जल के संरक्षण और सदुपयोग पर गंभीरता से विचार होना चाहिए
कुछ लोग जल का व्यापार करें और कुछ लोग बूंद-बूंद को तरसें। क्या इसे आम जन के जलाधिकार का हनन नहीं कहा जा सकता। क्या हम नहीं जानते कि जल जीवन तत्व है, अमृत है और प्रत्येक जीवधारी के लिए प्रकृति द्वारा दिया गया उपहार है? जल के बिना न तो जीवन संभव है और न ही प्रकृति-संस्कृति की संकल्पना साकार हो सकती है। पृथ्वी पर लगभग 70 प्रतिशत जल होने पर भी पेयजल लगभग 3 प्रतिशत ही है। आज जब जनसंख्या की दृष्टि से भारत सबसे आगे है। नदी, कुएं, तालाब, बावड़ियां, झरनें और भू-जल निरन्तर प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। तब क्या हमें जल के संरक्षण, संवर्धन और सदुपयोग पर गंभीरता से विचार नहीं करना चाहिए?
प्रचीन समय में सभी के लिए स्वच्छ जल की उपलब्धता हेतु धनी लोग जगह-जगह कुंए और प्याऊ बनवाते थे। पानी खरीदने और बेचने का मन में विचार ही नहीं था। आज भारत सहित लगभग पूरे विश्व में पानी बिक रहा है। बोतल बंद पानी का व्यापार करने वाली कंपनियों का वार्षिक व्यापार लगभग 20 हजार करोड़ रुपए है। बाज़ार में एक लीटर पानी की कीमत लगभग 20 रुपये है। एक स्वस्थ व्यक्ति को दिन में लगभग 3 लीटर पानी पीना चाहिए, यानी दिन में लगभग 60-70 रुपये का पानी। परिवार के हिसाब से यह खर्च लगभग 300-400 रुपये प्रति परिवार हो जाता है। क्या किसी गरीब व्यक्ति के लिए खरीद कर पानी पीना संभव है?
जानकारी के अनुसार भारत में बोतल बंद पानी का चलन 1960 के दशक में शुरू हुआ। कुएं, तालाब, बावड़ी और प्याऊ के जल पर सभी का अधिकार होता था, लेकिन धीरे-धीरे औद्योगीकरण एवं भिन्न-भिन्न कारणों से ये जल स्रोत प्रदूषित होने लगे। प्याऊ खत्म कर दी गई और विज्ञापनों के माध्यम से बोतल बंद पानी पीने वालों को ही स्वस्थ और सभ्य दिखाया जाने लगा। प्रश्न यह है कि जब जल पर मानव सहित सभी जीवधारियों का अधिकार है तो उसे ज़मीन से निकालकर, नदी-झरनों से लेकर आगे क्यों बेचा जा रहा है? नदियां और झरनें सूख रहे हैं। उनके पास रहने वाले लोगों को जल संकट का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में ये लोग पानी खरीदने को मजबूर हैं। क्या यह इन लोगों के जलाधिकार का हनन नहीं है?
नहर, बांध एवं पाइपलाइन से स्थानांतरित किए जाने वाले जल का बड़ा हिस्सा लीकेज के कारण बर्बाद हो जाता है। पानी की कमी को पूरा करने के लिए बड़े पैमाने पर भू-जल का अधिक दोहन हो रहा है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2050 तक विश्व के कई शहर डे ज़ीरो की स्थिति में पहुंच सकते हैं। जिसमें भारत के दिल्ली, जयपुर, चेन्नई, हैदराबाद व बेंगलूर जैसे प्रमुख शहर शामिल हैं। चिंताजनक यह भी है कि राष्ट्रीय राजधानी जैसे स्थान पर वर्षा जल संचयन की विभिन्न योजनाएं होने पर भी उचित व्यवस्था न होने के कारण प्रतिवर्ष वर्षा जल का बड़ा हिस्सा नालों में बेकार बह जाता है।
नदियां सिंचाई, पेयजल एवं औद्योगिक आपूर्ति की एक बड़ा स्रोत हैं। देश की छोटी-बड़ी कई नदियां प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। कई नदियों में अनुपचारित औद्योगिक अपशिष्ट एवं सीवेज खुलेआम बहाया जा रहा है। कई नदियों पर बांध बना दिए गए हैं। ऐसे में नदी का पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ा रहा है। नदियां दम तोड़ रही हैं। इन नदियों के आसपास रहने वाले लोग विस्थापन को मजबूर हैं। नदियों को जोड़ने से सभी को पेयजल की उपलब्धता संभव हो सकती है। चिंताजनक है कि विगत दिनों जल संसाधन संबंधी संसदीय स्थायी समिति ने अपनी ताज़ा रिपोर्ट में नदी जोड़ो परियोजना के तहत आवंटित बजट का पूरा उपयोग न होने पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। वित्तीय वर्ष 2025-2026 के आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में बताया गया है कि इसके लिए 1808 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जिसमें से केवल 25 प्रतिशत ही खर्च हुआ है, यानी परियोजनाओं के क्रियान्वयन की गति धीमी रही है।
सर्वविदित है कि जलवायु परिवर्तन के कारण जल स्रोत तेज़ी से प्रभावित हो रहे हैं। भू-जल दोहन की स्थिति भी चिंताजनक है। कृषि और औद्योगिक आपूर्ति जैसे कार्यों के लिए भू-जल दोहन निरंतर बढ़ रहा है। सबसे अधिक भू-जल दोहन करने वाले राज्यों में पंजाब, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा एवं हिमाचल सबसे आगे हैं। इस कारण ट्यूबवेल और तालाबों के पानी का स्तर नीचे जा रहा है। संयुक्त राष्ट्र महासभा भी जुलाई 2010 में स्वच्छ जल की उपलब्धता को मानव अधिकार बनाने का प्रस्ताव मंजूर कर चुकी है। भारत भी संयुक्त राष्ट्र महासभा का सदस्य है। क्या अब यह समय की मांग नहीं है कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में पारित प्रस्ताव लागू किया जाए? (अदिति)



