ईरान व अमरीका-इज़रायल युद्ध के कारण गैस आधारित ऊर्जा संयंत्रों में उत्पादन ठप्प
जलवायु परिवर्तन के घातक संकेतों के चलते दुनिया गैस आधारित ऊर्जा उत्पादन की ओर तेजी से बड़ी थी। किन्तु पहले रूस-यूक्रेन, इज़रायल-फिलीस्तीन और अब अमरीका-इज़रायल और ईरान युद्ध ने ऐसे विकट हालात पैदा कर दिए हैं कि दुनिया ऊर्जा संकट की कमी झेलने लगी है। अतएव जिन देशों ने ऊर्जा उत्पादन के गैस आधारित उपाय कर लिए थे, वे अब अपने कोयले से चलने वाले बंद पड़े ऊर्जा संयंत्रों को चालू करने की तैयारी में जुट गए हैं। क्योंकि इस युद्ध में तेल भंडारों के साथ गैस से बनने वाली बिजली संयंत्रों पर युद्ध के दौरान बड़े हमले हुए है। ईरान ने पश्चिम एशियाई देशों में स्थित अनेक ऊर्जा संयंत्रों को बड़ा नुकसान पहुंचाया है। दूसरी तरफ अमरीका एवं इज़रायल ने ईरान के परमाणु और गैस ऊर्जा संयंत्रों को ध्वस्त कर दिया है। इस गल्फ वार ने दुनिया में गैस की किल्लत पैदा कर दी है। नतीजतन जापान, जर्मनी, बांग्लादेश, नीदरलैंड, पोलैंड व चेक गणराज्य जैसे देशों ने जीवाश्म ईंधन, अर्थात कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों को फिर से चालू करने का निर्णय ले लिया है। जबकि ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 से यूरोप में कोयले से बिजली बनाने की क्षमता में 45 प्रतिशत की गिरावट आ गई थी।
दुनिया की उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं को लंबे समय से गैस आधारित बिजली को एक ‘ब्रिज फ्यूल’ के तौर पर बेचा जाता था। अर्थात कोयले का एक ऐसा स्वच्छ विकल्प मिल गया था, जो सस्ता होने के साथ भरोसे का भी है। इसके प्रयोग में कार्बन का उत्सर्जन भी शून्य रहता है। अतएव ऊर्जा उत्पादन में इसकी उपयोगता निरंतर बढ़ रही थी, लेकिन ऊर्जा संयंत्रों पर हमलों के चलते गैस का संकट लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में इंटरनेशनल ऊर्जा एजेंसी का दावा है कि गैस की कमी और उसकी बढ़ती कीमतों के चलते सरकारें, उद्योग और घर-परिवार दूसरे विकल्पों की तालाश करेंगे। इसलिए कोयले का इस्तेमाल होना तय है। कोयले से बिजली बनेगी तो कॉर्बन का भी बड़ी मात्रा में उत्सर्जन होगा। गैस की कमी के चलते यूरोप और एशिया के कई देश कोयले से बिजली उत्पादन को मज़बूर हो जाएंगे। दुनिया के सबसे बड़े गैस आयातक देशों में से एक जापान ने कह दिया है कि हम कोयला आधारित ऊर्जा संयंत्रों को चालू करने जा रहे हैं। यूरोपीय देश भी 20 प्रतिशत से अधिक बिजली का उत्पादन कोयले से करने लग जाएंगे। इससे वायुमंडल में बढ़ते तापमान के वैश्विक उपायों को बड़ा झटका लग सकता है।
2018 का ऐसा वर्ष था, जब भारत और चीन में कोयले से बिजली उत्पादन में कमी दर्ज की गई थीं। नतीजतन भारत पहली बार इस वर्ष के ‘जलवायु परिवर्तन प्रदर्शन सूचकांक’ में शीर्ष दस देशों में शामिल हो गया था। वहीं अमरीका सबसे खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में शामिल हुआ था। स्पेन की राजधानी मैड्रिड में ‘कॉप 25’ जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई थी। रिपोर्ट के अनुसार 57 उच्च कार्बन उत्सर्जन वाले देशों में से 31 में उत्सर्जन का स्तर कम होने के रुझान इस रिपोर्ट में