क्या हैं तमिलनाडु और बंगाल में रिकॉर्ड मतदान के संकेत ?

ज्यादातर लोकतंत्र राष्ट्रों में भारी मतदान को एक अच्छी बात माना जाता है, जो चुनाव प्रणाली में भरोसे की निशानी है। परन्तु भारत में यह बात इतनी सीधी नहीं है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों में जो ज़बरदस्त भागीदारी देखने को मिली, जहां मतदान क्रमश: 84 प्रतिशत और 92 प्रतिशत के पार पहुंच गया, उसे और गहराई से समझने की ज़रूरत है।  पहली नज़र में तमिलनाडु की रिकॉर्ड मतदान एक जानी-पहचानी कहानी जैसा लगता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब मतदान में अचानक उछाल आया है, खासकर 2011 में, तब-तब सत्ता विरोधी लहर भी ज़ोरों पर रही है। इससे अपने-आप यह सवाल उठता है, क्या सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (द्रमुक) मुश्किल में है? इसका जवाब है,  ज़रूरी नहीं।
2026 में मतदान में जो उछाल आया है, वह संशोधित मतदाता सूची पर आधारित है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की वजह से मतदाताओं की संख्या लाखों में कम हो गई थी। इसलिए भले ही मतदान का प्रतिशत बढ़ा हो, लेकिन मतदाताओं की कुल संख्या में जो बढ़ोतरी हुई है, पिछले चुनावों के मुकाबले लगभग 19 लाख, वह उतनी नहीं बड़ी जितनी दिखती है। दूसरे शब्दों में यह मतदाताओं का एक छोटा समूह है जो ज़्यादा जोश से मत डाल रहा है, न कि कोई पूरी तरह से नई लहर जो चुनावी मैदान का नक्शा बदल रही हो। यह फर्क समझना ज़रूरी है। यह इस सोच को थोड़ा नरम करता है कि सत्ता के खिलाफ कोई बहुत बड़ी लहर चल रही है।
अभिनेता से नेता बने विजय और उनकी पार्टी तमिलगा वेट्री कड़गम (टीवीके) के चुनावी मैदान में उतरने से युवा मतदाताओं में, खासकर 18 से 40 साल के लोगों में यकीनन नया जोश भर गया है। मतदाताओं का यह समूह जो तमिलनाडु में पहले से ही काफी बड़ा है, इस बार बड़ी संख्या में मत डालने के लिए बाहर निकला है। लेकिन जोश होना और चुनावी तौर पर एकजुट होना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं।
विजय की लोकप्रियता फैली हुई हैए शहरी इलाकों में ज़्यादा हैए और अभी भी अपने राजनीतिक सफर के शुरुआती दौर में है। उनकी मौजूदगी से शायद ये हुआ है कि मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, खासकर पहली बार मत डालने वालों के बीच। द्रमुक-विरोधी वोट एक जगह जमा होने के बजाय अलग-अलग हिस्सों में बंट गए हैं। एक बंटा हुआ विपक्ष सत्ता-विरोधी लहर के पूरी तरह हावी होने के जोखिम को कम कर देता है।
एम. के. स्टालिन ने भड़काऊ बयानबाजी से परहेज किया है और द्रमुक को गुस्से का निशाना बनने के बजाय स्थिरता के रक्षक के रूप में पेश किया है। इस संदर्भ में भारी मतदान, शायद प्रतिस्पर्धी लामबंदी को दर्शाता है, न कि किसी अस्वीकृति को। जयललिता के बाद पैदा हुए नेतृत्व के खालीपन के चलते ऑल इंडिया अना द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (अन्नाद्रमुक) अभी भी नेतृत्व की स्पष्टता के लिए संघर्ष कर रही है। भाजपा ने अपना विस्तार तो किया है, लेकिन द्रविड़ राजनीतिक परिवेश में उसकी संरचनात्मक सीमाएं अभी भी बनी हुई हैं।
उनके गठबंधन का गणित तो शायद काम कर जाए, लेकिन उनकी कहानी में कोई तालमेल नहीं है। याद रहे भारी मतदान वाले चुनावों में अक्सर गणित से ज़्यादा कहानी मायने रखती है। पश्चिम बंगाल में 92 प्रतिशत का आंकड़ा पार करना न केवल लोगों की भागीदारी को दर्शाता है, बल्कि उनके जोश को भी दिखाता है, एक ऐसा समाज जो गहरे तौर पर ध्रुवीकृत है और मतदान को अपने अस्तित्व की लड़ाई मान रहा है। यहां मतदान का मकसद जिज्ञासा कम और मजबूरी ज़्यादा है। मतदान के लिए बड़ी संख्या में प्रवासी मज़दूरों के वापस लौटने की खबरें काफी अहम हैं। बंगाल में लंबे समय से प्रवासन के कारण चुनावी भागीदारी कमज़ोर होती रही है। उनका वापस लौटना यह संकेत देता है कि एक ऐसी सोच कि यह चुनाव सामान्य से कहीं ज़्यादा मायने रखता है। राजनीतिक दांव-पेंच को लेकर एक बढ़ा हुआ एहसास है जो अब उनकी निजी पहचान से भी जुड़ गया है। यह कोई सामान्य चुनावी लामबंदी नहीं है। यह भावनाओं की पुकार है।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस चुनाव को ‘शासन बनाम विपक्ष’ की लड़ाई के तौर पर नहीं, बल्कि ‘बंगाल बनाम बाहरी दखल’ की लड़ाई के तौर पर पेश किया है। नागरिकता कानून (सीएए), संभावित समान नागरिक संहिता (यूसीसी) और मतदाता सूची में संशोधन (एसआईआर) से जुड़े आरोपों जैसे मुद्दों को सांस्कृतिक और राजनीतिक खतरे की एक बड़ी कहानी में पिरो दिया गया है।
कोई इस नज़रिए से सहमत हो या न हो, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह काफ प्रभावी साबित हुआ है। यहां भारी मतदान शायद इन बातों को दर्शाता है कि अल्पसंख्यक और ग्रामीण मतदाताओं का एकजुट होना। भाजपा के कथित वैचारिक विस्तार के खिलाफ  एक जवाबी लामबंदी। मत को किसी आकांक्षा के बजाय अपनी सुरक्षा के एक हथियार के तौर पर देखना। सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अधिक मतदान मौजूदा सत्ताधारी दल के प्रति गुस्से का संकेत है या फिर चुनौती देने वाले दल के प्रति डर का? किसी भी तरह से देखें, भारी मतदान की संख्या जितना दिखाती हैं, उतना ही छिपाती भी है। भारतीय चुनावों में अक्सर भारी मतदान के पीछे जो होता है, वही तय करता है कि आखिर में कौन शासन करेगा। (संवाद)

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