लावारिस कुत्तों संबंधी कड़ा निर्देश

केन्द्र सरकार द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर लावारिस कुत्तों के भयावह आतंक से जन-साधारण को बचाने हेतु हाल ही में और कड़े निर्देश जारी किये जाने से इस समस्या से अन्तत: निजात मिलने की बड़ी सम्भावना बनते दिखाई देती है। केन्द्र सरकार के इस फैसले के तहत एक ओर जहां लावारिस कुत्तों की गम्भीर होती समस्या और कुत्तों के काटे जाने के बाद की समस्याओं को लेकर भविष्य में नगर निगमों, नगर पालिकाओं और पंचायतों को भी जवाबदेय बनाया गया है, वहीं सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर केन्द्र सरकार से कहा है कि स्कूल-कालेज और अस्पतालों जैसे सार्वजनिक स्थलों को कुत्तों के आतंक से यथाशीघ्र मुक्त कराया जाए। इस फैसले के तहत यह भी ज़रूरी बनाया गया है कि अपने-अपने क्षेत्र में लावारिस कुत्तों की बढ़ती संख्या, उनकी गिनती पर अंकुश लगाये जाने हेतु उठाये गये कदमों और लावारिस कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने की घटनाओं को लेकर ज़िलाधिकारियों द्वारा केन्द्रीय समितियों को रिपोर्ट दिया जाना अनिवार्य हो जाएगा। इस  समस्या से निपटने हेतु नियुक्त किये गये कर्मचारियों, सम्बद्ध अधिकारियों और उनको सौंपे गये कार्य-दायित्व संबंधी जानकारी उपलब्ध कराना भी आवश्यक करार दिया गया है। इस समस्या के निदान हेतु यह एक पक्ष भी उल्लेखनीय है कि ज़िला से सम्बद्ध अधिकारियों द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट की समीक्षा केन्द्र सरकार द्वारा नियुक्त समिति अथवा कोई उच्चाधिकारी करेगा।
उल्लेखनीय है कि देश भर में इससे पहले लावारिस कुत्तों की निरन्तर बढ़ती संख्या और कुत्तों द्वारा लोगों को काटे जाने पर अंकुश लगाने हेतु सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जारी किये गये बार-बार के निर्देशों के बावजूद, राज्यों की सरकारों की ओर से कोई उपयुक्त और समीचीन कार्रवाई न किये जाने से पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय ने केन्द्र सरकार को लेकर बड़ी कठोर टिप्पणियां की थीं। सम्भवत: इसी कारण केन्द्र सरकार ने इस मामले को लेकर उदासीनता दिखाने वाली प्रदेश सरकारों का शिकंजा कसने का फैसला किया है। समस्या के सभी सम्बद्ध पक्षों बारे रिपोर्ट तैयार करने और ज़िलों के सम्बद्ध विभागों और अधिकारियों को जवाबदेय बनाने का फैसला करना भी सम्भवत: इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। इसी प्रक्रिया के तहत राष्ट्रीय पशु कल्याण बोर्ड ने एक नया एस.ओ.पी जारी किया है जिसमें कुत्तों द्वारा मनुष्यों को काटे जाने की घटनाओं को सार्वजनिक जन-स्वास्थ्य के लिए संकट करार दिया गया है। प्राय: प्रत्येक बड़े और ज़िला अस्पतालों में अभी भी कुत्तों द्वारा काटे जाने और इससे उपजने वाले रैबीज़ रोग के मामले बड़ी संख्या में प्रतिदिन आ रहे हैं। पंजाब के एक बड़े औद्योगिक शहर लुधियाना में एक कुतिया द्वारा 15 लोगों को काटे जाने के आतंक ने बड़ी सनसनी फैलाई। इस पर नगर निगम की टीम को बुलाया गया जिसने बड़ी कठिनाई से हिंसक हुई कुतिया पर काबू पाया।
लावारिस कुत्तों और उनके द्वारा आम लोगों को काटे जाने की घटनाएं लाख यत्नों के बावजूद थमने अथवा घटने का नाम नहीं ले रही थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस समस्या को लेकर दो बार बेहद कड़े निर्देश भी जारी किये, और सरकारों को प्रताड़ना भी लगाई थी। अब  केन्द्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधिकारियों और सरकारों की जवाबदेयी तय किये जाने के फैसले से नि:संदेह इस मोर्चे पर कुछ अच्छा निष्कर्ष निकलने की सम्भावना बनते दिखाई देती है। केन्द्र सरकार ने इस नये निर्देश के तहत शहरों अथवा गांव-कस्बों के कुछ केन्द्रों को बेहद नाज़ुक करार दिया है। इन केन्द्रों में स्कूल, कालेज, अस्पताल, सरकारी दफ्तर, बस अड्डे, रेलवे स्टेशन, भीड़-भाड़ वाले बाज़ार, और पार्क-उपवन जैसे सार्वजनिक स्थल शामिल हैं। इस फैसले ने कालोनियों, डेरों आदि में भी कुत्तों को खुला छोड़ने अथवा लावारिस कुत्ते पालने पर रोक लगा दी है।
हम समझते हैं कि लावारिस कुत्तों से सम्बद्ध इस अति गम्भीर एवं ़खतरनाक होती जाती समस्या पर काबू पाया जाना बहुत ज़रूरी हो गया था। कुत्तों के काटने से होने वाले रोग रैबीज़ से प्रभावित लोगों की संख्या में भी पिछले कुछ समय से बड़ा इज़ाफा हुआ है। मैडीसिन की भाषा में रैबीज़ रोग का कोई उपचार अथवा निदान है ही नहीं। रैबीज़ रोग एक बार जिसे हो जाए, फिर उसकी मृत्यु तय मानी जानी चाहिए। कुत्ता काटे के टीकों का भी अस्पतालों में बड़ा अभाव रहता है। सरकारों की लापरवाही और कथित पशु-प्रेमियों के हठवाद के कारण इस कुत्ता-आतंक पर काबू पाये जाने की सभी घोषणाएं अथवा दावे कागज़ी बन कर रह गये प्रतीत हो रहे थे। स्वयं अदालती निर्देश और टिप्पणियां भी बेअसर हो कर रह गई थीं। तथापि, हम समझते हैं कि केन्द्र सरकार ने अदालती निर्देश पर ही सही, एक अच्छा पग उठाया है। इसे मंज़िल-ए-आम तक लाये जाने, और इसकी सफलता को अंजाम देने के लिए जो भी कोई वर्ग सहायक हो सकता है, उसे होना चाहिए। यह संकट पूरे समाज की समस्या है, इससे सभी वर्गों के सहयोग से ही निपटा जा सकता है।

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