उप-चुनावों के संकेत 


पंजाब के विधानसभा की शाहकोट की सीट के अलावा देश के अलग-अलग राज्यों में 4 लोकसभा तथा 11 विधानसभा सीटों पर हुए उप-चुनावों के परिणाम कई पक्षों से चौंकाने वाले भी हैं और दिलचस्प भी। अगले वर्ष लोकसभा के चुनाव होने जा रहे हैं। चाहे इस चुनाव के इन परिणामों संबंधी आगामी लोकसभा चुनावों के बारे में कोई ठोस परिणाम तो नहीं निकाले जा सकते परन्तु इनसे हवा का रुख देखा जा सकता है। पंजाब में शाहकोट की सीट जो पहले लोहिया क्षेत्र के साथ  थी, में अकाली दल का बड़ा आधार माना जाता रहा है। ज्यादातर यहां से अकाली उम्मीदवार चुनाव जीतते रहे हैं। यह सीट जत्थेदार अजीत सिंह कोहाड़ के निधन के बाद खाली हुई थी। जत्थेदार कोहाड़ पूर्व अकाली-भाजपा सरकार के समय कैबिनेट मंत्री थे। उनका क्षेत्र में बोलबाला था। चाहे वह कई पक्षों से विवादपूर्ण शख्सियत भी बने रहे थे। इस सीट पर कांग्रेस के उम्मीदवार हरदेव सिंह लाडी शेरोवालिया की बड़ी जीत यह प्रकट करती है कि चाहे कांग्रेस के एक वर्ष के शासन के दौरान अधिकतर लोग कई पक्षों से सरकार की कारगुज़ारी से खुश नज़र नहीं आते थे परन्तु अकाली-भाजपा के प्रशासन से आम लोगों का जो मोह भंग हुआ था, उसका असर आज तक बरकरार है, जिस पर विशेष तौर पर अकाली दल को संजीदा होकर आत्म-चिन्तन करने की ज़रूरत है। इसके साथ-साथ इस पक्ष से भी सचेत होने की ज़रूरत है कि लोगों के टूटे विश्वास को पुन: किस तरह कायम किया जा सकता है। ऐसा जन हितों के लिए समर्पण की भावना से ही सम्भव हो सकता है। नि:संदेह अकाली दल की यह हार नामोशीजनक कही जा सकती है।4 लोकसभा और 11 विधानसभा सीटों पर हुए उप-चुनावों के परिणाम भारतीय जनता पार्टी के लिए भी खतरे की घंटी कहे जा सकते हैं। चाहे अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बड़ा प्रभाव बना नज़र आता है परन्तु उप-चुनावों के परिणामों ने दिखाया है कि उनका करिश्मा भी अब धीरे-धीरे कम होना शुरू हो गया है। उनके द्वारा विकास के नाम पर कई तरह की शुरू की गई योजनाओं और बड़े प्रोजैक्टों के बावजूद लोगों का असंतोष बढ़ा है। सैद्धांतिक तौर पर भी आज देश जिस भावना और मानसिकता से जुड़ा दिखाई देता है, भारतीय जनता पार्टी की सैद्धांतिक नीतियां इन भावनाओं से मेल खाती नहीं प्रतीत होतीं। आम तौर पर जो विश्वास बन रहा है कि भाजपा की सरकार ने जहां सामाजिक ढांचे की नींवों को हिलाया है, वहीं देश में साम्प्रदायिक रंगत भी अधिक गहरी हुई है, जिसका अनुमान उस समय ही लग गया था, जब मार्च के महीने में उत्तर प्रदेश में लोकसभा के हुए गोरखपुर तथा फूलपुर के चुनावों में भाजपा को हार मिली थी। यह सीटें योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्या के इस्तीफों से खाली हुई थी। योगी को उत्तर प्रदेश के हुए विधानसभा के चुनावों के बाद मुख्यमंत्री बनाया गया था तथा मौर्या को उप-मुख्यमंत्री बनाया गया था। खाली हुई इन दोनों सीटों पर भाजपा की हार ने बहुत बड़े सवाल खड़े कर दिए थे।  अब उत्तर प्रदेश में केराना लोकसभा क्षेत्र के हुए चुनाव में राष्ट्रीय लोक दल को जीत प्राप्त हुई है। भाजपा का उम्मीदवार यहां से चुनाव हार गया है। इससे पूर्व यह सीट भाजपा के पास ही थी। चाहे महाराष्ट्र में पालघर में भाजपा ने लोकसभा की सीट जीत ली है परन्तु इससे पहले भी यह सीट इसी पार्टी के पास ही थी। महाराष्ट्र में ही भंडारा गोंदिया सीट जो पहले भाजपा के पास थी, पर नैशनल कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार का जीतना भाजपा के लिए खतरे की घंटी अवश्य है। उत्तर प्रदेश विधानसभा में भाजपा द्वारा खाली हुई नूरपुर सीट से भाजपा की बजाय समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार का जीतना भी भाजपा के लिए हानिकारक माना जा रहा है। इन चुनावों से एक बात स्पष्ट रूप में सामने आई है कि जिन क्षेत्रों में विपक्षी पार्टियों ने एकजुट होकर भाजपा का मुकाबला किया है, वहां उन्होंने जीत हासिल की है। गत कुछ महीनों से देश भर में अधिकतर विपक्षी पार्टियां भाजपा के खिलाफ मोर्चाबंदी करती नज़र आ रही हैं। देश के बड़े राज्यों में मिली उनको सफलता से इन पार्टियों के हौसले और भी बुलंद हुए हैं। इस बात की सम्भावना बढ़ी है कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भी विपक्षी पार्टियां मिल कर भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती हैं परन्तु इस उद्देश्य के लिए उनको अनेक चुनौतियों से अवश्य गुज़रना पड़ेगा। नि:संदेह इन उप-चुनावों ने भाजपा विरोधी प्रभाव को परिपक्व किया है।

-बरजिन्दर सिंह हमदर्द