इमारतों के भीतर ठंडक, बाहर तपती धरती
समय से पहले अब गर्मी आना अब सामान्य बात हो गई है। जैसे-जैसे पारा चढ़ना शुरू होता है, देश के मध्यम और उच्च व मध्यम वर्ग के घरों, दफ्तरों और कारों आदि में एयर कंडीशनर (एसी) चलने शुरू हो जाते हैं। दशकों पहले जिसे विलासिता का प्रतीक माना जाता था, वह आज भारतीय जीवनशैली का अनिवार्य हिस्सा बन चुका है। लेकिन विडम्बना यह है कि जो उपकरण हमें घर या कार्यालय के भीतर राहत देते हैं, वे बाहर धरती और पर्यावरण को झुलसा रहे हैं। रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर ने आधुनिक दुनिया को आरामदायक बनाया है, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की है और दवाओं के भंडारण को संभव किया है, लेकिन इनकी एक भारी कीमत हम ‘वैश्विक तपिश’ के रूप में चुका रहे हैं।
बदलती सामाजिक धारणा संबंधी हालिया सर्वेक्षणों ने उस पुरानी धारणा को ध्वस्त कर दिया है कि एसी केवल अमीरों की जागीर है। आज भारत के एक बड़े मध्यम और निम्न मध्यम आय वर्ग के परिवारों में एसी की पहुंच तेज़ी से बड़ी है। आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 6.7 करोड़ एसी घरों, दफ्तरों में हैं। इसके अलावा साढ़े पांच करोड़ कारों और लाखों बसों में भी अब एसी लग गए हैं। यह सरकारी आंकड़ा है कि हर साल डेढ़ करोड़ नए एसी बिक रहे हैं। यह बढ़ता बाज़ार आर्थिक समृद्धि का संकेत तो है, लेकिन पर्यावरणीय दृष्टि से एक बड़ी चेतावनी भी।
यह जान लें कि एसी के अंदर एक ‘रेफ्रि जरेंट’ गैस होती है जो कमरे की गर्मी को सोखती है। फिर बाहर लगी यूनिट उस गर्मी को पंखे के जरिए बाहर की हवा में छोड़ देती है। यदि एक ही इमारत या गली में दर्जनों एसी चल रहे हों, तो उस क्षेत्र का स्थानीय तापमान सामान्य से 1.2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इसे शहरों में ‘अर्बन हीट आइलैंड’ प्रभाव कहा जाता है। यही नहीं एसी के भीतर जो गैस (रेफ्रि जरेंट) घूमती है, वह पर्यावरण के लिए सबसे बड़ा खतरा है। आधुनिक एसी में अक्सर हाइड्रोफ्लोरो कार्बन जैसी गैसों का उपयोग होता है। ये गैसें कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में वातावरण को गर्म करने में 1,000 से 3,000 गुना अधिक शक्तिशाली होती हैं। ‘ग्लोबल वार्मिंग पोटेंशियल’ (जीडब्ल्यूपी) एक पैमाना है जो बताता है कि कोई गैस कितनी गर्मी सोखती है। कार्बन डाइऑक्साइड का जीडब्ल्यूपी एक माना जाता है। इसके मुकाबले एसी में इस्तेमाल होने वाली गैसों का जीडब्ल्यूपी अक्सर 1,000 से 2,000 के बीच होता है। इसका मतलब है कि अगर आपके एसी से एक किलो गैस लीक होती है, तो वह वातावरण को उतनी ही गर्मी प्रदान करती है जितनी 2,000 किलो कार्बन डाइऑक्साइड करेगी।
भारत में एसी के रखरखाव और गुणवत्ता को लेकर एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। तकनीकी रूप से एक एसी को पांच साल में केवल एक बार गैस रिफिलिंग की आवश्यकता होनी चाहिए, लेकिन भारत में हकीकत इसके उलट है। यहां लगभग 40 प्रतिशत एसी को हर साल रिफिल किया जाता है। पांच साल से अधिक पुराने 80 प्रतिशत एसी हर साल गैस मांगते हैं और चिंता की बात यह है कि एक तिहाई नए एसी (5 साल से कम पुराने) को भी रिफिलिंग की ज़रूरत पड़ती। यह अनावश्यक रिफिलिंग न केवल पर्यावरण के लिए घातक है, बल्कि आम आदमी की जेब पर भी भारी प्रहार है। वर्ष 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत के एसी ने कुल 32 मिलियन किलोग्राम रेफ्रिजरेंट की खपत की। यदि इस लीकेज की समस्या का समाधान नहीं किया गया तो 2035 तक यह बिल चार गुना बढ़ कर 27,500 करोड़ रुपये तक पहुंच जाएगा।
जब हम उत्सर्जन की बात करते हैं तो अक्सर हमारा ध्यान सड़कों पर दौड़ते वाहनों की ओर जाता है, लेकिन एसी से होने वाला प्रदूषण उससे कम नहीं रह गया है। बिजली की खपत और गैस रिसाव को मिलाकर 2024 में भारत के एसी से होने वाला कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 156 मीट्रिक टन तक पहुंच गया है। यह आंकड़ा कितना बड़ा है कि इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यह भारत की सभी यात्री कारों से होने वाले कुल उत्सर्जन के लगभग बराबर है। सरल शब्दों में कहें तो, आपके घर की दीवार पर लगा वह एसी जो हर दो साल में गैस रिफिल मांग रहा है, वह साल भर में पर्यावरण को उतना ही नुकसान पहुंचा रहा है जितना कि एक कार। अनुमान है कि 2035 तक यह उत्सर्जन बढ़कर 329 मीट्रिक टन हो जाएगा, जिससे एयर कंडीशनिंग क्षेत्र भारत में उत्सर्जन का सबसे बड़ा कारण बन जाएगा। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट बताती है कि वर्तमान में दुनिया भर के भवनों में एसी और बिजली के पंखे कुल बिजली खपत का 20 प्रतिशत हिस्सा सोख रहे हैं। 2050 तक दुनिया भर में एसी की संख्या बढ़कर 5.6 अरब होने का अनुमान है, जिसका अर्थ है अगले 30 वर्षों तक हर सैकेंड 10 नए एसी बिकेंगे।
सरकार, उद्योग और नागरिकों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारी ठंडक की यह चाहत धरती को झुलसाने वाली आग न बन जाए। भारत ने ओज़ोन परत को बचाने का जो संघर्ष जीता था, उसे अब जलवायु परिवर्तन के इस बड़े मोर्चे पर दोहराने की ज़रूरत है।



