प्राथमिक शिक्षा को मज़बूत करने की आवश्यकता
प्राथमिक शिक्षा एक अच्छे नागरिक के रूप में व्यक्ति और समूची शिक्षा व्यवस्था की नींव है। विगत कई वर्षों से शिक्षा मंत्रालय द्वारा उच्च और उच्चतर शिक्षण संस्थानों के विस्तार और उन्नयन हेतु विभिन्न योजनाएं लागू की गई हैं। क्या ऐसे में प्राथमिक शिक्षा तंत्र को मज़बूत करने की आवश्यकता नहीं है? प्राथमिक और उच्च शिक्षण संस्थानों में सरकारी के स्थान पर निजी संस्थानों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा है। सरकारी संस्थानों की बदहाली के कारण मध्यम और निम्न वर्ग आर्थिक तंगी होते हुए भी भारी फीस देकर निजी संस्थानों में जाने को मजबूर है। विगत दिनों समाचार पत्र में छपा है कि देश के 5,149 सरकारी स्कूल खाली पड़े हैं। आंकड़े यह बताते हैं कि देश में 10.13 लाख सरकारी स्कूलों में से 5,149 स्कूलों में कोई छात्र नहीं है। शैक्षणिक वर्ष 2024-2025 में शून्य नामांकन वाले इन स्कूलों में से 70 प्रतिशत से अधिक तेलंगाना और बंगाल में स्थित हैं।
वर्ष 2024-25 के आंकड़े बताते हैं कि 65,054 स्कूल ऐसे हैं जहां 10 से कम या शून्य नामांकन रहा। आंकड़े यह भी बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के 5000 से अधिक सरकारी स्कूलों में केवल एक शिक्षक है जबकि 249 स्कूल ऐसे हैं जिनमें एक भी शिक्षक नहीं है। राष्ट्रीय राजधानी के प्राथमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों में वर्षों से हज़ारों शिक्षक अतिथि रूप में कार्यरत हैं। कई प्राथमिक स्कूलों में नामांकन सौ के नीचे है। देश के कई प्रदेश ऐसे भी हैं जहां पिछले कई वर्षों से शिक्षकों की कोई स्थाई नियुक्ति नहीं हुई है। बंगाल, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार व मध्य प्रदेश आदि कई प्रदेश ऐसे भी हैं जहां जब-जब नियुक्ति प्रक्रिया अथवा नियुक्तियां होती हैं तो वह अथित भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाती हैं। स्वतंत्रता के बाद शिक्षा क्षेत्र में जिन व्यापक बदलावों और योजनाओं की आवश्यकता थी, वे नहीं हुए। वर्ष 1980-90 के दशक में शिक्षा क्षेत्र भी भू-मंडलीकरण की चपेट में आ गया। सुनियोजित ढंग से इंटरनेशनल, कान्वेंट और पब्लिक स्कूल के नाम पर निजी स्कूलों की बाढ़ सी आ गई और सरकारी स्कूल निरन्तर बदहाली के शिकार होते चले गए। शासन व प्रशासन मूक दर्शक बना रहा। ऐसे स्कूलों में जहां शिक्षक अथवा मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं, वहां ऐसे स्कूलों में कौन अभिभावक अपने बच्चों को पढ़ने के लिए भेजेगा? जिन प्रदेशों में सरकारी स्कूल खाली पड़े हैं, वहां निजी स्कूल खुल गए और खूब फल-फूल रहे हैं, क्या इस बात की जांच नहीं होनी चाहिए? राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृ भाषा में शिक्षा, प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल, ड्रॉपआउट बच्चों की संख्या कम करना, शिक्षा की सार्वभौमिक पहुंच, डिजिटल एवं ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, कौशल आधारित शिक्षा आदि के प्रविधान करती है, लेकिन देश के कई प्रदेशों में अभी इसे पूर्णत: लागू करने हेतु मूलभूत तैयारी भी नहीं हो पाई है। देश में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की तस्वीर बदलने और सुशिक्षित समाज हेतु केंद्र सरकार की ओर से विगत कुछ वर्षों से निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं। पीएम श्री स्कूल, समग्र शिक्षा, प्रेरणा, उल्लास, निपुण भारत, विद्या प्रवेश, विद्यांजलि, दीक्षा, स्वयं प्लस, निष्ठा व विद्यालक्ष्मी योजना आदि ऐसे प्रयास हैं जिनसे कुछ बदलाव तो हुए हैं, लेकिन ये बदलाव बहुत धीमें हैं। आज वर्ष 2025 में भी पुरुष साक्षरता दर लगभग 85 प्रतिशत है तो वहीं महिला साक्षरता दर लगभग 70 प्रतिशत है। उच्च शिक्षा हेतु पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अभी लगभग आधी है। क्या ये आंकड़े अथवा स्थितियां चिंताजनक नहीं हैं? मिड-डे-मील जैसी योजनाओं के साथ-साथ सरकार यह भी सुनिश्चित करे कि सरकारी स्कूलों में उच्च स्तरीय ढांचागत सुविधाएं भी मिलेंगी, शिक्षक भी मिलेंगे और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी मिलेगी। हाल ही में संसद में प्रश्नों का जवाब देते हुए शिक्षा राज्य मंत्री ने बताया कि 31 अक्तूबर 2024 तक केंद्रीय विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के 5,152 पद रिक्त हैं। परीक्षाओं में धांधली, समय पर परीक्षाएं न होना, समय पर परिणाम न आना, समय पर दाखिले न होना आदि ऐसी अनेक बातें हैं जिनके चलते सरकारी शिक्षण संस्थानों की साख बिगड़ रही है। (युवराज)

