भाजपा, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी
आज राजनीति की हर महफिल में चर्चा यही है कि अब आम आदमी पार्टी का क्या होगा? क्या वह भाजपा और कांग्रेस के मिले-जुले हमले के मुकाबले टिक पाएगी? क्या वह दस महीने बाद होने वाले पंजाब चुनावों तक अपनी सरकार बचा पाएगी? राज्यसभा से तो उसके सात सांसद भाजपा में चले गए, लेकिन क्या वह लोकसभा के अपने तीन सांसद भी बचा पाएगी। चर्चा तो यह भी है कि नये-नये भाजपाई हुए राघव चड्ढा और संदीप पाठक भगवंत मान की सरकार को गिराने में लग गए हैं। उन्होंने तकरीबन 50 विधायकों को फुसलाने की कोशिशें शुरू कर दी हैं। भगवंत मान ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि जो राघव चड्ढा और संदीप पाठक किसी ज़माने में उनकी सरकार बनाने के लिए जूझ रहे थे, वही अब उनकी कुर्सी छीनने की जुगाड़ में लगे हुए हैं। राघव चड्ढा तो एक ज़माने में पंजाब के सुपर सीएम जैसे थे। संदीप पाठक को तो अलग से दफ़्तर दिया गया था जिसमें बैठ कर वह भगवंत मान की मदद किया करते थे। बहरहाल, भगवंत मान का जो होना होगा, वह तो होगा ही। भाजपा की साज़िशों और तिकड़मों की कोई सीमा नहीं है। 2014 में सत्ता में आने के बाद उसने 2016 के बाद से ही एक बार नहीं बल्कि कम से कम नौ बार मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, गोवा, अरुणाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम में ़गैर-भाजपा दलों के एमएलए तोड़ कर और कभी इस्तीफा दिला कर अपनी राजनीतिक गोटी लाल की है। यह कहानी बहुत लम्बी है और इसे अलग से लिखा जाना चाहिए। अगर भगवंत मान सरकार में तोड़-फोड़ कामयाब हुई तो शायद यह दसवीं बार होगा।
असली सवाल दूसरा है। ‘आप’ अपनी चमकदार सफलताओं के बावजूद इस दयनीय हालत में पहुंची कैसे? क्या इसमें केवल उसके शीर्ष नेतृत्व की गलतियों की ही भूमिका है, या बात कुछ और भी है। मीडिया में हर जगह फोकस इस बात पर है कि अरविंद केजरीवाल ने क्या-क्या गड़बड़ियां कीं। अगर वह ऐसा न करते तो वैसा हो जाता या कैसा हो जाता। मैं इस फोकस को बदलना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि ‘आप’ की इस दुर्गति को भारत की पार्टी प्रणाली के नज़रिये से देखा जाए। तब जाकर समझ में आएगा कि एक नयी पार्टी जो न तो कांग्रेस और भाजपा जैसी है, और न ही देशम, कषगम और टीएमसी जैसी क्षेत्रीय पार्टी है, को किस तरह योजना बनाकर राजनीति में टिकने ही नहीं दिया गया। मैं यहां ‘आप’ के नेतृत्व की समस्याओं पर पर्दा नहीं डालना चाहता। पहले मैं यह बताना चाहता हूँ कि किस तरह भाजपा और कांग्रेस ने ‘आप’ को कमज़ोर करने के लिए 2021 के पंजाब विधानसभा चुनावों से अपनी जुगलबंदी चला रखी है। इसीलिए आज यही दोनों पार्टियां जश्न मना रही हैं। हर बात पर आपस में भिड़ी रहने वाली ये दोनों पार्टियां इस बात पर एकमत हैं कि आम आदमी पार्टी का ज़िंदा रहना नामुमकिन बना दिया जाना चाहिए।
भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस का और भाजपा का प्रभुत्व है। ब्रिटेन में देखेंगे तो वहां भी दो पार्टियों का प्रभुत्व है। अमरीका में भी दो पार्टियों का प्रभुत्व है और ब्रिटेन और अमरीका में तो स्थिति यह है कि तीसरी पार्टी का आना मुश्किल है। बनती भी नहीं है। कोई बनाता भी है तो घूम-घाम के उन्हीं दो पार्टियों के सेटअप में चले जाते हैं। वहीं अपनी जगह तलाश लेते हैं। भारत में एक वास्तविक किस्म का बहुदलीय लोकतंत्र है। इस बहुदलीय लोकतंत्र में नयी पार्टियां बनती-बिगड़ती रहती हैं। दो राष्ट्रीय पार्टियों, कांग्रेस और भाजपा के अलावा अगर कोई और पार्टी यहां टिकती है तो उसे क्षेत्रीय शक्ति के तौर पर उभरना पड़ता है, लेकिन ‘आप’ एक ऐसी पार्टी है जो न राष्ट्रीय पार्टी है और न ही क्षेत्रीय पार्टी। वह एक आंदोलन के गर्भ से जन्मी जिसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन कहा जाता है। वह कैसा था, क्या था, इस पर विवाद हो सकता है लेकिन इस पार्टी के सभी नेता और कार्यकर्ता, उसी आंदोलन के गर्भ से निकले हैं, उससे पहले उन्हें राजनीति में कोई नहीं जानता था। यह पार्टी किसी जाति-बिरादरी की पार्टी भी न थी, न है। जिस तरह समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के बारे में माना जाता है कि ये यादवों की पार्टियां हैं, या बसपा को जाटवों की पार्टी, या भाजपा को ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहा जाता है। उसने दिल्ली में जो अपनी राजनीतिक सफलता अर्जित की, वह अभूतपूर्व थी। उन्होंने दो ज़बरदस्त चुनाव जीते। उससे पहले एक चुनाव में उसने गठजोड़ सरकार बनाई। फिर उसने पंजाब में सरकार बनाई।
जब पंजाब ने ‘आप’ में सरकार बनाई तो दिल्ली की स्थापित पार्टियों का माथा ठनका। दरअसल पंजाब में सरकार बनाने से पहले ही जब ‘आप’ 2017 के चुनाव में प्रमुख विपक्ष के तौर पर उभरी थी तभी भाजपा और कांग्रेस का माथा ठनक गया था। मुझे याद है कि उस चुनाव में एक मुहिम के दौरान जब एक पत्रकार ने गृहमंत्री अमित शाह से पूछा कि लगता है आम आदमी पार्टी पंजाब के चुनाव में बहुत आगे बढ़ रही है, तो अमित शाह ने कहा था कि हम किसी पार्टी को आगे बढ़ने से कैसे रोक सकते हैं? अगर कोई पार्टी आगे बढ़ रही है तो बढ़ेगी ही, लेकिन वह दरअसल ऊपरी तौर पर ही यह बात कह रहे थे। भीतर से भाजपा और कांग्रेस के बीच में एक तरह का अघोषित गठबंधन हो चुका था। आम आदमी पार्टी को सत्ता में आने से रोकने के लिए भाजपा ने पंजाब में अपने जनाधार यानी शहरी हिंदू व्यापारियों के वोटों के एक बड़े हिस्से को खामोशी से अमरिंदर सिंह के नेतृत्व वाली कांग्रेस के पक्ष में रातोंरात शिफ्ट किया ताकि आम आदमी पार्टी न जीत पाए, कांग्रेस जीत जाए। इसी तिकड़म से कांग्रेस ने वहां सरकार बना ली। अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री हो गए। उस चुनाव की अंतरकथा यही थी कि किस तरह भाजपा ने खुफिया तौर पर अपनी दावेदारी छोड़ दी। अकाली दल चुनाव जीतने की स्थिति में था नहीं। उसने सोचा कि क्यों न कांग्रेस को चुनाव जीत जाने दिया जाए वरना ‘आप’ सत्ता में आ जाएगी और यह बहुत बड़ी प्रतिद्वंद्वी साबित होगी। उसके बाद जब दिल्ली में शराब घोटाले का मसला उठाया गया, उसमें भी कांग्रेस व भाजपा की ‘आप’ के खिलाफ जुगलबंदी देखने को मिली। कांग्रेस के नेता ने शिकायत की। भाजपा के एलजी ने सीबीआई जांच का आदेश दिया। देखते ही देखते ‘आप’ के अनेक बड़े नेता अरविंद केजरीवाल समेत जेलों में डाल दिए गए और बड़े पैमाने पर प्रचार चला कि ये लोग भ्रष्टाचार के आरोपी हैं। एक ऐसे आरोप में उनके खिलाफ हवा बनाई गई जो अदालत में