क्या दुर्लभ खनिज बन रहे हैं वैश्विक तनाव का कारण ?
मानवजाति को परमाणु हथियारों से घृणा होनी चाहिए थी, लेकिन इसके बजाय आज घातक हथियार महाशक्तियों के खिलौने बनते जा रहे हैं। रूस यूक्रेन पर बम बरसा रहा है, तो दूसरी ओर इज़रायल गाज़ा और ईरान पर आतंक बरपा रहा है। कई देशों में गृह युद्ध चल रहे हैं। शायद ही कोई युद्ध के मुख्य और मूल कारण पर विचार करता हो। हिरोशिमा और नागासाकी पर गिरा गए परमाणु बमों से हुए विनाश से सबक लेने की ज़रूरत थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आज संसार में जो अस्थिरता पैदा हो रही है, उनका मुख्य कारण व्यापार बन चुका है। किसी देश को दंड देने के लिए ‘टैरिफ’ का चाबुक चलाया जाता है। वर्तमान में जो भू-राजनीति (जियोपालिटिक्स) शब्द सुनाई देता है और इसका कारण यह है कि शक्तिशाली देश अब धरती की गहराइयों में छुपे दुर्लभ खनिजों पर अपना प्रभुत्व चाहते हैं। आज विश्व में तनाव का कारण तेल व अन्य दुर्लभ खनिज हैं। डोनाल्ड ट्रम्प चाहते हैं कि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदना बंद कर दे। अमरीका ने वेनेजुएला पर प्रभुत्व जमाकर सबसे पहले उसके राष्ट्रपति को बंदी बनाया और फिर उसके तेल कुओं पर नियंत्रण कर लिया।
विभिन्न देशों में तेल के कुएं खोदकर रायल्टी प्राप्त करने के लिए विकसित देश साम-दाम-दंड-भेद अपनाते रहे हैं। दूसरी ओर विकासशील देशों ने भी विकास के लिए उन्हीं देशों का कच्चा तेल लेकर अपनी रिफाइनरियों के अपशिष्ट से अनेक उद्योग खड़े किए हैं। इसी संदर्भ में विश्व कोष संस्था के भूगोल विशेषज्ञ नितिन कोठारी कहते हैं कि समय और परिस्थितियों के बदलने के साथ भूराजनीति के नए आयाम उभरते हैं और ऐसा ही एक नया आयाम है दुर्लभ खनिज। इन दुर्लभ खनिजों की खोज 1787 में स्वीडन के सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट कर्नल एक्सेल अरेनियस ने की थी। वह खनिज ‘गैडोलिनाइट’ था। इसके बाद 1803 में जर्मनी के जान जैकब ने दुर्लभ खनिज ‘सीरियम’ की खोज की। इस तरह क्रमश: दुर्लभ खनिजों की खोज होती गई। प्रमुख खनिजों में नियोडिमियम, सीरियम, लैंथेनम, इटर्बियम, प्रासोडिमियम, समेरियम और प्रोमेथियम शामिल हैं। इनके अलावा स्कैंडियम, डिस्प्रोसियम, टर्बियम, यूरोपियम और कोबाल्ट भी हैं। लेकिन सबसे दुर्लभ खनिज ‘क्यावथुइट’ माना जाता है। विश्व में इन दुर्लभ खनिजों का भंडार लगभग 130 मिलियन टन आंका गया है।
आज दुनिया के अधिकांश देश समय के साथ कदम मिलाने के लिए इन दुर्लभ खनिजों को प्राप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। विश्व की महाशक्ति अमरीका को भी भविष्य को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक जोड़-तोड़ करना पड़ रहा है। उदाहरण के लिए चीन से दुर्लभ खनिज प्राप्त करने के लिए उसके लिए घोषित टैरिफ की दरों में कटौती करनी पड़ी। आज विश्व राजनीति में चीन के लगातार शक्तिशाली बनने का एक बड़ा कारण उसके पास मौजूद दुर्लभ खनिजों का विशाल भंडार है। इतना ही नहीं, वह अन्य देशों के खनिज संसाधनों पर भी नज़र रखे हुए है है। सहायता के बदले दुर्लभ खनिज प्राप्त करने की उसकी नीति जगजाहिर है। चीन मंगोलिया के दुर्लभ खनिजों पर नज़र गड़ाए बैठा है और कूटनीतिक दबाव बना रहा है। वहीं दूसरी ओर बौद्ध संस्कृति के प्रचार का मुखौटा ओढ़कर वह म्यांमार के मोगोक क्षेत्र में मौजूद बहुमूल्य खनिजों को हथियाने के लिए जाल बिछा रहा है। आज विश्व के 195 देशों में से केवल 36 देशों के पास ही ये दुर्लभ खनिज हैं। इनमें से भी आधे देशों के पास दो प्रतिशत से भी कम भंडार है। पाकिस्तान और म्यांमार में कुछ मात्रा में ये खनिज पाए जाते हैं, लेकिन बांग्लादेश, भूटान और मालदीव में इनका नाममात्र अस्तित्व है। पूरी दुनिया दुर्लभ खनिजों के लिए इसलिए लड़ रही है, क्योंकि इनका उपयोग ड्रोन, रोबोट, स्मार्टफोन, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, एलईडी लाइट, परमाणु रिएक्टर, सेंसर, युद्धपोत, उपग्रह, विमान अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों में होता है।
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