पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में भारी मतदान के निहितार्थ
भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 23 अप्रैल का दिन इस बात के लिए ज़रूर याद किया जाएगा कि अब मतदाताओं की जागरूकता उच्चतम स्तर पर है। इसका स्पष्ट प्रमाण है तमिलनाडु एवं बंगाल में हुए उच्च मतदान का प्रतिशत। इतना अधिक मतदान प्रतिशत कम ही देखने को मिलता है तो इस उच्च मतदान प्रतिशत का आकलन भी लीक से हटकर ही होगा।
तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल दोनों ही राज्यों ने इस बार लोकतंत्र की किताब में एक लम्बी रेखा खींच दी है। 80 प्रतिशत से ऊपर का मतदान केवल आंकड़ा नहीं होता, यह जनमानस की बेचैनी, उम्मीदों और राजनीतिक तापांक का प्रतीक है। तमिलनाडु में लगभग 85 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में करीब 92 प्रतिशत से अधिख मतदान ने स्पष्ट कर दिया है कि यह चुनाव निर्णायक जनादेश है, टकरावपूर्ण है और परिणामों को लेकर असाधारण अनिश्चितता से भरा हुआ है। तमिलनाडु की राजनीति पर नज़र डालें तो यहां की परम्परा रही है कि सत्ता विरोधी लहर अक्सर चुपचाप बनती है और मतदान के दिन अचानक प्रकट होती है। इस बार का ऊंचा मतदान इसी संभावना को हवा देता है, लेकिन तस्वीर इतनी सीधी भी नहीं है। मुख्यमंत्री स्टालिन के नेतृत्व में सत्तारूढ़ द्रविड़ मुनेत्र कडगम ने कल्याणकारी योजनाओंए सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता के सहारे अपना एक ठोस आधार बनाया है।
दूसरी ओर पलानी स्वामी की अगुवाई में विपक्ष ने संगठन, जातीय समीकरण और एंटी-इंकम्बेंसी को हथियार बनाया है। सवाल यह है कि 85 प्रतिशत से अधिक मतदान किसके पक्ष में झुका है? इतिहास बताता है कि तमिलनाडु में उच्च मतदान हमेशा सत्ता परिवर्तन का संकेत नहीं रहा, बल्कि कल्याणकारी राजनीति की स्वीकार्यता को भी पुष्ट करता है। महिलाओं, ग्रामीण मतदाताओं और लाभार्थी वर्ग की बड़ी भागीदारी सत्तारूढ़ पक्ष के लिए राहत का संकेत हो सकती है। यही वह ‘साइलेंट वोटर’ है जो कैमरों से दूर रहता है लेकिन ईवीएम में अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है। इसलिए इस चुनाव में सीधी लहर की बजाय ‘माइक्रो-स्विंग’ निर्णायक भूमिका निभाएगा।
तमिलनाडु में मुकाबला भले ही कड़ा हो लेकिन बढ़त सत्तारूढ़ खेमे की तरफ झुकी दिखती है। विभिन्न सर्वे एवं आकलनों के अनुसार द्रमुक गठबंधन को लगभग 120 से 145 सीटें मिलने की संभावना है जबकि अन्नाद्रमुक गठबंधन 80 से 105 सीटों के बीच सिमट सकता है। अन्य दल 5 से 10 सीटों के दायरे में रह सकते हैं। यह परिणाम किसी सुनामी का नहीं बल्कि एक नियंत्रित बढ़त का संकेत होगा जहां सत्ता विरोधी भावनाएं मौजूद हैं, पर वे निर्णायक रूप से सत्ता पलटने लायक नहीं बन पाईं। इसका दूसरा निहितार्थ यह भी हैं कि केंद्र में सत्तारूढ़ गठबंधन द्वारा पूरा जोर लगाने के बावजूद भी तमिलनाडु की जनता भले ही स्टालिन और डीएमके के नंबर काटे मगर सत्ता की बागडोर उन्हीं के हाथों रहेगी वैसे एक संभावना यह भी बनती है कि दोनों ही गठबंधन इतने पास-पास हो कि जनादेश एक तरफ धरा रह जाए और जोड़-तोड़ की राजनीति के माहिर सत्ता अपने हाथों में ले लें। अब पश्चिम बंगाल की बात करें तो वहां राजनीति चरम पर रहती है। 