सबसे ऊंची सीढ़ी पर खड़ा है जहां से गिरावट भी उतनी ही तेज होती है जितनी चढ़ाई। मुख्यमंत्री बनने के बाद अब उनकी प्रमुख चुनौती होगी सुशासन बाबू की खींची गई बड़ी लकीर से आगे जाकर काम करना। बिहार के राजनीतिक समीकरणों को साधे रखने के साथ-साथ पार्टी के अंदर से मिलने वाली चुनौतियां को भी उन्हें झेलना होगा और किसी भी क्षण पलटी मार जाने वाले नितीश कुमार पर भी निगाह रखनी होगी क्योंकि वह पता नहीं कब तख्त उलट दें। अभी तो नितीश कुमार ने उनके कंधे पर हाथ रखा है। कब उनकी गद्दी पर भी हाथ रख दें, इसका भरोसा नहीं। अस्तु, बिहार की जटिल राजनीति में सम्राट को सोने का मुकुट नहीं, कांटों का ताज मिला है। अब देखना यह है कि बिहार का यह नया चौधरी कैसे खुद को एक प्रेरक सम्राट के रूप में स्थापित करता है।



