कितना सह लेगा! आखिर दिल ही है


जैसे इंजन में पिस्टन कार्य करता है, बिल्कुल उसी तरह ही सभी जीव-जंतुओं, खासतौर पर मानव शरीर में दिल कार्य करता है। पिस्टन तेल को पम्प करता है परन्तु दिल लहू को, ताकि शरीर के अलग-अलग अंगों में यह पहुंचता रहे और वह सुचारू और सही ढंग से अपने-अपने कार्य करते रहें। देखने को तो यह मांस का टुकड़ा-सा लगता है। परन्तु है बहुत कमाल की चीज़। तब भी इसको ढेर सारे दुख सहन करने पड़ते हैं। जिस तन लागे, सो तन जाने, कौन जाने पीर परायी! बच्चे का दिल ‘अकेला निर्मल नीर की तरह साफ और स्वच्छ ही नहीं, बल्कि बहुत ही मासूम होता है। न कोई लालच, न कोई वैर-विरोध, न झूठ, न फरेब। वह तो प्रत्येक के साथ ही हंसना-खेलना चाहता है, चाहे वह राजा हो या रंक। और दूसरों को भी अपने जैसा ही समझता है। हंसी की फुहारें बिखेरता है या इस तरह कह लें कि उसका हंसना-खेलना ही सभी को मोह लेता है, दुनिया भी इस रंग में रंग जाती है। शायद इसी कारण ही बच्चे को भगवान का रूप कहा जाता है।’ज्यों ही बच्चा थोड़ा-सा बड़ा होता है अर्थात् बचपन में पांव रखता है तो उसके पवित्र दिल में कुछ मिलावट होनी शुरू हो जाती है। जैसे खाद्य पदार्थों में हो रही है। लाड-प्यार में ही थोड़ा-थोड़ा झूठ बोलना, हेरा-फेरी करना, वल-छल खेलना, दूसरों को ठगना आदि दुनियावी कार्यों में उसकी रुचि और बढ़ जाती है और डांट का सिलसिला शुरू हो जाता है। परिणामस्वरूप उस मासूम दिल को गहरी चोट पहुंचती है। परन्तु यहां भी दुनियादारी की बात है वह शरारतें करता है, मज़े लेता है और डांट सहन करता है।
माता-पिता बहुत ही चाव और खुशियों से अपने बच्चों को स्कूल-कालेज भेजते हैं। जिन बच्चों ने कुछ करके दिखाना होता है, अपने रंगीन सपनों को पूरा करना होता है या समाज की सेवा में जुट जाना होता है; वह तो अपनी-अपनी पढ़ाई में लीन हो जाते हैं। परन्तु कुछेक इश्क में पड़ जाते हैं; कभी सिनेमा घर, कभी पार्कों की सैर, कभी कॉफी हाऊस और कभी रैस्टोरैंटों में पैग-शैग लगाने से भी संकोच नहीं करते। विद्वानों का कहना सत्य है ‘लगदी किसे न देखी, टुट्टदी नूं जग्ग जाणदा’। और इसका सारा दुख अकेले दिल को ही सहन करना पड़ता है। कई झूठी शिकायतों के शिकार हो जाते हैं कि उसने मुझे चाक मारा हैं, उस समय उसका दिल पसीज जाता है। माता-पिता और अध्यापकों द्वारा तरह-तरह की डांट, पढ़ाई की चिंता, यारों-दोस्तों के साथ झगड़े या मन-मुटाव आदि दिल को और भी दुखी करते हैं।आज के दौर में स्वयं को स्थापित करना कोई आसान कार्य नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति एक-दूसरे से आगे निकल जाना चाहता है। यह भी सत्य है कि जो बोया होता है वही काटना होता है। परन्तु आजकल इस तरह नहीं हो रहा है। हर तरफ ही भ्रष्टाचार का बोलबाला है। हक छीनने की आदत कम नहीं हुई, बल्कि दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारा हक छीनकर ले जाता है, हम हाथ मलते ही रह जाते हैं। दिल को और सदमा पहुंचता है। वह रोता है जिसकी आवाज़ उसके सिवाये अन्य किसी को सुनाई नहीं देती। यह बात कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी कि साफ-स्वच्छ जीवन-मूल्य ही एक ठोस समाज का निर्माण करते हैं। इस सामाजिक घटनाक्रम को मुख्य रखते हुए अभिभावक अपने बच्चों का विवाह खुशी-खुशी से रचाते हैं। परन्तु, विवाद तो वहां भी हो जाता है। कभी साथी पसंद नहीं आता और कभी अभिभावकों द्वारा अपने लाडले बच्चे की पसंद को सरेआम रद्द किया जाता है; दिल को गहरा सदमा पहुंचता है। और कभी हीर नाराज़ हो जाती है, और कभी माही। परन्तु फूलों की बगीची महकती रहती है और परिणामस्वरूप छोटे-छोटे लाल घरों में खेलते हैं, बहुत ही प्यारे-प्यारे लगते हैं परन्तु गृहस्थ जीवन की मुश्किलें कौन-सी कम हैं? कभी बच्चे का कान दर्द करता है और कभी बुखार हो जाता है। यहां तक कि बच्चों की आसमान छूती मांगों को पूरा करना इतना आसान नहीं। यह सब कुछ बेचारे दिल को ही सहन करना पड़ता है।परन्तु, जब कोई व्यक्ति जीवन में गद्दारी कर जाये तो दिल को गहरी चोट पहुंचती हैं तो वह पसीजा जाता है; बार-बार यही कहता है ‘सज्जनां ने फुल्ल मारयां, गोरी गल्ल उत्ते नील पिया’। बेशक आंगन में लाख खुशियां खिलती हों, परन्तु यारों-दोस्तों का प्यार पीछा नहीं छोड़ता। आखिर दिल ही है! कितना सह लेगा।

— 402 ई, शहीद भगत सिंह नगर, लुधियाना-141013