नये मसीहा

जो कल तक हमारे चरण छूकर गदगद हो जाते थे, आज हमसे उम्मीद रखते हैं कि हम अपने श्मशान का रास्ता भी उनसे पूछ कर पकड़ें।
हमें देख कर जब वे श्रद्धा विभोर हो जाते थे, तो जाने क्यों उनकी समर्पित मुद्रा देख कर हमें अपने लिए लगता था, कि ‘बन्धु चार दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात है।’ वैसे हम मान सकते हैं ऐसा हम लोगों को ही लगता है जो अभी भी उसी पुरानी दुनिया को समर्पित हैं। जो सोचते हैं कि जो वरिष्ठ है, जिसने पूरी उम्र इस काम में लगाई है, उसका बनता सम्मान तो अवश्य कर देना चाहिए। आज उसका सम्मान करेंगे, तो कल जब हमारे मुंह में दांत नहीं रहेंगे तो हमारे पोयले मुंह के प्रति अवहेलना जताने की बजाय कभी यह भी सोच लेंगे कि, भई इसने धूप में तो बाल सफेद नहीं किये हैं। तनिक करीब जाकर देख लो, शायद यह सफेदी तुम्हें भी कब्र में दबा देने के काबिल नहीं, फूलों की उस चादर सी लगे, जो अपनी खुशबू से आने वाले युगों का सराबोर कर देती है।
लेकिन जनाब ऐसी बातें तो आजकल बिल्कुल किताबी सी लगने लगी है, लेकिन किताबों से अपने ज़माने को इतनी नफरत हो गई है, कि किसी खूबसूरत औरत के नैन-नक्श भी आजकर किताबी नहीं लिखे जाते। किताबी होना गुनाह हो गया।
जी नहीं, हम नहीं कहते यह बात, क्योंकि आजकल पुस्तक संस्कृति की मौत के ज़माने में बाज़ार में किताबें नज़र आने लगी हैं बल्कि आजकल तो लगता है जैसे हर व्यक्ति एक किताब का लेखक बन गया है और अपनी किताब को कांख में दबा कर सोचता है कि मैं तो आज के युग का कालिदास हूं। मेरी अभ्यर्थना कर लो।
अभ्यर्थना तो अवश्य कर लेंगे, आपकी जनाब। लेकिन कृप्या यह तो बता दीजिए कि आपने सुबह उठ कर कभी अखबार नहीं पढ़ी। प्रेमिका को प्रेम पत्र भी गूगल से चुरा कर लिखा। फिर अचानक आप यह एक किताब लिख कर चन्द्रधर शर्मा गुलेरी जैसे कैसे बन गये?
वह हमारे सवाल को शक की निगाह से देखते रहे। फिर किसी फैसले पर पहुंच कर बोले, ‘तभी तो हम तुम्हें महा-नाकामयाब कहते हैं। सुना है तुम भी एक लेखक हो?’
हमने लज्जित होकर सिर हिला दिया, कि जैसे कहते हों, ‘जी हां, यह अपराध तो हमने किया है।’
‘यह भी सुना है कि तुम्हें एक किताब लिख कर संतोष नहीं हुआ। तुमने इक्यावन किताबें लिख मारीं?’
हम अपराध बोध से ग्रस्त हो गये, ‘जी हां, यह नामाकूल काम भी हमने किया है।’
—क्यों किया? क्या एक से जी नहीं भरा था, जो इक्यावन लिख मारीं। कलम घिस-घिस कर उसे बूढ़ा कर दिया, और पाया क्या बदले में?
—जी यह मनहूस चेहरा। हमारे लिखने के झमेले से तो हमारी जोरू भी तंग आकर हमें छोड़ कर दूसरी दुनिया को सिधार गई।
—कमाया क्या? किताबों के इस गट्ठरक की क्या रॉयल्टी मिली? जिज्ञासा थी।
—जी रॉयल्टी तो नहीं, कज़र् हो गया है। प्रकाशक को हर किताब की लागत देनी पड़ती है। 
हमें लगा था, हमारा यह हाल देख कर उन्हें हमारे साथ हमदर्दी हो जाएगी।
लेकिन हमदर्दी तो क्या, उनके चेहरे पर तो तृप्ति का भाव आ गया कि जैसे किसी शिकार को देख कर आता है।
 वह हंसे, कह, कह.., कह! अच्छा तो तुझे पता नहीं आजकल मैटा या ए.आई. का ज़माना आ गया है। बटन दबाओ, टिकट कटाओ, किताब बाहर आ जाती है, वह भी शुद्ध-विशुद्ध भाषा, उचित नैन नक्श वाली।
हमने सोचा, ‘किताब है कि लड़की।’
उन्होंने बताया कि ‘आजकल किताब मशीन से निकालो तो लड़की मिलती है, लेकिन वह आपके इश्क में दीवानी नहीं होती। लिव इन रिलेशन चाहती है। जायदाद में हिस्सा न मिलने पर कोर्ट में घसीटती है।’
वह तो महाज्ञानी हैं, और हम अपनी वरिष्ठता का रोना हो रहे थे। उन्होंने हमारा चेहरा पढ़ लिया। बोले, ‘हां, आजकल वरिष्ठों को तो रोना ही पड़ता है। कुछ ईनाम-विनाम जीत कर दिखाओ, तो तुम्हारा चेहरा अखबार में छापें।’
—अजी इक्यावन किताबें लिख लीं, ईनाम क्या, किसी सूची में नाम भी नहीं आया। वह फिर हंसे- कह-कह-कह! नाच न जाने आंगन टेढ़ा। चले हैं वरिष्ठ बनने बाप न मारी मेंढकी बेटा तीरन्दाज़।’ ‘सुनो, ईनाम लेने की तुम्हारी डेट एक्सपायर हो गई। अब लोगों में ईनाम बांटने का कुछ जुगाड़ करो।’
-लेने के स्थान पर बांट?
‘हां, तभी मसीहागिरी पुख्ता होती है। भोले बालक बालिकाएं ईनाम पाने के लिए आपको आदरसूचक प्रार्थना पत्र लिखते हैं।’
‘चलो आदर नहीं, आदर सूचक प्रार्थना पत्र तो मिले। महान लेखकों की लिस्ट में नाम नहीं आया। लिस्ट बना कर उनका नाम शामिल करने की प्रार्थनाएं तो आईं। लीजिये जनाब, आजकल लिखना विखना छोड़ कर ईनाम बांटते हैं, और महान लेखकों के नामों की लिस्ट बनाते हैं, और लोग हमें साहित्य का नया मसीहा कहने लगे हैं।

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