गम्भीर हो रही कचरा निपटान की समस्या
भारत कचरा प्रबंधन के बढ़ते संकट का सामना कर रहा है। यह न केवल पर्यावरण, बल्कि जन स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिरता के लिए भी खतरा बन गया है। दुनिया के सबसे ज़्यादा आबादी वाले देशों में से एक होने के नाते भारत हर साल लगभग 62 मिलियन टन कचरा पैदा करता है। इसमें से केवल 75-80 फीसदी ही इकट्ठा हो पाता है और 30 फीसदी से भी कम का ट्रीटमेंट या रीसाइक्लिंग हो पाता है। बाकी बचा हुआ कचरा ओवरफ्लो होते लैंडफिल, खुले कूड़ाघरों और जल निकायों में पहुंच जाता है जिससे गंभीर पर्यावरणीय प्रदूषण और जन स्वास्थ्य संबंधी खतरे पैदा होते हैं। चुनौती केवल कचरे की बढ़ती मात्रा को संभालने की नहीं है, बल्कि ऐसे स्थायी और नए समाधान अपनाने की भी है जो तेज़ी से हो रहे शहरीकरण और बदलते उपभोग के तरीकों के साथ तालमेल बिठा सकें।
अब केंद्रीय सरकारी विभाग, स्थानीय निकाय, निजी कंपनियां, औद्योगिक इकाइयां, होटल, अस्पताल, मॉल और हाउसिंग सोसायटी जो हर रोज़ 100 किलो से अधिक कचरा पैदा करते हैं, उसके निपटान के लिए खुद ज़िम्मेदार होंगे। एक अप्रैल 2026 से लागू ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम-2026 के तहत अब यह प्रावधान किया गया है। इस अहम प्रावधान पर 15 अप्रैल, 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) की केंद्रीय पीठ में सुनवाई हुई। एनजीटी ने विस्तृत रिपोर्ट भी तलब की है। एनजीटी ने निर्देश दिया कि एक संयुक्त समिति बनाई जाए जो नियमों के प्रभावी पालन की जांच करे और छह हफ्तों में तथ्यात्मक व कार्रवाई रिपोर्ट पेश भी करेगी। इन नए नियमों का उद्देश्य लैंडफिल या कूड़े के पहाड़ों पर निर्भरता कम करना और कचरे को एक संसाधन के रूप में इस्तेमाल करना है। भारत में प्रति भारतीय नागरिक औसतन 0.25-0.50 किलोग्राम कचरा प्रतिदिन पैदा करता है जो 2030 तक 165 मिलियन टन तक बढ़ सकता है। इसमें लगभग 45-50 फीसदी गीला, 35 फीसदी सूखा या प्लास्टिक, कागज़, धातु और शेष खतरनाक या ई-कचरा होता है। भारत में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन तीव्र शहरीकरण के कारण एक गंभीर चुनौती है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ठोस अपशिष्ट प्रबंधन (एसडबल्यूएम) नियम 2026 को अधिसूचित किया था जो ठोस अपशिष्ट प्रबंधन नियम 2016 का स्थान लेंगे। ये नियम पर्यावरण यसंरक्षण अधिनियम 1986 के तहत अधिसूचित किए गए हैं और 1 अप्रैल, 2026 से पूरी तरह प्रभावी हो गए। संशोधित नियम चक्रीय अर्थव्यवस्था और विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व के सिद्धांतों को एकीकृत करते हैं जिसमें अपशिष्ट के कुशल पृथक्करण और प्रबंधन पर विशेष ध्यान दिया गया है। नियमों का पालन न करने यानि बिना पंजीकरण के संचालन, गलत रिपोर्टिंग, जाली दस्तावेज जमा करना या ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के अनुचित तरीके अपनाने पर पर्यावरणीय मुआवज़ा लगाने का प्रावधान करते हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड इस संबंध में आवश्यक दिशा निर्देश तैयार करेगा जबकि राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रदूषण नियंत्रण समितियां पर्यावरणीय मुआवज़ा वसूल करेंगी।
ठोस अपशिष्ट प्रबंधन घरों, उद्योगों और वाणिज्यिक क्षेत्रों से उत्पन्न ठोस कचरे को इकट्ठा करने, परिवहन, उपचार और निपटान की एक व्यवस्थित प्रक्रिया है। इसका मुख्य उद्देश्य पर्यावरण और स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभावों को कम करना है।
नए नियमों के मुख्य बिंदु : बल्क वेस्ट जनरेटर (बीडब्ल्यूजी) के तहत जो संस्थाएं प्रतिदिन 100 किलो से ज्यादा कचरा या 20000 वर्ग मीटर से अधिक क्षेत्रफल वाले परिसर में हैं, उन्हें खुद कचरा प्रबंधन करना होगा । 4-बिन (चार स्तरीय) पृथक्करण के तहत कूड़े को अब चार अलग-अलग डिब्बों में बांटना अनिवार्य है जैसे गीला, हरा, सूखा आदि। डिजिटल ट्रैकिंग करनी होगी यानि एक केंद्रीकृत ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से कचरे के जेनरेशन से लेकर डिस्पोजल तक की ट्रैकिंग की जाएगी। निपटान की ज़िम्मेदारी भी तय होगी यानि गीले कचरे से कंपोस्ट या बायोगैस बनानी होगी। यदि परिसर के अंदर यह संभव नहीं है तो अधिकृत एजेंसियों को काम सौंपना होगा। नियमों का पालन न करने पर एनजीटी के निर्देशानुसार सख्त कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
भारत की कचरा समस्या का पैमाना इस बात को दिखाता है कि एक ऐसे देश में कचरा प्रबंधन कितना जटिल है जहां सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक विविधता बहुत ज़्यादा है। शहरी इलाकों में बढ़ती जनसंख्या घनत्व, उपभोक्तावाद और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण भारी मात्रा में म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट जमा हो गया है। अकेले दिल्ली ही हर दिन लगभग 11 हज़ार मीट्रिक टन कचरा पैदा करता है। इसके विपरीत ग्रामीण इलाकों में अलग लेकिन उतनी ही गंभीर समस्याएं हैं। खराब कचरा प्रबंधन के पर्यावरणीय परिणामों में मिट्टी का खराब होना भूजल का दूषित होना और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ना शामिल है। (युवराज)



