अरावली ही नहीं, अन्य पहाड़ों को भी बचाने की ज़रूरत
भारत प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध है। पैसे की भूख और लालच मनुष्य की बुद्धि का हरण इस तरह करते हैं कि पता ही नहीं चल पाता कि अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मार रहा है। उत्तर में हिमालय जो आयु के हिसाब से कम है, लेकिन अगर वह न होता तो क्या होता, कल्पना तक नहीं की जा सकती। इसी तरह विंध्याचल, सतपुड़ा, पूर्वी और पश्चिमी घाट और सबसे पुरानी अरावली पर्वत श्रृंखला देश की रक्षा ही नहीं बल्कि अथाह संपत्ति अर्जित करने का साधन है। जब लालच की सीमा न रहे और धन कमाने पर कोई रोक न हो तो प्रकृति का दोहन और उसकी लूट शुरू हो जाती है। परिणाम प्रदूषण, सूखा, अतिवृष्टि और बाढ़ जैसी आपदाओं के रूप में निकलता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपने ही फैसले को वापस लेने की बात कोई साधारण नहीं है क्योंकि इससे मरणासन्न या खोखली हो चुकी पहाड़ियां बच गईं और इनकी गोद में पल रहे असंख्य जीव-जंतुओं ने भी चैन की सांस ली होगी, वरना उनका अंत निश्चित था। इसे पिछले वर्ष की सबसे बड़ी सौगात की तरह समझा जाए और इस वर्ष इसका भरपूर लाभ लेकर इस दुर्लभ संपदा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाए।
सामान्य व्यक्ति के लिए इतना ही समझना काफी है कि एनसीआर में पूरे साल वायु प्रदूषण की मुसीबत का एक बड़ा कारण यही है। पहाड़ियां कटती हैं, मिट्टी और धूल के गुबार उठते हैं और आसमान का रंग बदल जाता है, नीचे धरती पर सांस लेने के लिए शुद्ध हवा का अकाल पड़ जाता है। सोचते हुए भी सिहरन होती है कि जो मज़दूर ये काम करते होंगे उनकी क्या हालत होती होगी। ट्रकों से निकलता ज़हरीला धुंआ और यह धूल इतना उत्पात मचाते हैं कि कब बिन बुलाए मौत आ जाए या उम्र कितनी कम हो जाए, पता ही नहीं चलता। अक्सर सिगरेट पीने से निकले धुएं से इसकी तुलना की जाती है, लेकिन सच यह है कि स्थिति गंभीर है। सही उपाय न किए गए, पर्यावरणविदों, भू-वैज्ञानिकों और अन्य भुक्तभोगी लोगों की बात अनसुनी करने का रवैया बदला नहीं गया और कुछेक ठेकेदारों, पूंजीपतियों के लोभ पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगाये गए, यह विनाशलीला यूं ही जारी रहेगी।
विनाश की कथा : पहाड़ियां कटने से थार मरुस्थल का प्रवेश आसान हो जाता है, इधर उत्तर से बेरोकटोक ठंडी हवाएं चलने से प्रदूषण और सर्दी का प्रकोप मिल कर इन क्षेत्रों में ऐसा दृश्य पैदा कर देते हैं जो जानकारों के मुताबिक उन्होंने अपने जीवन में कभी घटते हुए नहीं देखा। यह जानना ज़रूरी है कि अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत के पर्यावरण की रीढ़ है और यह भारत ही नहीं दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत प्रणालियों में से एक है। दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में सबसे बड़ा हिस्सा अनेक नदियों, वन्य प्राणियों, अभयारण्यों, जैव विविधता और भू-जल को रिचार्ज करने का प्राकृतिक गुण और फैलने के लिए तैयार रेगिस्तान के सामने एक अभेद्य दीवार की तरह यह अरावली पहाड़ियां हैं। इसे ध्यान में रखकर ही 1600 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर प्रोजेक्ट ‘ग्रेट ग्रीन वाल ऑफ अरावली’ बनाया गया और 135 करोड़ पेड़ लगाने का लक्ष्य रखा गया। यह क्षेत्र राजपूती आन, बान और शान का प्रतीक है, मंदिर और किले इसकी खासियत हैं और खनिज संपदा के रूप में संगमरमर, जस्ता, तांबा इसकी पहचान हैं।
यह ठीक है कि परिवहन और आवागमन के साधनों का निर्माण आधुनिक भारत में आवश्यक है लेकिन प्रश्न यह है कि यह किस कीमत पर हो?
ज़रूरत और लालच का अंतर : उदाहरण के लिए हम अपनी नदियों के गंदा होने के बारे में चिंतित होते हैं और सरकार सैकड़ों करोड़ रुपये उन्हें साफ करने में लगा देती है लेकिन वे हैं कि साफ ही नहीं रहतीं। इतनी सी बात है कि जब तक पर्वत और पहाड़ियों से ज़रूरत से ज़्यादा अर्थात् अवैध खनन होता रहेगा और नदियों में मिट्टी जमा होती रहेगी, न वे साफ होंगी और न ही बाढ़ का तांडव रुकेगा। ज़रूरत जब लोभ बन जाए तो ऐसा ही होता है। प्रकृति विनाश से तत्काल लाभ हो सकता है लेकिन लंबे समय तक पछताना पड़ता है। जो कहते हैं कि शहर निर्माण और उद्योग विकास के लिए पहाड़ों और जंगलों को उजाड़ देना चाहिए, वे जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। अगर संतुलन बना कर रखा और सस्टेनेबल तरीके से काम किया तो न केवल इन्फ्रा सेक्टर को फायदा होगा बल्कि रोज़गार भी बढ़ेगा। यह समझिए कि ज़ेन जी की भाषा में इको फ्रैंडली लाइफ स्टाइल होगा जो आधुनिक पीढ़ी के लिए वरदान है।
इसके लिए अरावली ही नहीं देश में स्थित सभी पर्वतों और उनकी श्रंखलाओं को सुरक्षित रखने की मुहिम चलानी होगी। ऐसा नहीं है कि पहाड़ों और जंगलों को काटने, छांटने और आवश्यकतानुसार उनकी सीमा निर्धारित करने की नीति या कानून नहीं है, बिल्कुल है लेकिन वह केवल किताब के पन्नों में कैद हैं। जो लोग पर्यटन के लिए या फिर किसी अन्य प्रयोजन जैसे लेखक या फि ल्मकार इन क्षेत्रों में अक्सर जाते रहते हैं, उन्हें यह देखकर हैरानी होती है कि जब पिछली बार आए थे तो यह प्रदेश वृक्षों और उन पर चहकते पक्षियों के स्वरों से गूंजा करता था, लेकिन अब यहां केवल दूर तक सफाचट मैदान है। प्रकृति के इस विनाश का ज़िम्मेदार कौन है, क्या उसे सज़ा देने के लिए कोई कानून है, अभी तक तो नहीं? अरावली की पहाड़ियों के बीच से गुज़रना कभी बहुत सुकून भरा होता था लेकिन अब खुले आसमान से बिना किसी रुकावट के सीधे सूर्य की किरणों का सामना करना पड़ता है। बारिश हो गई तो ठिकाना तो दूर, काई, कीचड़ और दलदल जैसी हालत बन जाती है। ज़रा सोचिए, वर्तमान यह है तो आने वाला कल कैसा होगा।



