पेनिसिलिन दवा की खोज करने वाले महान् वैज्ञानिक अलेक्ज़ेंडर 

पेनिसिलिन एक ऐसी दवा है जो कई बीमारियों में कारगर दवा के रूप में उपयोग की जाती है। यह संसार की पहली एंटीबायोटिक है, जिसका आविष्कार महान वैज्ञानिक अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने सन् 1928 में किया था। उन्होंने प्रथम विश्वयुद्ध की विभीषिका को देखा था। इस युद्ध में हजारों सैनिक जख्म सड़ने की वजह से उनकी मौत हो गई थी। यह घटना उनके दिल-दिमाग को झकझोर कर रख दिया था। यही कारण था कि वे ऐसी दवा की खोज कर रहे थे, जो घाव को भरकर इंसान को जल्द स्वस्थ कर दे और उन्हें इस कार्य में सफलता भी मिली। उन्होंने संसार की पहली एंटीबायोटिक दवा ‘पेनिसिलिन’ का आविष्कार कर दिया। इसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।  पहले रोग के कीटाणु साधारण दवा से नष्ट नहीं होते थे और होते भी थे तो रोग के कीटाणु को नष्ट होने में काफी समय लग जाता था। लंबे समय तक बीमार होने के कारण मरीज काफी कमजोर हो जाता था। एंटीबायोटिक ऐसी दवा है जो रोग के कीटाणुओं को शीघ्र नष्ट कर इंसान को स्वस्थ कर देता है। ये शरीर के लिए रासायनिक यौगिक से बनी औषधियों की तुलना में काफी कम खतरनाक होती है।  रासायनिक यौगिको से शरीर में रोग के कीटाणु नष्ट करने के साथ-साथ कई बार ऐसी स्थितियां आ जाती है जिनसे रक्त के श्वेताणुओं पर हानिकारक प्रभाव पड़ता है। वास्तव में इस प्रकार के पदार्थ कई बार लाभ की जगह हानि भी करते हैं। 
1928 में फ्लेमिंग फोड़े-फुंसियों और गलादाहा (गला पकना) के कीटाणुओं पर शोध कर रहे थे। ये कीटाणु रूधिर को विषाक्त कर देते थे। इन कीटाणुओं को साफ-सुथरी पेट्रीडिशों में उत्पन्न करके रखा जाता था। समय-समय पर पेट्रीडिशों को खोलकर सूक्ष्मदर्शी यंत्र से निरीक्षण किया जाता था। एक बार पेट्रीडिशों की सफाई न होने कारण उन पर फफूंद उत्पन्न हो गया। फफूंद बनना एक गलती थी क्योंकि पेट्रीडिश पूरी तरह साफ नहीं थी। उन्होंने उस मखमली फफूंद की जांच की। यह फफूंद बढ़ती गयी और पेट्रीडिश में जर्मित बैक्टीरियाओं के कालोनियां नष्ट कर रही थी। फ्लेमिंग यह देखकर चकित रह गये कि पेट्रीडिश में रखे बैक्टीरिया फफूंद से निकले स्राव में उपस्थित किसी पदार्थ से नष्ट हो रहे हैं और वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि यह पदार्थ कीटाणुओं की वृद्धि को रोकता है और उनको नष्ट कर सकता है। इसी से वह जीवाणु पदार्थ का निर्माण करने में सफल हुए। 
उन्होंने इस फफूंद को और पेट्रीडिशों में बढ़ाया और उनको तरह-तरह के बैक्टीरियाओं से मिलाया। उन्होंने देखा कि इस पदार्थ में बैक्टीरिया को खत्म करने की अद्भुत क्षमता है। उन्होंने इस पदार्थ को रक्त से मिलाया और उस पर काफी गहन शोध किया तो पाया कि इस पदार्थ का रक्त पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पढ़ता। 
अब उनके सामने यह समस्या खड़ी हो गयी कि इसे भारी मात्रा में कैसे बनाया जाये? उन्होंने काफी अथक प्रयास के बाद इसे भारी मात्रा में बना लिया और इसके सभी गुणों से परिचित हो गये। यह बैक्टीरिया की वृद्धि रोकने के साथ-साथ उनको पूर्ण रूप से नष्ट भी कर देता था।  1938 में उन्होंने प्रोफेसर फ्लोर की सहायता से इस एंटीबायोटिक द्वारा नये उपचार विधि की शुरूआत की। फिर तो पेनिसिलिन को आदर्श रोगाणु नाशक के रूप में प्रयोग किया जाने लगा।  पेनिसिलिन का उपयोग इतना लाभप्रद सिद्ध हुआ कि इसका विभिन्न रोगों के उपचार मे किया जाने लगा और यह इतनी कारगर औषधि थी कि रोगी काफी कम समय में ठीक होने लगा। पेनिसिलिन के सही मात्रा में उपयोग करने से इसका शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। पेनिसिलिन इंजेक्शन के रूप में दिये जाने के अलावा इसके लवण मुंह से भी लिया जाता है। घावों को ठीक करने हेतु मरहम के रूप में भी उपयोग किया जाता है। एक बात ज़रूर है कि कुछ रोगी पेनिसिलिन को उपयोग नहीं कर पाते। ऐसे रोगियों को पेनिसिलिन की सुग्रहिता का परीक्षण के बाद ही पेनिसिलिन देना चाहिए।  मो. 09135014901

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