सैंटर ऑफ एक्सीलेंस : फसली विभिन्नता की ओर अहम कदम
मुख्यमंत्री भगवंत मान ने अपने नीदरलैंड दौरे के बाद पंजाब में ‘सैंटर ऑफ एक्सीलेंस’ (बासमती के लिए उच्च श्रेणी का केन्द्र) स्थापित करने का फैसला लिया है, जो फसली विभिन्नता लाने के पक्ष से प्रशंसनीय कदम है। चाहे धान की काश्त का रकबा कम करके फसली विभिन्नता लाने के यत्नों को ज़्यादा सफलता नहीं मिली। धान की काश्त का रकबा 32 लाख हैक्टेयर से ज़्यादा है, जिसमें से लगभग 7 लाख हैक्टेयर में बासमती की काश्त हो रही है। बासमती विशेषज्ञों के अनुसार पंजाब में 9-10 लाख हैक्टेयर में बासमती की काश्त हो सकती है। भारत प्रत्येक वर्ष 60 लाख टन बासमती विदेश भेजता है, जिससे 50 हज़ार करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा आ रही है। इसमें पंजाब का योगदान 40 प्रतिशत है। अमरीका, यूरोपियन यूनियन, खाड़ी देशों और मध्य-पूर्व के देशों में बासमती की मांग बढ़ रही है। पंजाब की बासमती ‘जी.आई.’ ज़ोन में होने के कारण विदेशों में अधिक पसंद की जाती है। भारत के कई राज्यों में भी बासमती चावल की घरेलू मांग बढ़ रही है।
लम्बे चावल वाली पूसा बासमती-1121 किस्म की विदेशों में बहुत मांग है और यह 4800 रुपये प्रति क्ंिवटल बिक रही है। पूसा बासमती-1847 किस्म 4500 रुपये और पूसा बासमती-1509 किस्म 4300-4400 रुपये प्रति क्ंिवटल बिक रही है। गत वर्ष बेमौसम बारिश के कारण हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश में बासमती का उत्पादन कम हुआ है। बासमती सबसे अधिक ईरान को निर्यात की जाती है, जो अब युद्ध के कारण बंदरगाहों पर पड़ी है, लेकिन सऊदी अरब आदि को जा रही है। विदेशों में बासमती भारत से सस्ती बिक रही है। भारत के प्रसिद्ध बासमती निर्यातक और अखिल भारतीय चावल निर्यातक संघ के पूर्व अध्यक्ष विजय सेतिया के अनुसार बासमती का भविष्य उज्ज्वल है।
पंजाब में धान-गेहूं का फसली चक्र प्रमुख होने के कारण प्राकृतिक स्रोतों का नुकसान हुआ है और भू-जल का स्तर बहुत नीचे जाने से भूमि के सूक्ष्म तत्व नष्ट हो रहे हैं। इसलिए धान की जगह बासमती की काश्त बढ़ाना ज़रूरी है। इससे 20 प्रतिशत पानी बचेगा। मुख्यमंत्री भगवंत मान द्वारा ‘सैंटर ऑफ एक्सीलेंस’ स्थापित करने की घोषणा का स्वागत है। अब मुख्यमंत्री को किसानों की मांग मनवाने के लिए केन्द्र पर दबाव डालकर बासमती के लिए एमएसपी निर्धारित करवानी चाहिए ताकि इस प्रोजेक्ट के लक्ष्यों की पूर्ति हो सके। चाहे मुख्यमंत्री ने नीदरलैंड की एल.टी. फूड कम्पनी का सहयोग लेने की कोशिश की है, जिसने 80 से ज़्यादा देशों में 1 लाख से अधिक किसानों के साथ मज़बूत संबंध बना कर जानकारी साझा की है। यह प्रोजेक्ट की सफलता की ओर एक रचनात्मक कदम है, लेकिन इस प्रोजेक्ट की सफलता के लिए पंजाब कृषि विश्वविद्यालय और इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट (जिसके द्वारा विकसित बासमती की किस्में 80 प्रतिशत से ज़्यादा रकबे में बोई जा रही हैं) को इस प्रोजेक्ट का सहायक बनाना ज़रूरी है। इन दोनों अनुसंधान संस्थानों और कृषि एवं किसान कल्याण विभाग को फसली विभिन्नता लाने के लिए शामिल करना ज़रूरी है, क्योंकि इन अनुसंधान संस्थानों की मदद से किसान फसली विभिन्नता लाने के लिए उत्साहित होंगे। सिर्फ विदेशी मदद पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। हरियाणा में इंडो-इज़रायल प्रोजेक्ट के तहत विदेशी तकनीक से बने पॉली हाउसों के भीषण गर्मी पड़ने से गिरने के कारण किसान इन पॉली हाउसों पर हुए खर्च की वजह से ऋण में जकड़े गए हैं। हरियाणा में उक्त प्रोजेक्ट की विफलता को देखते हुए ‘सैंटर ऑफ एक्सीलेंस’ की सफलता को सुनिश्चित बनाने के लिए पंजाब में काम कर रही भारतीय संस्थाओं को इस प्रोजेक्ट से जोड़ना लाभदायक रहेगा।
भारत अन्य देशों से अधिक बासमती पैदा करता है, जो विश्व के उत्पादन में 70 प्रतिशत से भी अधिक है। पंजाब में 2008-09 के दौरान बासमती की काश्त का रकबा 1.6 लाख हैक्टेयर था, बासमती की सफल किस्में विकसित होने के बाद 2010-11 तथा 2011-12 के बीच क्रमश: 4.5 तथा 5.6 लाख हैक्टेयर हो गया तथा अब बढ़ कर 6.90 लाख हैक्टेयर को भी पार कर गया। पंजाब में बासमती की काश्त बढ़ने की पूरी गुंजाइश है।
पंजाब केन्द्रीय अनाज भंडार में चावल का 32 प्रतिशत हिस्सा डालता है। बासमती की काश्त बढ़ने से पानी तथा प्रदूषण की समस्या का समाधान होगा। ‘सैंटर ऑफ एक्सीलैंस’ स्थापित पर बासमती के उत्पादन में वृद्धि होने से किसानों की आय बढ़ेगी, परन्तु इस प्रोजेक्ट को पीएयू तथा आई.ए.आर.आई. जैसी संस्थाओं के सहयोग से चलाना बेहतर होगा।



