कहानी-परफेक्शनिस्ट
बस बहुत हो गया। अब मैं तुम्हारे साथ नहीं रह सकता। मैम परफेक्शनिस्ट!’
‘रवि! रवि!’ राशि कुछ समझती-कहती तमतमाते हुए रवि बाहर निकल गया।
अंदर से पूरी तरह टूटी हुई वह सोफे पर बैठ गई। पिछले पंद्रह दिनों से रवि का रवैया बहुत ही अजीब सा लग रहा है, लेकिन पिछले पंद्रह दिनों में रवि के इस व्यवहार को लेकर क्या उसने खुद से कभी प्रश्न किया-क्या उसने रवि को समझने और महसूस करने की कोशिश भी की? घर से ऑफिस,ऑफिस से घर दौड़ते-भागते संभालते ज़िंदगी के पैंतीस साल गुजर गए।
घर हो या ऑफिस दोनों जगह हर काम परफेक्शन के साथ करना उसका स्वभाव में था। मजाल है कि कभी उसका घर अस्त-व्यस्त पड़ा हो या ऑफिस में कोई काम पैंडिंग रहा हो। अपने फ्रेंड सर्कल में उसकी छवि ‘मैम परफेक्शनिस्ट’ के रूप में ही है। यहां तो ठीक है महीने पंद्रह दिनों के लिए जब भारत जाती तो अम्मा भी उसे देख निहाल हो जातीं। मोहल्ले भर में उसके रूप-गुण का बखान करती-‘हमारी राशि भले विदेश में रहे है पर घर-गृहस्थी भी खूब अच्छे से संभाले है सब काम खुद ही करे है और यहां आजकल की लड़की-बहुअन को देखो घर के काम करने में तो इनकी हेठी हो जात है।’
वह सुनकर बस मुस्कुरा देती। सच में अपने घर को चमकाने में वह कोई कसर नहीं छोड़ती। सुबह पांच बजे उठकर सबके लिए नाश्ता-खाना, लंचबॉक्स तैयार कर के किचन समेट खुद भागती-दौड़ती सात चालीस की मैट्रो पकड़ती। कभी बैठने को सीट मिल जाती तो बैग में रखा सैंडविच निकाल कर जल्दी-जल्दी निगल पानी गटक लेती। वैसे प्राइवेसी के नाम पर इस देश में किसी को किसी की परवाह नहीं होती कि सामने वाला क्या कर रहा है। यहां के लोगों की यह बात उसे कभी-कभी अच्छी भी लगती है।
बस हर काम खुद ही करना होता है यह बड़ा खलता है पर अब धीरे-धीरे सब कुछ आदत में शुमार हो गया है।
साफ-सफाई, बर्तन, फल-सब्जी, राशन-पानी सबकुछ कभी उसे तो कभी रवि को ही मैनेज करना होता है। बेटा आदित्य भी सैटल होते ही अलग रहने लगा, बेटी ने भी फिरंगी से शादी करके घर बसा लिया है। बच्चों से उसे कोई गिला शिकवा नहीं। यह सब तो यहां का चलन ही है फिर अपने देश में कौन बच्चे मां-बाप को छाती से चिपकाए घूम रहे हैं। हफ्ते में दो दिन बिटिया आकर ज़रूर रह जाती है।
तीन बरस की नातिन निकी के साथ वह भी बच्ची बन जाती। उसके तोतले बोल तन-मन में नया उत्साह भर देते। उसे लगा कि अब उसे नौकरी को अलविदा कहने का परफेक्ट टाइम आ गया है परिवार के साथ समय गुजारा जा सकता है। यही सोच कर उसने तीन महीने पहले अपना इस्तीफा सौंप दिया था। यहां रिटायरमेंट जैसा कुछ नहीं होता। आप जितने बरस काम करना चाहो कर सकते हो पर अपने इस शरीर को कब तक घसीटेगी? बासठ के बाद उम्र ने चेहरे, आंखों के साथ-साथ कमर और घुटनों पर अपने दस्तखत करने शुरू कर दिए थे। न जाने कितनी उम्र बची है रवि के साथ बचे हुए दिन सुकून से बिताएगी। अभी तक तो सप्ताह के दो दिन, शनिवार और रविवार ही मिलते थे जो घर के कामों...घर की डीप क्लीनिंग, लॉन का मेंटेनेंस और बगीचे की देखभाल, लॉन्ड्री आदि में निकल जाते।
बिटिया शोमा कहती भी ‘मैम परफेक्ट! एक वीक कुछ काम छोड़ दोगी तो आसमान नहीं फट पड़ेगा। अपना और पापा का भी ध्यान रखना सीखो ममा आप।’
वह एक कान से सुनती, दूसरे से निकाल देती। शोमा मुंह बना कर अपने कमरे में सिमट जाती और वह सभी के लिए स्पेशल ब्रेकफास्ट,लंच बनाने में, फिर फर्श, दीवारें और घर चमकाने में रविवार भी निकाल देती। उसके घर का कोना-कोना चमकता रहता। घर के टॉयलेट्स भी में भी कितनी सफाई और सजावट है! वॉश बेसिन के पास कोने में रखा चीनी मिट्टी के फ्लावर वास, सलीके से रखे सफेद झक टावल, सफेद चीनी मिट्टी की ट्रे में वर्ली पेंटिंग वाले हैंड वॉश डिस्पेंसर और ब्रश होल्डर, सफेद सीट मैट्स और शॉवर एरिया के बाहर नरम मोटा सफेद कार्पेट। यूँ तो रवि घर के हर काम में उसके साथ-साथ बराबर लगे रहते पर उसकी सफाई-सफाई के सामने वो घुटने टेक देते।
कभी-कभी रवि कहते ‘यार घर को घर जैसा रहने दो प्लीज! आओ साथ बैठ कर कॉफी पीते हैं कोई पुरानी मूवी देखते हैं।’
इस पर वह चिढ़ कर कहती ‘मेरे पास इन सब के लिए वक्त नहीं है।’ (क्रमश:)



