पंजाब के ज्वलंत मुद्दों के प्रति उदासीन हैं राजनीतिक पार्टियां

तुम्हारे पाओं के नीचे कीई ज़मीन नहीं,
कमाल ये है कि फिर भी तुझे यकीन नहीं।
पंजाब विधानसभा के चुनावों में चाहे अभी लगभग 10 महीने शेष हैं, परन्तु पंजाब की सभी प्रमुख राजनीतिक पार्टियां ये दावे बड़े ज़ोर-शोर से कर रही हैं कि 2027 में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव में अगली सरकार उनकी ही होगी। हालांकि वास्तविकता यह है कि इस समय पंजाब की जो राजनीतिक स्थिति दिखाई दे रही है, उसके अनुसार किसी भी राजनीतिक पार्टी की जीत अभी सुनिश्चित नहीं कही जा सकती। इससे भी बड़ी हैरानी की बात यह है कि कोई भी पार्टी पंजाब के वास्तविक मुद्दे नहीं उभार रही, अपितु सभी राजनीतिक पार्टियां दूसरी पार्टियों पर आरोप लगा कर तथा मुफ्त की रेवड़ियां बांट कर या सत्ता में आने पर बांटने का लालच देकर ही सरकार बनाने की रणनीति अपना रही हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी अपनी सरकार के अंतिम वर्ष में विकास कार्यों की ओर ध्यान देने लगी है, परन्तु पंजाब की अर्थ-व्यवस्था को सुधारने की बजाय उनका पूरा ज़ोर मुफ्त बिजली की सुविधा जारी रखने तथा महिलाओं को 1000 तथा 1500 रुपये प्रति माह देना शुरू करने पर केन्द्रित है। वे इसी सहारे ही चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे हैं चाहे इससे पंजाब के सिर चढ़े ऋण की गठरी और भारी होती जा रही है।
कांग्रेस पार्टी आंतरिक फूट का शिकार है और उसके पास कोई सर्वसाझा नेता भी नहीं है, परन्तु वह भी पंजाब के मुद्दों की सियासत नहीं कर रही, अपितु पंजाब के मुद्दों तथा मामलों पर सिर्फ बयानबाज़ी से ही काम चला रहे हैं। स्थायी रूप में कांग्रेसी भी अपने चुनाव घोषणा पत्र में और मुफ्त की रेवड़ियों के वायदे करके ही चुनाव जीतने का यत्न करेंगे जबकि अकाली दल बादल तो जहां अपने शासन में किए गए विकास कार्यों के दावे कर रहा है, वहीं वह किसानों के लिए मुफ्त बिजली, शगुन योजना तथा आटा-दाल योजना आदि शुरू करने में अग्रणी होने को अपने चुनाव प्रचार का हथियार बना रहा है। पंजाब तथा सिखों के मुद्दों पर सख्त बयानबाज़ी अलग बात है, परन्तु ज़मीनी संघर्ष से अकाली दल भी दूर ही दिखाई देता है। चाहे नये बने अकाली दल (पुनर्सुरजीत) तथा अकाली दल (वारिस पंजाब दे) के बीच चुनाव समझौता लगभग हो गया है, परन्तु उनकी ओर से भी पंजाब के मुद्दों बारे अभी तक कोई स्पष्ट स्टैंड सामने नहीं आया। वैसे दोनों दलों की ‘साझी पंथक एकता तालमेल कमेटी’ के कनवीनर मनप्रीत सिंह इयाली पंथक तथा पंजाब के मुद्दों के मुद्दई होने का दावा तो करते हैं, परन्तु क्रियात्मक रूप में क्या होता है, अभी पता नहीं।
भाजपा के केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी 2027 में भाजपा की ओर से अकेले सरकार बनाने का दावा तो कर ही चुके हैं। वह पंजाब के कुछ मामले पंजाब में सरकार बनाने के बाद हल करने की बात तो करते हैं, परन्तु पंजाब तथा सिखों के जो मामले वह अभी हल करने में समर्थ हैं, उनके बारे में वह चुप ही हैं। अन्य पार्टियां जिनमें भाजपा तथा अकाली दल मान सहित कई अकाली दल तथा कई नई बनी पार्टियां शामिल हैं , भी अपनी-अपनी डफली बजा रही हैं और अपना-अपना राग अलाप रही हैं। अभी तक उनमें से भी अधिकतर ने पंजाब के मुद्दों पर अपनी नीति स्पष्ट नहीं की।
वास्तव में पंजाब के सपने, मांगें, उमंगें तथा भविष्य किसी मरुस्थल में मृगतृष्णा की भांति दिखाई देते ‘नखलिस्तान’ (हरियावल वाला स्थान) की तरह ही दिखाई दे रहे हैं। जिस प्रकार का रवैया पंजाब की राजनीतिक पार्टियां पंजाब के मुद्दों के प्रति अपना रही हैं, उससे तो यही प्रतीत होता है कि चुनाव चाहे कोई भी जीते या कोई हारे, परन्तु पंजाब को अधिक लाभ होने वाला नहीं है। पंजाब की हालत तो मिज़र्ा ़गालिब के इस शे’अर जैसी है : 
कोई उम्मीद बर नहीं आती,
कोई सूरत नज़र नहीं आती।
पंजाब के प्रमुख मामले 
