युद्ध की समाप्ति में रुकावटें

अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने बिल्कुल अंतिम समय में ईरान पर पुन: हमले शुरू करने की बजाये अपनी ओर से किए गए युद्ध-विराम को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया है। इससे एक बार फिर दक्षिणी एशिया के देशों और विशेष रूप से खाड़ी देशों ने सुख की सांस ली है, परन्तु इस घोषणा के बाद भी युद्ध के बादल अभी छंटते दिखाई नहीं देते। 28 फरवरी को अमरीका और इज़रायल ने ईरान पर बमबारी शुरू की थी। ईरान से सहायता प्राप्त हिज़बुल्लाह जिसके पड़ोसी देश लेबनान में ठिकाने हैं, ने भी इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप इज़रायल पर हमले शुरू कर दिए थे। इज़रायल के विरुद्ध युद्ध लड़ रहे आतंकवादी संगठनों हिज़बुल्लाह, हमास और हूतियों जिन्होंने यमन के एक बड़े क्षेत्र पर कब्ज़ा किया हुआ है, को पिछले कई दशकों से ईरान प्रत्येक तरह की सहायता देता आ रहा है। इस तरह से इस क्षेत्र में मामला बेहद जटिल बन चुका है।
पिछले सात सप्ताह में ईरान में लगभग 4 हज़ार, लेबनान में अढ़ाई हज़ार और इज़रायल में तीन दर्जन लोगों की मौत होने के समाचार हैं। पूरे क्षेत्र में अब तक 13 अमरीकी सैनिक भी मारे जा चुके हैं। पाकिस्तान और तुर्की आदि देशों ने इस युद्ध को खत्म करवाने के लिए बड़े यत्न ज़रूर किए हैं। इनके कारण ही अमरीका और ईरान के बड़े अधिकारियों की इस्लामाबाद में पहले 11 और 12 अप्रैल को विस्तारपूर्वक बातचीत हुई थी, जिसका कोई परिणाम नहीं निकला था। इससे पहले अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 8 अप्रैल को दो सप्ताह के लिए युद्ध-विराम की घोषणा कर दी थी। पहली बातचीत  विफल रहने के बाद दूसरी बातचीत के लिए बड़े यत्न किए गए। यह दूसरी बैठक युद्ध-विराम की घोषित तिथि से पहले करवाने का यत्न किया गया परन्तु ईरान के इनकार करने के बाद यह बैठक नहीं हो सकी, इसका कारण यह बना कि युद्ध-विराम के समय दौरान ही अमरीकी नौसेना ने ईरान के चीन से आने वाले एक व्यापारिक समुद्री जहाज़ पर गोलीबारी करके उसे कब्ज़े में ले लिया था, परन्तु इसके बाद ट्रम्प ने अपनी पहले की धमकियों से पीछे हटते अनिश्चितकाल के लिए अपने तौर पर युद्ध-विराम की घोषणा कर दी है परन्तु इससे युद्ध के खत्म होने की सम्भावनाएं नहीं बन सकी। 
ईरान ने होर्मुज़ जलडमरू पर कब्ज़ा किया हुआ है और उसने एक तरह से इस जल मार्ग से अन्तर्राष्ट्रीय जहाज़ों के आवागमन रोका हुआ है। जिससे तेल और गैस की कीमतों के अतिरिक्त अन्य प्रत्येक तरह का व्यापारिक आदान-प्रदान रुक गया है। जिसके कारण ज्यादातर देशों की आर्थिकता पर बड़ा आघात लग रहा है। अमरीका ने भी ईरान की बंदरगाहों की नाकाबंदी की हुई है, जिस कारण ईरान का अन्य देशों के साथ व्यापार बंद हो गया है। उसे हो रहा अरबों डॉलरों का घाटा, उसके लिए ज्यादा समय तक बर्दाश्त कर पाना बेहद मुश्किल होगा। दूसरी तरफ इज़रायल ने लेबनान में हिज़बुल्लाह के ठिकानों पर अपनी बमबारी जारी रखी हुई है और देश के बड़े हिस्से के दक्षिणी भाग को बड़ी सीमा तक बुरी तरह तबाह कर दिया है। ईरान के भीतर भी रैवेल्यूशनरी गार्ड ने पूरी तरह सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया है। जिससे किसी सम्भावित शांति वार्ता की सम्भावनाएं और भी मद्धम पड़ चुकी हैं। यदि अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की ईरान पर हमले करने की विश्व भर में आलोचना हो रही है, तो दूसरी तरफ होर्मुज़ जलडमरू को रोकने के कारण आज ज्यादातर देश ईरान के भी विरुद्ध खड़े दिखाई दे रहे हैं। यहां तक कि उसके साथी चीन ने भी इस अन्तर्राष्ट्रीय समुद्री  मार्ग को बंद किए जाने की आलोचना की है। ऐसे माहौल में अब शीघ्र  युद्ध-विराम होने की सम्भावनाएं मद्धम पड़ गई हैं। स्थिति को सम्भालने और सुधारने के लिए अब अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर और भी बड़े यत्न किए जाने की ज़रूरत है।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

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