टिक नहीं पाया। एक ऐसे आरोप में उनको कोने में धकेला गया जिस आरोप को अदालत ने आरोप मानने से भी इन्कार कर दिया। मुकद्दमा चलाने योग्य भी नहीं समझा उन आरोपों को। इन्हीं आरोपों के आधार पर माहौल बना कर जनता के मन में यह बात डाल दी गयी कि यह पार्टी अपने वायदे पर खरी नहीं उतर पाई। यह तो साफ सुथरी राजनीति करने के वायदे से आई थी, लेकिन शराब घोटाले में फंसी हुई पाई गई है। यह स्थिति बताती है कि एक ऐसी पार्टी जो जाति धर्म की पार्टी नहीं है, जो एक अलग तरह की पार्टी है, जो स्थापित पार्टियों से जनता की उकताहट के कारण सत्ता में आई थी, उसे सत्ता में न आने देने या सत्ता से बाहर करने के लिए दोनों राष्ट्रीय पार्टियों ने अघोषित गठजोड़ कर लिया। मैं कोई यह नहीं कह रहा हूँ कि ‘आप’ ने हमेशा अच्छी सरकार चलाई है या सरकार चलाने में कोई गलतियां नहीं कीं। मैं यह कह रहा हूं कि एक नए किस्म की शक्ति जो लोकतंत्र में उभरी थी, उसको स्थापित पार्टियों ने किस तरीके से साज़िश करके खत्म कर दिया या खात्मे के कगार पर पहुंचा दिया।
आज क्या स्थिति है? दिल्ली में ‘आप’ चुनाव हार चुकी है। पंजाब में उसके सभी राज्यसभा सदस्य राघव चड्ढा के पीछे खड़े होकर भाजपा में जा चुके हैं और पंजाब में उसकी सरकार की बची खुची प्रतिष्ठा का इस घटना के कारण क्षय हो गया है। और जश्न कौन मना रहा है? भाजपा इसलिए जश्न मना रही है कि उसको राज्यसभा में सात सांसद मिले और कांग्रेस इसलिए जश्न मना रही है कि पंजाब में उसके लिए सत्ता में आने की जगह खाली हो गई। दिल्ली में भी इससे ‘आप’ की प्रतिष्ठा को नुकसान होगा। फायदा तो कोई होने वाला है नहीं। मैं ये सब बातें इसलिए कह रहा हूं कि कांग्रेस और भाजपा बड़ी-बड़ी शक्तिशाली पार्टियां है। ये एक से अधिक प्रांतों की पार्टियां हैं। आज भाजपा ज्यादा बड़ी पार्टी बन गई लगती है। यह केन्द्र में सत्ता में है। जिस दिन कांग्रेस केंद्र में सत्ता में आ गई, वो भी इतने ही प्रांतों में अपनी सरकार बना लेगी और भाजपा उसी तरह सिकुड़ जाएगी जिस तरीके से कांग्रेस सिकुड़ी हुई है। लेकिन ये दोनों पार्टियां एक ऐसे प्रतिद्वंद्वी को खत्म करने के लिए आपस में गठजोड़ कर लेती हैं जो इनकी शर्तों पर राजनीति नहीं करता, जो इन जैसा नहीं है, जो अलग तरह का है। उसको खत्म करने के लिए ये लोग आपस में गठजोड़ कर लेते हैं। दो उदाहरण मैंने यहां बताये हैं, भीतर जाने पर ऐसे और भी ज्यादा उदाहरण प्राप्त होंगे। मैं फिर कह रहा हूं, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि ‘आप’ ने सारे काम ठीक किए हैं। उसके नेतृत्व ने कोई गलती नहीं की है। ‘आप’ में बहुत लोग गए थे। एक-एक करके कई लोग बाहर आए। इनमें दो तरह के लोग थे। एक वे जो बाहर आने पर कांग्रेस या भाजपा में नहीं गए। दूसरे वे जिन्होंने मौका ताड़ा और दूसरी पार्टियां पकड़ लीं। आम आदमी पार्टी अब एक ही तरीके से अपने आपको बचा सकती है। यदि पार्टी पंजाब चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करे यदि ‘आप’ दिल्ली में चुनाव हारने के बाद पंजाब में भी हार जाती है तो पार्टी का राजनीतिक दृश्य पर बने रहना बहुत मुश्किल हो जाएगा।
लेखक अम्बेडकर विश्वविद्यालय, दिल्ली में प्ऱोफेसर और भारतीय भाषाओं के अभिलेखागारीय अनुसंधान कार्यक्रम के निदेशक हैं।