पंजाब के प्रमुख मामले दो तरह के हैं। एक तो वे जो केन्द्र सरकार के समाधान वाले हैं, जिनमें पंजाब के पानी के रिपेरियन कानून के अनुसार अधिकार पंजाब को वापस देने तथा रायल्टी लेने का अधिकार, पंजाबी भाषी क्षेत्र तथा विशेषकर चंडीगढ़ पंजाब को सौंपना, पंजाबी भाषा को पड़ोसी राज्यों में उसका उचित स्थान दिलाना, एम.एस.पी. की कानूनी गारंटी देना, फसली विभिन्नता के लिए तथा सीमांत राज्य के रूप में औद्योगिक पैकेज देना तथा अन्य भी कई मामले हैं जो केन्द्र ने हल करने हैं, परन्तु पंजाब के लिए सबसे बड़ा मामला है पाकिस्तान से दुश्मनी के बावजूद, जैसे चीन के साथ व्यापारिक संबंध हैं, उसी तरह ही पाकिस्तान के रास्ते मध्य-पूर्व तथा यूरोप तक व्यापारिक यातायात खोलना, जबकि कुछ शुद्ध सिख मामले भी केन्द्र सरकार द्वारा हल करने वाले हैं, जिनमें श्री करतारपुर साहिब गलियारा फिर से खोलना, सिखों के छीने गए या गिराए गए कुछ ऐतिहासिक गुरुद्वारे वापस करवाना, दिल्ली कत्लेआम के शेष रहते केसों में न्याय दिलाना, लम्बे समय से लम्बित सिख संस्थाओं के चुनाव करवाना। सिख मामलों में शिरोमणि कमेटी तथा श्री अकाल तख्त साहिब की सलाह लेना सुनिश्चित बनाना तथा स्कूलों-कालेजों तथा विश्वविद्यालयों में सिख इतिहात का पाठ्यक्रम सिख विद्वानों की सलाह से लागू करना आदि शामिल हैं। जबकि पंजाब सरकार के हल करने वाले मामलों तथा मुद्दों में नशा, रेत, शराब तथा अन्य कई तरह के माफिया को नकेल डालना, पंजाब के सिर चढ़े ऋण को धीरे-धीरे कम करने के लिए कोई रणनीति बनाना, वोटों के लिए मुफ्त की रेवड़ियों पर पाबंदी लगाना, भू-जल की स्थिति सुधारना, हालांकि मौजूदा सरकार का नहरों के पानी के इस्तेमाल पुन: शुरू करना प्रशंसनीय कदम है, परन्तु पंजाब में बन रहा पुलिस राज का माहौल तथा पुलिस मुकाबलों के दौर की वापसी तथा अमन-कानून की स्थिति आदि अनेक मुद्दे तथा मामले हैं, जो हल होने चाहिएं।
मसअला हूं तो निगाहें ना चुराओ मुझ से,
अपनी चाहत से तवज्जो से मुझे हल कर दो।
(वसी शाह)
जागत जोत श्री गुरु ग्रंथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट
पंजाब का जागत जोत श्री गुरु गं्रथ साहिब सत्कार (संशोधन) एक्ट 2026 तेज़ी से कानून बना है। इसका राजनीतिक पार्टियों तथा अधिकतर धार्मिक संस्थाओं ने स्वागत भी किया है। दूसरी ओर इसे अदालत में चुनौती भी दे दी गई है। जहां इसका भारी स्वागत हो रहा है, वहीं सिखों के एक वर्ग में कुछ चिन्ताएं भी पैदा हो गई हैं, जिनका ज़िक्र करना ज़रूरी है, क्योंकि इस कानून का प्रभाव दूसरे धर्मों के लोगों को गुरबाणी पढ़ने से दूर तो करेगा ही, अपितु यह सिख श्रद्धालुओं में भी भय पैदा करेगा और भाई गुरदास जी करे अनुसार :
घरि घरि अंदरि धर्मसाल,
होवै कीर्तन सदा विसोआ।
की परम्परा से सिखों को दूर करने का कारण भी बन सकता है, क्योंकि यह कानून तो घरों में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ का प्रकाश करने वाले श्रद्धालुओं को ‘निगरान’ के रूप में बेअदबी का ज़िम्मेदार ठहरा सकता है। यह कानून निजी घरों में जहां प्रकाश हो, में पुलिस की जांच की राह भी खोलता है। एक्ट में ‘गुरु ग्रंथ साहिब या उसका भाग’ साफ तौर पर गुटके, पोथियों, सैचियों तथा धार्मिक किताबों को इस कानून के दायरे में ले आता है और प्रतिदिन तथा लगातार इस्तेमाल से इनको पहुंचे नुकसान या किसी गुरुद्वारे पहुंचे नुकसान के लिए भी श्रद्धालु को अपराधी करार देने की राह खेलता है। फिर यह भी सवाल है कि इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए क्या उपाय हैं क्योंकि इस नये कानून में कानून लागू करने वाली एजेंसी की कोई जवाबदेही भी निर्धारित नहीं है। यह कानून धर्म में राज्य तथा राजनीति का हस्तक्षेप बढ़ाने का कारण भी बनेगा। इस मामले में शाद लखनवी का यह शे’अर ही चरितार्थ होता है : 
मरीज़-ए-इश्क पे रहमत ़खुदा की।
मज़र् बढ़ता गया ज्यों ज्यों दवा की।   

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