चिंता का विषय है लोगों में कम हो रही सहनशीलता 

एक समय था जब लोग एक-दूसरे की हर छोटी-बड़ी बात हंस कर सहन कर लेते थे। समाज और परिवारों में आपसी संयोग था और किसी को किसी से कोई ईर्ष्या नहीं थी। विद्यार्थी और अध्यापक का रिश्ता बहुत सहज था और अध्यापक की डांट सुन कर भी विद्यार्थी अपने भीतर अपने गुरु के लिए सम्मान कम नहीं करता था। गलियों और मोहल्लों में लोग एक-दूसरे के साथ मिलकर बैठते थे और एक-दूसरे के भागीदार बनते थे। घरों-ज़मीनों के विवाद घर या पंचायत में आपसी सहमति से ही सुलझा लिए जाते थे और एक-दूसरे से झगड़ा करने की नौबत नहीं आती थी।
अब बात करते हैं कि वर्तमान समय में मनुष्य में खत्म हो रही सहनशीलता की। कोई समय था, जब प्रत्येक घर में सात-आठ बच्चे होते थे और संयुक्त परिवार आपस में एक की चूल्हे पर खाना बनाते और इकट्ठे बैठ कर खाते थे। इसके विपरीत आज एक या दो बच्चों वाले घरों में भी पहले जैसा आपसी सहयोग तथा प्यार खत्म हो चुका है। घरों-परिवारों में आपसी ईर्ष्या इस तरह बढ़ चुकी है कि बच्चे एक-दूसरे को सहन नहीं करते। एक-दूसरे की तरक्की सबको चुभती है और एक-दूसरे को आगे बढ़ते देख सब एक-दूसरे की राह में बाधाएं डालते दिखाई देते हैं। समाज में प्रतिदिन ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं। कार पार्किंग जैसी छोटी-छोटी बातों को लेकर लोग एक-दूसरे की हत्या करने के लिए एक मिनट नहीं लगाते।
विद्यार्थी भी अब वे विद्यार्थी नहीं रहे जो अध्यापक की मार और डांट भी चुपचाप सह लेते थे, अपितु आज के बच्चों में सहनशीलता इतमी कम हो गई है कि वे अध्यापक के ज़रा-सा डांट देने पर या तो स्वयं गलत कदम उठा लेते हैं या अध्यपाक का नुकसान कर देते हैं। एक अध्यापक होने के नाते मैं इस प्रचलन को बहुत नज़दीक से देखता और महसूस करता हूं। आजकल के पति-पत्नी में भी आपसी कटुता इस तरह बढ़ चुकी है कि तलाक तक की नौबत आ जाती है। कोई समय था, जब मित्र एक-दूसरे के लिए जान की बाज़ी लगा देते थे और आज हम प्रतिदिन सोशल मीडिया तथा समाचार पत्रों में पढ़ते-सुनते है कि दोस्त ने चंद रुपयों के लिए अपने दोस्त की हत्या कर दी। इससे घोर कलियुग क्या होगा कि ज़मीन के लिए पुत्र पिता की हत्या कर रहा है और भाई, भाई को मार रहा है। पिछले दिनों एक समाचार ने दिल दहला दिया कि एक साडू ने दूसरे साढू की हत्या कर दी, और जब मारने वाले से कारण पूछा तो उसने बताया कि मेरे ससुर मेरे साढू की अधिक मेहमान-नवाज़ी करते थे, जिस कारण मुझे गुस्सा आता था। ऐसे असंख्य उदाहरणों ने भी लोगों में आपसी दुश्मनी तथा असहनशीलता पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज विश्व की सबसे बड़ी आबादी वाले हमारे देश में सोशल मीडिया के लिए लोग जिस प्रकार पागल हैं, वह किसी से छुपा नहीं। सोशल मीडिया पर एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते लोग आम देखे जाते हैं और कई बार तो एक-दूसरे की हत्या करने तक की नौबत इस सोशल मीडिया पर हुई बहस के कारण आ जाती है। सोशल मीडिया ने लोगों को फायदे के साथ-साथ नुकसान भी बहुत पहुंचाया है। हम भीतर से इतने कमज़ोर हो चुके हैं कि किसी को एक की दो सुनाने के लिए एक मिनट लगाते हैं। कई बार तो लोग गाड़ी का हार्न बजाने पर ही लड़ने लग जाते हैं। यदि आप किसी की भलाई बारे सोचते हुए उसे मोटरसाइकिल या स्कूटर धीरे चलाने के लिए कहते हैं तो वह झगड़ने लगता है। आज गलियों-मोहल्लों में कूड़ा फैंकने को लेकर लोगों की आपस में दुश्मनी हो जाती है, जिस कारण कई बार बड़ा नुकसान हो जाता है। मनुष्य ने आज आधुनिक साज़ो-सामान से अपने जीवन को जितना आसान कर लिया है, उतना ही उसने स्वयं को भीतर से कमज़ोर कर लिया है। उसके भीरत सहनशीलता खत्म होने के कारण उसने स्वयं के लिए अनेक समस्याएं पैदा कर ली हैं। आजकल घरों में सास-बहु में झगड़ा आम देखने-सुनने को मिल जाता है, क्योंकि एक-दूसरे को सुनने-समझने की समर्था बिल्कुल खत्म हो चुकी है और पीढ़ी बदलने के कारण विचारों में आए अंतर को दोनों समझना नहीं चाहतीं। आजकल नौकरियों और व्यापार के पक्ष से भी एक-दूसरे की तरक्की को देखने की सहनशीलता लगभग समाप्त हो गई है, क्योंकि कोई भी किसी को अपने से आगे बढ़ता नहीं देखना चाहता। इस कारण भी आपसी दुश्मनी पैदा होने के कारण आए दिन घटनाएं घटित होती रहती हैं। किसी बात को समझे बिना लोग तुरंत भड़क जाते हैं। आज लोगों के सामने सबसे बड़ी चुनौती स्वयं पर नियंत्रण रखने की है। आवश्यकता है कि समाज तथा घर-परिवार में बढ़ रही असहनशीलता को रोका जाए और यह सब हम स्वयं पर नियंत्रण करके ही कर सकते हैं। यह तभी सम्भव है, यदि हम अपने फज़र् को पहचानते हुए समाज के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियां निभाएं और एक सभ्य जीवनशैली अपनाएं। -मो. 94174-79449

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