भारत का अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव
चाहे पिछले समय में भारत अनेक राजनीतिक इकाईयों में बंटा रहा। इसके बावजूद अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग शासन स्थापित होते रहे परन्तु इसके बावजूद यह भौगोलिक इकाई ज़रूर बना रहा। ब्रिटिश शासन के समय यह एक इकाई के रूप में स्थापित हो चुका था। चाहे आज़ादी मिलने के समय इसमें नए देश पाकिस्तान की स्थापना हुई। सदियों के सफर के दौरान इसका पड़ोसियों के अतिरिक्त दूर-दराज के देशों के साथ भी किसी न किसी स्तर पर आपसी आदान-प्रदान चलता रहा। विशेष रूप से चीन और अरब देशों के अतिरिक्त केन्द्रीय एशिया के देशों के साथ भी इसके गहरे संबंध बने रहे।
इस लम्बे सफर में अरब और केन्द्रीय एशिया के कई शक्तिशाली हो चुके शहंशाहों ने इस पर आक्रमण भी किया और सैकड़ों वर्ष तक इस पर अपना अधिकार भी जमाये रखा परन्तु आपसी आदान-प्रदान और व्यापार का सिलसिला निरन्तर चलता रहा। देश के आज़ाद होने के बाद यहां की सरकारों ने नज़दीकी और दूर-दराज के देशों के साथ अपनी प्रत्येक तरह की साझ बनाए रखने की नीति अपनाई, जिसे बड़ा समर्थन मिलता रहा। विशेष रूप से उस समय अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उभरी बड़ी शक्ति सोवियत यूनियन ने भारत के साथ उद्योग, कृषि और सभ्याचार के रूप पर अपनी प्रत्येक तरह की साझ बनाने की नीति अपनाई, उस समय सोवियत यूनियन की ओर से दिए गए निरन्तर सहयोग का भारत को भारी लाभ हुआ था और इसकी आर्थिकता को भी प्रोत्साहन मिला था। इसी समय एशिया के मज़बूत हो चुके देश जापान ने भी व्यापक स्तर पर भारत के साथ सहयोग बढ़ाया और यहां की ज़रूरतों की पूर्ति के लिए देश के मूलभूत ढांचे को मज़बूत बनाने के लिए बड़ा सहयोग दिया। फ्रांस जैसे यूरोपियन देश ने भी रक्षा के क्षेत्र के अतिरिक्त अन्य प्रत्येक तरह के उत्पादन में भी भारत को प्राथमिकता के आधार पर सहयोग देना जारी रखा। अब पिछले कुछ वर्षों से विश्व भर के देशों के साथ भारत का प्रत्येक तरह का व्यापारिक सहयोग बढ़ा है और इसने आश्चर्यजनक ढंग से बहुत से छोटे बड़े देशों के साथ व्यापारिक समझौते किए हैं, जिनसे यह भी महसूस होता है कि अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर भारत के प्रभाव को स्वीकार किया जाने लगा है और ज्यादातर देश इसके साथ प्रत्येक तरह की साझ बनाने को प्राथमिकता दे रहे हैं।
पिछले कुछ वर्षों में भारत ने 38 देशों के साथ व्यापारिक समझौते किए हैं और इन समझौतों के दौरान इस बात का पूरा ध्यान रखा गया है कि देश के कृषि क्षेत्र से लेकर अन्य घरेलू उत्पादों को ़गैर-ज़रूरी व्यापारिक मुकाबले से अपने ढंग-तरीके से सुरक्षित रखा जाए। वर्ष 1921 में अफ्रीकन देश मॉरीशस के साथ शुरू हुए समझौते के बाद इस क्षेत्र में देश ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। आगामी वर्ष इसने तेल के साथ भरपूर क्षेत्र यूनाइटेड अरब अमीरात के साथ आर्थिक भागीदारी संबंधी समझौता किया और उसके बाद ऑस्ट्रेलिया जैसे विशाल देश के साथ आर्थिक और व्यापारिक समझौते को सफल बनाया। ब्रिटेन जैसे देश ने भारत के साथ अलग-अलग क्षेत्रों में प्राथमिकता के आधार पर समझौते किए और सबसे महत्त्वपूर्ण भारत और यूरोपियन यूनियन के बीच समझौता था। इस संगठन में यूरोप के 27 देश शामिल हैं। वर्ष 2025 में इसने स्विटज़रलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लीथटनस्टाइन के साथ 100 बिलियन डॉलर का अनुमानित समझौता किया। आसियान देश जिनमें फिलिपींस, मलेशिया, सिंगापुर, थाइलैंड और वियतनाम सहित 10 देश शामिल हैं, के साथ मुक्त व्यापार समझौते को सफल बनाया। दक्षिण एशियाई देशों के साथ किए गए ऐसे समझौतों में अ़फगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, मालद्वीप, नेपाल और श्रीलंका शामिल हैं।
विगत दिवस न्यूज़ीलैंड के साथ भी ऐसा ही मुक्त व्यापार समझौता किया गया है, जिसके तहत आगामी वर्षों में न्यूज़ीलैंड भारत में 1,89,300 करोड़ रुपये का निवेश करेगा। इसमें यह ध्यान रखा गया है कि देश के कृषि उत्पाद प्याज, मटर, मक्की, बादाम, चीनी, शहद आदि को सुरक्षित रखा जाएगा। इसके अतिरिक्त न्यूज़ीलैंड भारत के इंजीनियरों, डाक्टरों, हैल्थ केयर पेशेवरों के लिए प्रत्येक वर्ष 5000 विशेष वीज़ा जारी करेगा। उपरोक्त विस्तार से यह बात सुनिश्चित प्रतीत होती है कि आगामी दिनों में भारत की आर्थिकता और भी मज़बूत होगी और देश ऐसे विकास के मार्ग पर चलेगा, जिसके लाभ यहां बड़ी संख्या में आम लोगों तक पहुंच सकें। हमारी सरकारों द्वारा प्राथमिक रूप से अपनाई गई ऐसी नीति देश को सही अर्थों में विकास के मार्ग पर लाने में समर्थ होगी।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