92 प्रतिशत मतदान केवल उत्साह नहीं बल्कि ध्रुवीकरण की पराकाष्ठा का संकेत है। यहां हर वोट के पीछे एक स्पष्ट राजनीतिक संदेश छिपा है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने अपने 15 वर्ष के शासन में ग्रामीण नेटवर्क महिला मतदाताओं और क्षेत्रीय पहचान को अपने पक्ष में मजबूत किया है जबकि भाजपा ने आक्रामक चुनावी रणनीति, केंद्रीय मुद्दों और संगठनात्मक विस्तार के जरिए मुकाबले को द्विध्रुवीय बना दिया है।
बंगाल में इतना भारी मतदान दो तरह की संभावनाएं पैदा करता है। एकए यह सत्ता के खिलाफ असंतोष का विस्फोट हो सकता है या यह सत्तारूढ़ दल की मजबूत ज़मीनी पकड़ का प्रमाण भी हो सकता है जिसने हर मतदाता को बूथ तक पहुंचाया। फर्क सिर्फ इतना है कि किसकी ‘मोबिलाइजेशन मशीन’ ज्यादा प्रभावी रही। बंगाल का इतिहास बताता है कि यहां का उच्च मतदान अक्सर सत्तारूढ़ दल के पक्ष में भी जाता है, क्योंकि उसका कैडर नेटवर्क ज्यादा संगठित और आक्रामक होता है। इस पृष्ठभूमि में यदि विभिन्न एजेंसियों के आकलन की बात की जाए तो बंगाल में तृणमूल कांग्रेस को बढ़त मिलती दिख रही है, लेकिन यह बढ़त आराम देह नहीं होगी। वाम-कांग्रेस गठबंधन हाशिये पर सिमट कर 5 से 15 सीटों तक सीमित रह सकता है। यह परिणाम बताता है कि बंगाल में लड़ाई खत्म नहीं हुई बल्कि और तेज़ हो गई है। एक और बात इन चुनाव में ओवैसी और हुमायूं कबीर के प्रभाव के चलते मुस्लिम मतदाता भी परिणाम को काफी हद तक प्रभावित करेंगे।
दोनों राज्यों के मतदान प्रतिशत को एक साथ रखकर देखें तो एक दिलचस्प समानता सामने आती है। उच्च मतदान ने सत्ता के खिलाफ असंतोष को पूरी तरह निर्णायक नहीं बनने दिया, लेकिन उसे पूरी तरह दबाया भी नहीं। यह स्थिति भारतीय लोकतंत्र की उस जटिलता को दर्शाती है, जहां मतदाता एक साथ दो संदेश देते हैं—‘हम संतुष्ट नहीं हैं’ और ‘हम पूरी तरह असंतुष्ट भी नहीं हैं।’
सार रूप में कहें तो यह चुनाव परिणाम जनादेश की गूंज से ज्यादा जनभावना की खामोश सरसराहट होंगे। तमिलनाडु में यह सरसराहट सत्तारूढ़ द्रविड़ राजनीति के पक्ष में झुकी हुई है जबकि बंगाल में यह दो ध्रुवों के बीच बंटी हुई है, जहां हर सीट पर संघर्ष आखिरी वोट तक जाएगा।
अंतत: यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इस बार के चुनावों ने राजनीतिक दलों को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि मतदाता अब केवल नारों से संतुष्ट नहीं होता, वह भागीदारी चाहता है, परिणाम चाहता है और अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए घर से बाहर निकलने को तैयार है। अधिक मतदान इसी जागरूकता के प्रमाण हैं। वैसे एक और बड़ा सत्य यह भी है कि भारतीय मतदाता के मन की तरह कभी कोई सर्वे एजेंसी या चुनावी सर्वेक्षण के एग्जिट पोल अथवा प्री पोल पकड़ ही नहीं पाए हैं। सारे आकलन एक तरफ और मतदाता का जनादेश एक तरफ होते रहे हैं । यदि इस बार भी ऐसा हो जाए तो आश्चर्य नहीं ।
लोकतंत्र की इस विशाल भागीदारी ने एक बात तो तय कर दी है, सत्ता चाहे जिसके हाथ में जाए, उसे अब चुनकर आए होने से ज्यादा लगातार जवाबदेह रहने की कड़ी परीक्षा भी देनी होगी। (अदिति)



