पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव

विगत लम्बी अवधि से चर्चित पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों की व्यापक स्तर पर चर्चा होती रही थी। इन चुनावों के लिए विगत दिवस हुए चुनाव में मतदाताओं में भारी उत्साह देखने को मिला। पश्चिम बंगाल में यह चुनाव दो चरणों में हो रहे हैं। दूसरे चरण के चुनाव 29 अप्रैल को होंगे। इस महीने में पहले असम, केरल और पुडूचेरी में चुनाव हो चुके हैं। पांच राज्यों के चुनावों के परिणाम 4 मई को सामने आएंगे। पश्चिम बंगाल के चुनाव में इसलिए दिलचस्पी बनी रही है, क्योंकि ममता बनर्जी के नेतृत्व में पिछले 15 वर्ष से तृणमूल कांग्रेस शासन कर रही है। इस पारी में चाहे ममता को अनेक तरह की चुनौतियों में से गुज़रना पड़ा परन्तु इस पूरे समय में उन्होंने हौसला और हिम्मत ज़रूर बनाए रखी है। चाहे इस बार भी चुनाव मैदान में कांग्रेस और वामपंथी पार्टियां उतरी हैं। चाहे कांग्रेस राज्य की सभी 294 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, परन्तु फिर भी मुख्य मुकाबला ममता की तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच होता ही दिखाई दे रहा है। 
भाजपा ने राज्य के इन चुनावों में एक तरह से अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। इससे पहले मतदाता सूचियों का विशेष गहन संशोधन (एस.आई.आर.) की व्यापक स्तर पर चर्चा होती रही है और ममता लगातार केन्द्र की भाजपा सरकार  और चुनाव आयोग पर इस मामले में पक्षपात होने के आरोप लगाती रही है। विगत लम्बी अवधि से ममता  का केन्द्र के साथ बहुत से मामलों पर बड़ा तनाव बना रहा है। जिस कारण ज्यादातर केन्द्रीय सहायता से चलने वाली योजनाओं के लिए बड़ी राशि से यह प्रदेश विमुख रहा है। नि:संदेह 15 वर्ष के शासन में सरकार विरोधी भावना हावी हुई दिखाई देती है। प्रदेश में बेरोज़गारी भी बढ़ी है और औद्योगिक क्षेत्र भी विकास से वंचित रहा है। इन बातों का भाजपा पूरा लाभ उठाने का यत्न भी कर रही है, परन्तु ममता ने इस प्रभाव को कम करने के लिए इस बार कम से कम 40 प्रतिशत विधायकों की टिकटें काट दी हैं। 2021 में हुए विधानसभा चुनाव के समय तृणमूल कांग्रेस ने 294 में से 215 सीटें जीती थीं। उन्होंने इन चुनावों में 74 विधायकों की टिकटें काट दी हैं और 15 विधायकों को अपने विधानसभा क्षेत्रों से अन्य क्षेत्रों में भेज दिया है।
शुभेन्दू अधिकारी जो कभी ममता के बड़े सहयोगी थे, अब भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। लगभग पिछले एक वर्ष से पश्चिम बंगाल में स्वयं सेवक संघ के सदस्यों ने लोगों तक निचले स्तर पर सम्पर्क किया है। भाजपा ममता के बड़े वोट बैंक अभिप्राय महिलाओं और युवाओं को भी लुभाने के लिए यत्न कर रही है। दूसरी तरफ ममता भी इस पक्ष से सचेत है। ममता ने ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना अधीन महिलाओं को 1500 रुपए प्रति माह देने की योजना पर अमल करना शुरू कर दिया है। इस योजना के तहत 22 करोड़ महिलाएं आती हैं। इसी तरह उन्होंने ‘युवा साथी योजना’ के तहत बेरोज़गार युवाओं को 1500 रुपए प्रति महीना देने का वायदा भी किया है। भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल को बांग्लादेश न बनाने का वायदा करके अपना साम्प्रदायिक पत्ता खेलने से भी गुरेज़ नहीं किया। चाहे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने इस चुनाव से पहले यहां प्रचार करने के लिए अपना पूरा ज़ोर लगाया है और वामपंथी पार्टियां भी सक्रिय दिख रही हैं, परन्तु इस बार भी उनकी दाल गलती दिखाई नहीं देती।
भाजपा नेताओं ने इस बार ममता बनर्जी पर निजी हमले करने से गुरेज़ किया है। पिछले चुनावों के दौरान उनके लिए ममता के विरुद्ध ऐेसे बयान हानिकारक सिद्ध हुए थे। इसकी बजाये वह ममता के 15 वर्षों के शासन संबंधी लगातार आलोचनात्मक रहे हैं। सरकारी कर्मचारियों के वेतन में वह सातवें पे-कमीशन को लागू करके वेतन बढ़ाने के वायदे कर रहे हैं और इसके साथ ही एक जैसा सिविल-कोड बनाने के वायदे भी भाजपा करती रही है। तमिलनाडु में चाहे वर्ष 1967 के बाद कांग्रेस के पांव नहीं लगे। उसके बाद द्राविड़ पार्टियां डी.एम.के. और अन्ना डी.एम.के. ही बारी-बारी शासन करती रही हैं। इस बार भाजपा ने अन्ना डी.एम.के. के साथ गठबंधन किया है। उसकी नीति अपना मत प्रतिशत बढ़ाने की ही रही है। तमिलनाडु में भी कांग्रेस अपना कोई प्रभाव बनाने में असमर्थ रही है। इस समय 234 सदस्यों की विधानसभा में डी.एम.के. की 133, ए.डी.एम.के. की 66, भाजपा की 4 और कांग्रेस की मात्र 18 सीटें हैं।
पश्चिम बंगाल में पहले चरण में और तमिलनाडु चुनाव में मतदाताओं ने बड़ी संख्या में उपस्थिति दर्ज की है और उत्साह प्रकट किया है। यहां अभिनेता विजय द्वारा अपनी पार्टी बना कर चुनाव में उतरने के कारण अभी तक भी चुनाव परिणामों का कोई अनुमान लगाया जाना मुश्किल प्रतीत होता है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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