मज़बूत लोकतंत्र का आधार है पंचायती राज

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पंचायत से संसद तक फैली भारतीय लोकतंत्र की यात्रा केवल सत्ता के ढांचे की कहानी भर नहीं है बल्कि यह जनभागीदारी की एक समृद्ध परम्परा है। भारत में लोकतंत्र की जड़ें सदियों पुरानी हैं। ये ग्राम सभाओं और सामुदायिक निर्णय प्रणालियों में मिलती हैं। जहां गांव के लोग मिलकर अपने सामाजिक और आर्थिक मुद्दों का समाधान करते हैं, आधुनिक भारत में इसी परम्परा को संवैधानिक आधार मिला, 73वें संविधान संशोधन के माध्यम से, जिसने पंचायती राज संस्थाओं को न केवल वैधता दी, बल्कि इन्हें लोकतंत्र की मज़बूत सीढ़ी के रूप में स्थापित किया। आज पंचायती राज केवल प्रशासनिक व्यवस्था भर नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक सशक्तिकरण का प्रतीक बन चुका है। यह वह मंच है, जहां आम नागरिक सीधे निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बनता है, चाहे वह गांव की सड़क हो, पानी की व्यवस्था या शिक्षा और स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे हों। यही कारण है कि पंचायतें लोकतंत्र की नर्सरी कही जाती हैं। नर्सरियों में नेतत्व पनपता है और जनसेवा की भावना विकसित होती है।
पंचायत से संसद तक की यह कड़ी भारत के लोकतंत्र को भरपूर गहराई देती है और सुनिश्चित करती है कि नीतियां केवल ऊपर से थोपे गये फैसले न हों, बल्कि नीचे से उठी आवाज़ों का प्रतिबिंब हो। इसलिए पंचायती राज को समझना दरअसल भारत के लोकतंत्र की आत्मा को समझना है। यह एक ऐसी परम्परा है जो जड़ों से जुड़ी है और भविष्य को दिशा देती है। भारत में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा 1992 में मिला और 24 अप्रैल, 1993 से यह व्यवस्था प्रभावी हो गई, तभी से इस दिन को पंचायती राज दिवस के रूप में मनाया जाता है।
पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य सत्ता का विकेंद्रीकरण है यानी निर्णय लेने की प्रक्रिया को गांवों तक पहुंचाना। यह तीन स्तरीय संरचना है, जिसमें ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद होती हैं। आज भारत में 2.6 लाख से भी अधिक सक्रिय ग्राम पंचायतें हैं, जिनमें 30 लाख से अधिक निर्वाचित प्रतिनिधि कार्यरत हैं। इनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधि भी शामिल हैं, जो इस व्यवस्था को सामाजिक समावेशन का एक सशक्त माध्यम बनाते हैं। वास्तव में इन संस्थाओं में महिलाओं की भागीदारी अपने आप में एक लोकतंत्र की चुपके से हुई क्रांति है। पंचायती राज व्यवस्था की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक है इसमें महिलाओं की बढ़ती भागीदारी। 73वें संविधान संशोधन के तहत इन संस्थाओं में 33 फीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित कर दी गई थीं, जिसे कई राज्यों ने बढ़ाकर 50 फीसदी तक कर दिया है। इसी का नतीजा है कि आज देशभर में लाखों महिला सरपंच और पंच न सिर्फ स्थानीय प्रशासन चला रही हैं, बल्कि सामाजिक बदलाव की अगुवाई भी कर रही हैं। 
हाल के कुछ सालों में पंचायतों को डिजिटल प्लेटफॉर्म से जोड़ने की दिशा में भी तेज़ी आयी है। सरकार द्वारा शुरु की गई ‘ई-गवर्नेंस’ योजनाओं के तहत ग्राम पंचायतों को इंटरनेट, डिजिटल रिकॉर्ड और ऑनलाइन सेवाओं से जोड़ा जा रहा है तथा स्वामित्व योजना जैसी योजनाओं से ग्रामीण संपत्तियों का ड्रोन के जरिये सर्वे हो रहा है। इस सबके चलते अब संपत्ति विवाद पहले से कम हो रहे हैं और लोगों को स्पष्ट मालिकाना हक मिल रहा है। इसी तरह ‘ई-ग्राम स्वराज’ पोर्टल के ज़रिये पंचायतों के कामकाज में पारदर्शिता बढ़ी है। हालांकि पंचायती राज व्यवस्था ने अनेक उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि ग्रामीण समाज की चुनौतियां समाप्त हो गई हैं। अभी भी बहुत चुनौतियां हैं। कई पंचायतों में अब भी वित्तीय संसाधनों की कमी है, जिससे विकास कार्य प्रभावित होते हैं। इसके अलावा कई जगहों पर प्रशासनिक क्षमता और प्रशिक्षण की कमी भी देखने को मिलती है और राजनीतिक हस्तक्षेप व नौकरशाही का दबाव भी कई जगहों पर पंचायतों की स्वायतत्ता को सीमित करता है। कई बार कई योजनाएं ऊपर से थोप दी जाती हैं, जिससे स्थानीय ज़रूरतों की अनदेखी हो जाती है। फिर भी ग्रामीण युवा अब पंचायत राज व्यवस्था की नई उम्मीद बनकर उभरे हैं।
शिक्षित और युवा सरपंच नये विचारों के साथ गांवों के विकास में बहुमूल्य योगदान दे रहे हैं। स्टार्टअप संस्कृति, डिजिटल शिक्षा और स्वच्छ ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में पंचायतों की भूमिका बढ़ रही है। इसलिए यह विश्वास मजबूत हुआ है कि अगर युवाओं को सही प्रशिक्षण और ज़रूरी संसाधन मिलें तो पंचायतें ग्रामीण भारत को आत्म-निर्भर बनाने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं। बहरहाल पंचायती राज व्यवस्था से लोकतंत्र की जड़ें मज़बूत हुई हैं, इसलिए पंचायती राज दिवस महज एक औपचारिक आयोजन का दिनभर नहीं है, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक आज़ादी की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी भी है। इसलिए इस दिन के प्रति न केवल हम सब भारतीयों को कृतज्ञ रहने की ज़रूरत है, बल्कि लगातार इस दिन की ऊर्जा को बरकरार रखना होगा, तभी देश में लोकतंत्र फले-फूलेगा।   
 -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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