अंडमान के काले पानी से सियालकोट के गांव गलोटियां तक 

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी हरप्रीत सिंह सिद्धू के इंडो-तिब्बत सीमा बल से तबदील होकर पंजाब पहुंचने से मेरी यादें के आधी सदी पुराने द्वार खुल गए हैं। वह प्रसिद्ध पंजाबी कवि दीवान सिहं काले पानी की बेटी इंद्रा बल्ल के दामाद हैं। मेरे इस परिवार से संबंधी नई दिल्ली के इंडिया कॉफी हाऊस के माध्यम से ऐसे बने कि समय के साथ और गहन होते रहे हैं। हरप्रीत के ससुर आनन्द कुमार सिंह बल्ल उर्फ नंदी जालन्धर वाले इंडिया कॉफी हाऊस के चर्चित पात्र थे। जिस मेज़ पर वह बैठते थे, वहीं जालन्धर के लेखक तथा पत्रकार इकट्ठे होकर विश्व भर के विकास कार्यों तथा राजनीति का लेखा-जोखा करते। जब कभी मेरा भी दिल्ली से पंजाब आना होता तो मैं इस महफिल में उपस्थित होकर खुश होता।
जहां तक दीवान सिंह काले पानी का संबंध है, वह पाकिस्तान के सियालकोट ज़िले के गांव गलोटियां के निवासी थे। उनका काव्य संग्रह ‘वगदे पानी’ मेरी कालेज की पढ़ाई के समय मेरे पाठ्यक्रम का हिस्सा था। हमें पढ़ाने वाले अध्यापक बताते थे कि दीवान सिंह पेशे के रूप में डाक्टर थे और पोर्ट ब्लेयर (अंडमान तथा निकोबार) में डाक्टरी करते हुए वह पंजाब स्टडी सर्कल पोर्ट ब्लेयर की अध्यक्षा तथा समाज सेवा भी करते थे। उन्हें जापानियों ने कैद करके इतनी यातनाएं दीं कि उनका निधन हो गया। आज तो उनके नाम पर पोर्ट ब्लेयर में गुरुद्वारा है और चंडीगढ़ के निकट सिस्वा (कुराली-कालका मार्ग) के समीप डाक्टर दीवान सिंह काले पानी संग्रहाय स्थित है, जहां उनके जीवन पर बनी फिल्म भी दिखाई जाती है। उनके जीवन तथा उपलब्धियों बारे पुस्तकें लिखने वालों में से सुरिन्दर गिल तथा स्वर्गीय सूबा सिंह पंजाबी साहित्य संसार के जाने-पहचाने नाम हैं। हरदियाल सिंह ने तो उनके बारे में अपनी रचना का नाम ही ‘इक सुनहरी दिल’ रखा है। 
हरप्रीत सिद्धू को जीवन का साथ देने वाली पारो थल सिद्धू पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में प्रचीन इतिहास विभाग की प्रमुख हैं, जिनके मामा हरवंत सिंह ढिल्लों कनाट प्लेस नई दिल्ली वाले इंडिया कॉफी हाऊस में मुझे मिले तथा मई माह में श्वास त्यागने तक ऐसे मित्र रहे कि मैं पचास वर्षों से अधिक उनके परिवार का सदस्य बना हुआ हूं। हरवंत समाज विज्ञान के विशेषज्ञ थे, जो भारत सरकार के स्वास्थ्य मंत्रालय की सैंट्रल हैल्थ एजुकेश्न ब्यूरो के प्रमुख रहे। यह सबब की बात है कि मेरी जीवन साथी सुरजीत कौर भी उनके बाद इस ब्यूरो की प्रमुख रह चुकी हैं, जिस नाते मेरा ढिल्लों परिवार के साथ दोहरा संबंध बन गया और आज तक है। यह बात भी बताने वाली है कि हरवंत कई वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यू.एच.ओ.) में तैनात रहे हैं, जिस नाते उन्होंने मेरी पत्नी सुरजीत को दो माह के लिए मालदीव के द्ववीपों में भिजवाया। 
डा. दीवान सिंह का परिवार खुले विचारों वाला है और जिस किसी को अपना बनाता है, उससे पूरी तरह निभता और निभाता है। उनका एक बेटा महिन्दर सिंह पोर्ट ब्लेयर के कालेज का प्रिंसीपल रहा है और उनकी जीवन साथी गुरदर्शन कौर उस कालेज में अंग्रेज़ी की प्रोफैसर। महिन्दर सिंह का जन्म डस्का तहसील के गांव गलोटियां का था, जहां मैं अपने पाकिस्तान दौरे के समय नहीं जा सका, जिसका मुझे बहुत अफसोस है। डा. दीवान सिंह की बड़ी बेटी सुदर्शन कौर के स्वाभाव की मिसाल देनी हो तो उसने जाति-बिरादरी के बाहर के व्यक्ति श्री सदन मोहन पांडे से विवाह किया था, जो अच्छा निभा। मैं लिख चुका हूं कि ताज़ा कालम के नायक हरप्रीत सिंह सिद्धू हैं, जिनकी पंजाब वापसी ने मुझे भूली बातें याद करवा दीं। उन्हें मैं सिर्फ उनके विवाह वाली पार्टी में ही मिला था, जहां हम दोनों ने एक-दो मज़ाक ही साझा किए थे। उनकी बात भी करेंगे, परन्तु पहले मैं इनता बता दूं कि पंजाब में कैप्टन अमरिन्दर सिंह की सरकार के समय हरप्रीत नशा छुड़ाओ विशेष टास्क फोर्ट के प्रमुख रह चुके हैं और छत्तीसगढ़ में केन्द्रीय रिज़र्व पुलिस बल के अधिकारी भी। उनकी सीधी-स्पष्ट बातचीत तथा हाज़िर-जवाबी उनका प्रमुख गुण है और विपरीत अर्थ निकालने वाले इस गुण को उनके विरोध में भी इस्तेमाल करते रहे हैं। 
अब पंजाब सरकार उन्हें कौन-सा पद देती है, यह तो समय ही बताएगा, परन्तु मैं ताज़ा कालम उन दो सम्प्रदायों के साथ समाप्त करता हूं जो उनके विवाह की पार्टी के समय हमने एक-दूसरे के साथ साझा किए थे। मैंने उनसे मिलते ही सिर्फ इतना ही कहा था, ‘चलो! एक बात तो हुई कि अब मैं अपने विरोधी का कत्ल बड़ी बेफिक्री से कर सकता हूं।’  
मैंने अभी पूरी सांस भी नहीं ली थी कि मुझे उत्तर मिला, ‘आप यह कार्य स्वयं क्यों करोगे! हमें बता देना।’
अंतिका
(बाबा नज़मी) 
बे-हिम्मते ने जिहड़े बहि के 
शिकवा करन मुकद्दरां दा,
उग्गण वाले उग्ग पैंदे ने 
सीना पाड़ के पत्थरां दा।
मंज़िल दे मत्थे दे उत्ते 
तख्ती लगती उन्हां दी,
जिहड़े घरों बणा के तुरदे 
नक्शा अपने सफरां दा।

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