दर्ज थे। उन्हीं देशों से 90 प्रतिशत कार्बन का उत्सर्जन होता रहा है। इस सूचकांक ने तय किया था कि कोयले की खपत में कमी सहित कार्बन उत्सर्जन में वैश्विक बदलाव दिखाई देने लगे हैं। इस सूचकांक में चीन में भी मामूली सुधार हुआ था। नतीजतन वह 30वें स्थान पर रहा है। जी-20 देशों में ब्रिटेन 7वें और भारत को 9वीं उच्च श्रेणी हासिल हुई थी। जबकि आस्ट्रेलिया 61 और सऊदी अरब 56वें क्रम पर हैं। अमरीका खराब प्रदर्शन करने वाले देशों में इसलिए आ गया था, क्योंकि उसने जलवायु परिवर्तन की खिल्ली उड़ाते हुए इस समझौते से बाहर आने का निर्णय ले लिया था।
दुनिया की लगभग 37 प्रतिशत बिजली का निर्माण थर्मल पावरों में किया जाता है। इन संयंत्रों की भट्टी में कोयले को झोंका जाता है, तब कहीं जाकर बिजली का उत्पादन होता है। ब्रिटेन में हुई पहली औद्योगिक क्रांति में कोयले का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। 1500 ईंसवीं में बड़ी मात्रा में कोयले के उत्खनन की शुरूआत हुई थी। इसके बाद जिन देशों में भी कारखाने लगे, उनमें लकड़ी और कोयले का प्रयोग लंबे समय तक होता रहा। दुनिया की रेलें भी कोयले से ही लंबे समय तक चलती रही हैं। भोजन पकाने और ठंड से बचने के उपाय भी लकड़ी जलाकर किए जाते रहे हैं। अतएव धुएं के बड़ी मात्रा में उत्सर्जन और धरती के तापमान में वृद्धि की शुरुआत औद्योगिक क्रांति की बुनियाद रखने के साथ ही आरंभ हो गई थी। इसके बाद जब इन दुष्प्रभावों का अनुभव पर्यावरणविदों ने किया तो 14 जून 1992 में रियो डी जनेरियो में पहला अंतर्राष्ट्रीय पृथ्वी संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन संपन्न हुआ। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप जापान के क्योटो शहर में 16 फरवरी 2005 को पृथ्वी के बढ़ते तापमान के जरिए जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल अंतर्राष्ट्रीय संधि अस्तित्व में आई। इस संधि में शामिल देशों ने ग्रीन हाउस अर्थात मानव उत्सर्जित गैसों को कम करने के लिए प्रतिबद्धता जताई। दुनिया के वैज्ञानियों ने एक राय होकर कहा कि मानव निर्मित गैस सीओ-2 के उत्सर्जन से धरती का तापमान बढ़ रहा है, जो जीवाश्म ईंधन का पर्याय है। 192 देशों ने इस संधि पर हस्ताक्षर किए हुए हैं।
लेकिन वर्तमान में चल रहे भीषण युद्धों ने हालात बदल दिए हैं। नवंबर 2021 में ग्लासगो में हुए वैश्विक सम्मेलन में तय हुआ था कि 2030 तक विकसित देश और 2040 तक विकासशील देश ऊर्जा उत्पादन में कोयले का प्रयोग बंद कर देंगे। यानी 2040 के बाद थर्मल पावर अर्थात ताप विद्युत संयंत्रों में कोयले से बिजली का उत्पादन पूरी तरह बंद हो जाएगा। तब भारत-चीन ने पूरी तरह कोयले पर बिजली उत्पादन पर असहमति जताई थी, लेकिन 40 देशों ने कोयले से पल्ला झाड़ लेने का भरोसा दिया था। 20 देशों ने विश्वास जताया था कि 2022 के अंत तक कोयले से बिजली बनाने वाले संयंत्रों को बंद कर दिया जाएगा। आस्ट्रेलिया के सबसे बड़े कोयला उत्पादक व निर्यातक रियो टिंटो ने अपनी 80 प्रतिशत कोयले की खदानें बेच दीं थीं, क्योंकि भविष्य में कोयले से बिजली उत्पादन बंद होने के अनुमान लगा लिए गए थे।
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