डिजिटल धोखाधड़ी पर जल्द लगना चाहिए अंकुश 

देश के तकरीबन दस राज्यों का बजट 54 हज़ार करोड़ से कम है और भूटान, गुयाना, मालदीव और फिजी जैसे देश भी इससे कम बजट रखते हैं। इतनी बड़ी राशि डिजिटल धोखाधड़ी में गवां देना वाकई शोचनीय है। सर्वोच्च अदालत ने इसके निवारण हेतु सरकार से एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया देशभर में लागू करने को कहा है, पर क्या एसओपी इस विविधवर्णी रोग का अकसीर इलाज होगा अथवा इसका कोई बहुआयामी समाधान तलाशना होगा? 
कई राज्यों के बजट से भी अधिक के डिजिटल धोखाधड़ी से बचाव के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को पूरे देश में एक मानकीकृत संचालन प्रक्रिया अथवा एसओपी लागू करने का निर्देश अत्यंत स्वागत योग्य है। उसने सीबीआई से डिजिटल अरेस्ट के अपराधियों की पहचानने के लिये भी कहा है और बैंकों को भी उनकी कार्यप्रणाली में खोट तथा लापरवाही ही नहीं बल्कि मिलीभगत के लिये भी लताड़ा है। वाकई 54 हज़ार करोड़ रुपये का आंकड़ा बहुत बड़ा है और इस मर्ज की दवा जल्द न तलाशी गई तो रोग वित्तीय नासूर बन जायेगा। बेशक, बैंक यदि संदिग्ध लेन-देन पर ग्राहकों को सतर्क करते हैं और साइबर अपराधों की पहचान तथा जांच के लिए अंतर-एजेंसी समन्वय मजबूत रखते, तो आंकड़े शायद अलग दिखते। पर फिर भी इस पर पूरी रोक के लिये व्यापक बहुआयामी उपाय अपनाने होंगे जिसमें न सिर्फ बैंकिंग व्यवस्था सुधार, तकनीक, जन जागरूकता बल्कि दूसरे कारकों पर भी ध्यान देना होगा। 
ऐसे में लगता है कि तकनीकी का जंजाल ही सबकी वजह है पर डिजिटल धोखाखड़ी के मामलों में सिर्फ  तकनीक दोषी नहीं है अथवा महज सरकार या फिर मात्र बैंकिंग व्यवस्था बल्कि जनता की अल्पज्ञता, लोभ-लालच और भय का भी इसमें बहुत बड़ा योगदान है। जागरूकता अभियान, विद्यार्थियों के लिए साइबर सुरक्षा शिक्षाएं और आम नागरिकों को साधारण धोखाधड़ी के तरीकों से परिचित कराना अब अत्यंत आवश्यक है। इसकी रोकथाम के लिए आवश्यक है कि बैंक बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन, डिवाइस फि ंगरप्रिंटिंग उचित प्रकार से अपनाएं तथा एआई से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करने के अलावा एफ आईयू-इंडिया को रिपोर्टिंग और अंतर-बैंक डेटा शेयरिंग बढ़ाएं तो ये उपाय 50 फीसदी तक डिजिटल धोखाधड़ी रोक सकते हैं। नए खातों पर लेनदेन सीमा, लाभार्थी जोड़ने पर कूलिंग-ऑफ अवधि और उच्च-जोखिम श्रेणी की सतत निगरानी प्रभावी उपाय हो सकते हैं। धोखाधड़ी की जड़ें सोशल मीडिया इंटरमीडियरीज प्लेटफॉर्मो से जुड़ती हैं, फर्जी विज्ञापन, स्पूफ वेबसाइट, डीएम या मैसेजिंग के जरिए फिशिंग और म्यूल अकाउंट में धन-स्थानांतरण के ये कारक हैं। 
संदिग्ध विदेशी रेमिटेंस पर अस्थायी होल्ड और लाभार्थी देशों के साथ त्वरित म्यूचुअल लीगल असिस्टेंस समझौते इसमें मददगार हो सकते हैं। हालांकि सीबीआई और राज्य साइबर सेल की क्षमता बढ़ी है, डिजिटल अरेस्ट के कई मामले सुलझाए गये हैं तो पिछले साल बैंक फ्राड मामलों में गिरावट आयी पर राशि 3 गुना बढ़कर 36,000 करोड़ रुपये हो गई कार्ड-इंटरनेट धोखाधड़ी के 13,516 मामलों में 520 करोड़ की ठगी हुई और कुल डिजिटल धोखाधड़ी का आंकड़ा 54,000 करोड़ के पार चला गया। जाहिर है परिमाण को देखते हुए सफलता नाकाफी थी। 
आरबीआई ने इस तरह की मानकीकृत संचालन प्रक्रिया तैयार कर रखी है, अब नये सिरे से व्यापक एसओपी तैयार करना, उसे देशव्यापी स्तर पर लागू करवाना तभी प्रभावी होगा, जब इसे वित्तीय संस्थानों, बैंक अधिकारियों, टेलीकॉम पोर्टलों और साइबर पुलिस के बीच वास्तविक समय में डेटा साझा करने और त्वरित कार्रवाई की तकनीकी सक्षमता के साथ जोड़कर व्यवहारिक तौरपर कड़ाई से लागू किया जाए। एआई आधारित अलर्ट सिस्टम को निगरानी में शामिल करना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी उपाय है। डिजिटल साधनों के व्यापक और तीव्र विस्तार के अनुरूप डिजिटल प्राइवेसी के उल्लंघन के खिलाफ  पर्याप्त कानून और सुरक्षा ढांचा विकसित नहीं हो पाया है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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