अमरीकी राज्यों में ‘बूमरैंग’ होती ट्रम्प की दबंगई
हाल के कुछ महीनों में भले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प दर्जनों बार यह कहते सुने गये हों कि वह ईरान को मिट्टी में मिला देंगे या कि मिट्टी में मिला दिया है अथवा यूरोप की हमें कोई ज़रूरत नहीं है, नाटो के देश कायर हैं, ग्रीनलैंड हमारा जब मन होगा, जैसे मन होगा ले लेंगे, कनाडा अमरीका का 51वां प्रांत है या वेनेजुएला के बाद अब क्यूबा की बारी है। अमरीकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने हाल के महीनों में जितना कुछ बुरा बोल सकते हैं, जितनी दुनिया की ऐसी-तैसी कर सकते हैं, सब कर लिया है। लेकिन जिस तरह अमरीकी समय के मुताबिक शनिवार की देर शाम और भारतीय समय के मुताबिक रविवार की सुबह 6 बजे हिल्टन होटल में एक हमलावार गोलियां बरसाता हुआ उनसे 45 मीटर दूर तक पहुंच गया, उससे साबित होता है कि दुनिया ही नहीं, खुद अमरीका में भी अब लोग उनकी परवाह नहीं करते। वे किसी भी कीमत पर उनकी दादागिरी वाले रवैये के विरुद्ध प्रतिरोध जताना चाहते हैं।
होटल हिल्टन में जब शनिवार की शाम अमरीकी राष्ट्रपति व्हाइट हाउस कवर करने वाले देशी-विदेशी पत्रकारों के साथ डिनर पार्टी कर रहे थे, तभी 45 मीटर दूर मेटल डिटेक्टर प्वाइंट तक 31 वर्षीय एक हमलावार कैलिफोर्निया का निवासी कोल थॉमस एलन 8 राउंड गोलियां बरसाते हुए, उनके करीब बढ़ रहा था, उससे साबित हो गया है कि दुनिया की अकेली महाशक्ति का तमगा लेकर घूमने वाले प्रेसीडेंट ट्रम्प भी उतना ही असुरक्षित हैं, जितना दुनिया का कोई भी राजनेता। भले अमरीकी खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों को दुनिया की कितनी ही स्मार्ट एजेंसियां क्यों न माना जाता हो, लेकिन जिस तरह हमलवार एलन ने गोलियां बरसाते हुए, राष्ट्रपति ट्रम्प के नज़दीक पहुंच गया था, उसने 10 मिनट पहले ही इस किये जाने वाले हमले का संकेत दे दिया था।
उसने अपने घर को मैसेज भेजकर यह कहा था कि ट्रम्प गद्दार है, रेपिस्ट है। मैं उसे और उसकी कैबिनेट को नहीं छोड़ूंगा। यह कह कर 2017 में कैलिफोर्निया इंस्टीच्यूट ऑ़फ टेक्निकल से मैकेनिकल इंजीनियर की डिग्री हासिल करने वाला और कोचिंग इंस्टीट्यूट सी-2 में दिसंबर 2024 में ‘टीचर ऑ़फ द मंथ’ का अवार्ड पाने वाला 31 वर्षीय एलन गन लेकर जाता है और उसी जगह बेखौफ अनहोनी घटना को अंजाम दिया। जहां 45 साल पहले तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन पर जानलेवा हमला हुआ था। 30 मार्च 1981 को उन पर 6 गोलियां चलायी गई थीं, पर वह बच गये थे, लेकिन उनके सेक्रेट्री ताउम्र के लिए अपाहिज हो गये थे। उसी जगह अगर जरा सी चूक हो जाती या सीक्रेट सर्विस के एजेंट अपनी जान पर खेलकर इस अनहोनी को टाल नहीं लेते, तो पता नहीं इस समय क्या से क्या लिखने की ज़रूरत पड़ रही होती।
