डिजिटल संप्रभुता बनाम अदृश्य वैश्विक शक्तियां

समकालीन दुनिया में जहां एक ओर स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मानवीय मूल्यों की प्राप्ति के लिए मानवीय सभ्यता निरंतर प्रयासरत है, वहीं दूसरी ओर ‘अदृश्य वैश्विक शक्तियां’ एक नए प्रकार के साम्राज्य की नींव को लगातार अधिक सुदृढ़ करती जा रही हैं। यह साम्राज्य पारंपरिक औपनिवेशिक सत्ता से भिन्न है क्योंकि इसका विस्तार न तो प्रत्यक्ष सैन्य शक्ति के माध्यम से होता है और न ही भौगोलिक सीमाओं तक सीमित रहता है। इसके विपरीत यह साम्राज्य तकनीक, सूचना, डेटा और डिजिटल संरचनाओं के माध्यम से विश्व को प्रभावित और नियंत्रित करने की क्षमता रखता है। ये अदृश्य वैश्विक शक्तियां अत्यंत प्रभावशाली हैं, जो न केवल आर्थिक गतिविधियों को बल्कि सामाजिक व्यवहार, राजनीतिक विमर्श और नागरिक चेतना को भी प्रभावित कर रही हैं। परिणामस्वरूप मानव की स्वतंत्र सोच, निर्णय लेने की क्षमता और सामाजिक आचार-विचार धीरे-धीरे बाहरी, तकनीकी रूप से संचालित शक्तियों द्वारा निर्धारित होने लगे हैं। 
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, सर्च इंजन और डिजिटल नेटवर्क अब केवल संचार और मनोरंजन के साधन नहीं रह गए हैं, बल्कि वे सत्ता के नए केंद्र बनते जा रहे हैं। डिजिटल अद्रश्य शक्तियां इतनी ताकतवर हैं कि वह किसी देश में राजनीतिक सत्ता की स्थापना कर सकती हैं और इस किसी को सत्ता से हटा भी सकती हैं। डिजिटल ताकतें किस देश में कब क्या करेंगी, किसी को कुछ पता नहीं। यदि मानवीय सभ्यता के इतिहास पर दृष्टि डाली जाए तो यह स्पष्ट होता है कि सभ्यताओं के उत्थान और पतन में प्रौद्योगिकी ने सदैव एक निर्णायक भूमिका निभाई है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान डिजिटल क्रांति तक, तकनीक नवाचारों ने सत्ता संरचना, आर्थिक संबंधों और सामाजिक व्यवस्था को व्यापक स्तर पर प्रभावित किया है।
इतिहास इस बात का साक्षी है कि सभ्यताओं में हज़ारों युद्ध हुए जिनका प्रमुख उद्देश्य अन्य राज्यों या क्षेत्रों पर राजनीतिक, आर्थिक और सामरिक नियंत्रण स्थापित करना था, परंतु आधुनिक युग में यह संघर्ष और अधिक जटिल रूप धारण कर चुका है। अब नियंत्रण केवल भू-क्षेत्रों या संसाधनों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सूचना, डेटा, डिजिटल प्लेटफॉर्म और तकनीकी ज्ञान पर केंद्रित हो गया है। इस संदर्भ में तकनीक की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। तकनीक एक ओर विकास, समृद्धि और ज्ञान के विस्तार का माध्यम है, तो दूसरी ओर यह प्रभुत्व, वर्चस्व और नियंत्रण के नए आयाम भी प्रस्तुत करती है। वर्ष 2024 की विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआईपीओ) की रिपोर्ट के अनुसार, अमरीका, चीन और रूस प्रौद्योगिकी अनुसंधान एवं विकास में सर्वाधिक निवेश करने वाले देश हैं। ये देश अरबों डॉलर तकनीक नवाचारों पर इसलिए व्यय कर रहे हैं ताकि वैश्विक डिजिटल युग का नेतृत्व किया जा सके और डिजिटल संसाधनो के माध्यम से अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था पर प्रभाव स्थापित किया जा सके। यद्यपि उपनिवेशवाद का तो अंत हो चुका है किंतु इस नव-उपनिवेशवाद ने अपनी जड़ें गहराई से जमा ली हैं। इस नव-उपनिवेशवाद की मूल संरचना प्रौद्योगिकी पर आधारित है, जो प्रौद्योगिकी पर नियंत्रण स्थापित करेगा, वही विश्व पर राज करेगा।
इसी पृष्ठभूमि में डिजिटल संप्रभुता की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। डिजिटल संप्रभुता का आशय किसी राष्ट्र की उस क्षमता से है जिसके माध्यम से वह अपने डिजिटल संसाधनों, नागरिकों के डेटा, प्रौद्योगिकी संरचना और साइबर स्पेस पर स्वतंत्र नियंत्रण स्थापित कर अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सके। भारत सहित विश्व की कई उभरती अर्थव्यवस्थाएं इस दिशा में प्रयास कर रही हैं। 
भारत ने डिजिटल संप्रभुता की सुरक्षा के लिए कई कदम उठायें हैं, जैसे कि आधार, यूपीआई, डिजीलॉकर और डिजिटल सार्वजनिक संरचना, भारत के ऐसे प्रयास हैं, जो प्रौद्योगिकी आत्मनिर्भरता की दिशा में सकारात्मक संकेत देते हैं। भारत सरकार ने एक ओर राष्ट्रीय सुरक्षा और डेटा संरक्षण के हित में कुछ विदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाया, वहीं दूसरी ओर स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और नेटवर्क संरचना को बढ़ावा देने का प्रयास किया है, जिससे देश इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सके। इसके अतिरिक्त, डिजिटल शिक्षा और डिजिटल साक्षरता पर विशेष ज़ोर दिया जा रहा है ताकि नागरिक प्रौद्योगिकी का विवेकपूर्ण और सुरक्षित उपयोग कर सकें, किंतु इसके बावजूद फर्जी समाचार, हैकिंग, साइबर जासूसी, साइबर हमले और डिजिटल दुष्प्रचार जैसी चुनौतियां भारत की अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, नागरिक अधिकारों और लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए चुनौतियां उत्पन्न कर सकते हैं। (अदिति)

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