युद्ध की भयानकता और भारत के हित

अमरीका-इज़रायल और ईरान के युद्ध को सीधा सरल ढंग से समझना कुछ मुश्किल है। अमरीका इसे नेतृत्व परिवर्तन का युद्ध कह रहा है, जबकि ईरान के लिए यह उसके अस्तित्व का युद्ध बन चुका है। इस युद्ध की जटिलता को कई कोणों से समझने की ज़रूरत है। वे धर्म, तेल, वर्चस्व, कबायली राजनीति, हो सकते हैं। युद्धखोर युद्ध में गिरने वाली इन्सानों की लाशों, बारूद से ध्वस्त इमारतों, पुलों से विचलित नहीं होते। उनका मकसद बड़ा पलटवार ही रहता है।
इस युद्ध का अंत कब और कैसे होगा। सभी देशों के करोड़ों साधारण लोग हृदय तल से चाहते हैं कि युद्ध लम्बा न चले। जल्दी खत्म हो। जबकि इस युद्ध का अंत लड़ाई के मोर्चा पर तय नहीं होने वाला। तेल और वित्तीय बाज़ार भी बड़े निर्णायक सिद्ध होने वाले हैं। ईरान पहले से ही आर्थिक मोर्चे पर पराजित नज़र आता है। उसकी खस्ताहाल मुद्रा भी यही कहती है। रूस से गैस आयात कम हो चुका है। यूरोप अब फारस की खाड़ी से आने वाली एल.एन.जी. पर ज्यादा निर्भर है। ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल आने वाला है।  महंगाई बढ़ेगी और यह ट्रम्प के समर्थकों को नाराज कर सकता है-पहले ही मध्य पूर्व में एक और युद्ध में उलझने के वे पक्षधर नहीं हैं। ताकतवर लोग भी मन ही मन चाहेंगे कि युद्ध छोटा हो, लम्बा न खिंचे। इसी से तय होगा कि ट्रम्प और तेहरान के बीच बातचीत कब और कैसे आगे बढ़ती है। ट्रम्प तेहरान में लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करते हैं, जबकि वेनेजुएला पर हमला, ग्रीनलैंड पर नज़र और ईरान पर हमला लोकतांत्रिक तो नहीं कहा जा सकता। इसी दौरान उनके प्रशासन की घरेलू नीतियां भी सवालों के घेरे में है। इज़रायल की स्थिति भी कम जटिल नहीं है। ऐसे में क्या नेतन्याहू को इस साल प्रस्तावित चुनाव में राजनीतिक बढ़त मिल सकती है?
इस युद्ध में भारत की भूमिका क्या हो सकती है या क्या होनी चाहिए? संकट से निपटने के लिए हमारी सरकार लगता है कि लम्बी तैयारी कर रही है। इस युद्ध को जिसे ‘एपिक फ्यूरी’ कहा जा रहा है-हमारे देश को ‘एपिक रेस्क्य’ू, के प्रयास पर आना होगा। युद्ध अगर जारी रहता है और फैलने का अनुमान है तो भारत सरकार का आकलन है कि मध्य पूर्व का यह युद्ध पूर्ण- स्तरीय संघर्ष का रूप ले चुका है। इसकी दिशा अनिश्चित हो सकती है। ऐसे में भारत की पहलकदमी होगी स्थानीय सरकारों से सहयोग और समन्वय रखते हुए अपने नागरिकों की सुरक्षा।वास्तविकता यह है कि खाड़ी क्षेत्र में हमारे लोग, तेल व्यापार और व्यापक सुरक्षा हित दाव पर हैं। भारत की पहली और महत्त्वपूर्ण प्राथमिकता खाड़ी देशों और मध्य पूर्व के युद्धग्रस्त क्षेत्र में रहने वाले लगभग 90 लाख से एक करोड़ भारतीय पासपोर्ट-धारकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना।  ट्रम्प जल्दी मानने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि ईरान पर हमले तब तक जारी रखेंगे, जब तक यह सुनिश्चित न हो जाये कि ईरान किसी भी प्रकार का खतरा पैदा करने में सक्षम नहीं है। ट्रम्प का यह भी कहना है कि शुरुआत से ही हमने चार से पांच सप्ताह का अनुमान लगाया था, लेकिन हमारे पास इससे कहीं अधिक लड़ने की क्षमता है।

#युद्ध की भयानकता और भारत के हित