बहरहाल कोई भी बड़ी घटना बिल्कुल तात्कालिक कारणों के नहीं होती। पिछले कई महीनों से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरीके से अपनी मनमानी से पूरी दुनिया के जमीन आसमान को एक कर रखा है, उसके चलते लगता है अब दुनिया के दूसरे देशों की तो बात छोड़िये, खुद उनके अपने नागरिक भी इस सबसे बहुत परेशान हो चुके हैं। उनकी परेशानी या उनका फ्रस्टरेशन अब खूनी प्रतिरोध के रूप में उभरकर सामने आ रहा है। जिस तरह हाल के महीनों में अमरीका में ट्रम्प का विरोध हो रहा है और इज़रायल में प्रधानमंत्री नेतन्याहू के खिलाफ लोग सारे डर को एक तरफ रखकर, सड़कों पर उतर आये हैं, उससे साफ लगता है कि इन देशों के शीर्ष नेतृत्व की आक्रामक विदेश नीति, अब इन्हीं के लोगों के बीच ही ‘बूमरैंग’ करके अपने समाज को प्रभावित कर रही है। यह अमरीकी राष्ट्रपति की मनमानी ही है कि लोगों में अब उन्हें लेकर एक खास तरह की व्यक्तिगत कट्टरता, मानसिक अस्थिरता और सामाजिक ध्रुवीकरण की स्थिति बन रही है। इसके कारण भी हैं।
एक तरफ वह आव्रजन नीति पर पूरी दुनिया को रह-रहकर चुनौती दे रहे हैं, दूसरी तरफ ‘अमरीका फर्स्ट’ के अपने घोषित नारे के चलते अमरीका में रह रहे प्रवासियों का अपमान कर रहे हैं। साथ ही उनकी खिल्ली उड़ा रहे हैं और व्यापक अमरीकी समाज द्वारा ईरान हमले के विरोध के बावजूद अपनी ईरान नीति को बरकरार रखे हुए हैं। इससे साफ लगता है कि अब दुनिया के दूसरे देशों की तो छोड़िये, खुद अमरीका के भीतर लोग उनके विरुद्ध असंतोष से भर गये हैं और अपनी जान हथेली पर लेकर अपनी तरह से इसका विरोध करने के लिए सामने आ रहे हैं। लोग किसी भी कीमत पर अपने विरोध को अवश्य दर्ज कराना चाहते हैं। यह सिर्फ अमरीका में प्रेसीडेंट ट्रम्प के विरोध की बात नहीं है, इज़रायल में भी यही सब हो रहा है। इज़रायल में लाखों लोग नेतन्याहू की आलोचना कर रहे हैं और खुलेआम उनके द्वारा लगातार देश को युद्ध में झोंके रहने की नीति के विरुद्ध सड़कों में उतर आये हैं।
ईरान को मटियामेट करके हो सकता है, अमरीका अपने ताकतवर होने के रूप में दुनिया से अधिक स्वीकार पा ले, या हो सकता है कि अमरीका की आक्रामकता के कारण दुनिया के और भी कई देश उससे डरने लगें, लेकिन जो अमरीकी लोग खुद इस आक्रामकता का विरोध कर रहे हैं, वो इस बात को बेहतर ढंग से जानते हैं कि अमरीका की ताकत की इस स्वीकारोक्ति के बाद उनकी शान में कोई कसीदा नहीं काढ़ा जायेगा बल्कि उनके लोकतांत्रिक भविष्य पर भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लग सकता है। जब अमरीकी राष्ट्रपति अपनी दबंगई से जो मन आये बाहर करते रहेंगे, तो इस बात की क्या गारंटी है कि कल को खुद अपने नागरिकों के विरुद्ध इस आक्रामकता को नहीं आज़माएंगे। आम अमरीकी इस बात को बेहतर ढंग से जानते हैं कि शासकों का बेलगाम होना, अंतत: उनके लोकतांत्रिक भविष्य पर ही अंकुश लगायेगा। शायद यही कारण है कि दुनिया में भले अमरीका अपनी धाक जमा रहा हो, लेकिन उसका यह आक्रामक रवैया खुद अपने देश में बूमरैंग कर रहा है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



