‘इंडिया’ गठबंधन के लिए आत्म-मंथन का समय

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष दोनों की अपनी-अपनी अनिवार्य भूमिकाएं हैं। जहां सत्ता नीतियों का निर्माण और क्रियान्वयन करती है, वहीं विपक्ष उन नीतियों की समीक्षा, संतुलन और वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करता है, लेकिन जब विपक्ष स्वयं ही असंगठित, दिशाहीन और अंतर्विरोधों से ग्रस्त हो जाए, तब लोकतांत्रिक संतुलन भी प्रभावित होता है। हाल के पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि विपक्षी एकता का दावा करने वाला ‘इंडिया’ गठबंधन अपने भीतर ही गंभीर संकट से गुजर रहा है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस की पराजय और तमिलनाडु में द्रमुक की स्थिति ने विपक्षी खेमे को झकझोरने का काम किया है। यह केवल चुनावी हार नहीं है, बल्कि रणनीतिक विफलता का भी संकेत है और यह प्रश्न भी खड़ा करता है कि क्या विपक्ष केवल भाजपा-विरोध के आधार पर टिक सकता है या उसे एक ठोस वैचारिक और नीतिगत आधार की भी आवश्यकता है। भारतीय लोकतंत्र की सुदृढ़ता केवल सत्तापक्ष की नीतियों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि एक सजग, विवेकशील और रचनात्मक विपक्ष पर भी उतनी ही आधारित होती है। 
विपक्ष का मूल दायित्व केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना, नीतियों की खामियों को तथ्यों के आधार पर उजागर करना और जनहित के मुद्दों को प्रभावी ढंग से संसद एवं समाज के समक्ष रखना होता है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में विपक्ष सरकार का विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संतुलन का संरक्षक होता है। उसे विकास कार्यों में सहयोग करते हुए यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शासन पारदर्शी, जवाबदेह और जनोन्मुखी बना रहे। दुर्भाग्यवश, पिछले दो दशकों में विपक्ष का एक बड़ा वर्ग इस रचनात्मक भूमिका से भटकता दिखाई दिया है, जहां नीतिगत बहस की जगह व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक शोर-शराबा अधिक प्रमुख हो गया है।
‘इंडिया’ गठबंधन का गठन एक बड़े राजनीतिक उद्देश्य के साथ हुआ था—भाजपा के वर्चस्व को चुनौती देना। प्रारंभिक स्तर पर यह प्रयास कुछ हद तक सफल भी दिखाई दिया, जब इस गठबंधन ने भाजपा को पूर्ण बहुमत से दूर रखने में भूमिका निभाई, लेकिन समय के साथ यह स्पष्ट होता गया कि यह गठबंधन वैचारिक एकता से अधिक राजनीतिक अवसरवाद पर आधारित है। गठबंधन की सबसे बड़ी कमज़ोरी उसका आंतरिक समन्वय है, जहां विभिन्न दलों के अपने-अपने क्षेत्रीय हित, नेतृत्व की महत्वाकांक्षाएं और अलग-अलग राजनीतिक एजेंडे अक्सर एक-दूसरे से टकराते हैं। सीट बंटवारे से लेकर नेतृत्व के प्रश्न तक, हर स्तर पर मतभेद सामने आते रहे हैं, जिससे यह स्थिति बनती है कि केवल एक साझा विरोध के आधार पर गठबंधन को स्थायी नहीं बनाया जा सकता। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और शिवसेना (यूबीटी) की नेता प्रियंका चतुर्वेदी जैसे प्रमुख चेहरों के बीच जिस तरह की बयानबाजी सामने आई है, वह गठबंधन की आंतरिक स्थिति को और अधिक उजागर करती है। सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे की आलोचना करना न केवल राजनीतिक परिपक्तता की कमी को दर्शाता है, बल्कि कार्यकर्ताओं और मतदाताओं के बीच भी भ्रम की स्थिति पैदा करता है। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन उन्हें व्यक्त करने का तरीका और मंच भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि जब गठबंधन के नेता ही एक-दूसरे के खिलाफ बयान देने लगें, तो यह संदेश जाता है कि गठबंधन केवल नाम का है और वास्तविकता में वह बिखराव की ओर बढ़ रहा है। 
महिला आरक्षण विधेयक पर विपक्ष का रवैया भी उसकी रणनीतिक कमज़ोरी को उजागर करता है। यह विधेयक भारतीय समाज की आधी आबादी से जुड़ा एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय था, लेकिन इसका विरोध जिस रूप में सामने आया, उसने विपक्ष की स्थिति को कमज़ोर किया। विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन उसका स्वरूप रचनात्मक होना चाहिए था। यदि विपक्ष इस विधेयक में सुधार के सुझाव देता, उसके क्रियान्वयन की समय-सीमा और प्रक्रिया पर सवाल उठाता, तो वह अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बन सकता था, लेकिन सीधे विरोध में खड़ा होना, वह भी बिना स्पष्ट जनसंदेश के यह दर्शाता है कि विपक्ष मुद्दों को समझने और उन्हें सही तरीके से प्रस्तुत करने में चूक कर रहा है। इसका प्रभाव विशेष रूप से महिला मतदाताओं पर पड़ा, जिन्होंने इसे अपने अधिकारों के विस्तार के रूप में देखा और इसी का राजनीतिक लाभ भाजपा ने अपनी रणनीति के माध्यम से उठाया। भारतीय जनता पार्टी की सबसे बड़ी ताकत उसकी आत्म-समीक्षा और सुधार की क्षमता रही है। हार के बाद भी वह अपने संगठन, नेतृत्व और रणनीति में बदलाव करती है, जिससे वह और अधिक मज़बूत होकर सामने आती है। इसके विपरीत, विपक्ष अक्सर अपनी हार के कारणों को बाहरी परिस्थितियों में खोजता है, जिससे वह अपनी कमज़ोरियों को पहचानने और उन्हें दूर करने में असफल रहता है। राजनीति में परिपक्कता का अर्थ है हार को स्वीकार करना, उससे सीखना और भविष्य के लिए बेहतर रणनीति बनाना, लेकिन इस दिशा में विपक्ष को अभी लम्बा रास्ता तय करना है। 
जब तक गठबंधन के भीतर स्पष्ट भूमिका निर्धारण, न्यूनतम साझा कार्यक्रम और नेतृत्व की स्वीकृति नहीं होगी, तब तक यह टकराव समाप्त नहीं होगा। विपक्षी दलों की यह नाकामी केवल रणनीतिक कमज़ोरी नहीं, बल्कि उनके नेतृत्व की मंशा और प्राथमिकताओं पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करती है। जब विपक्ष जनहित के मुद्दों को छोड़कर सत्ता प्राप्ति के लिए अवसरवादी गठजोड़, भ्रामक प्रचार और व्यक्तिगत हमलों का सहारा लेता है, तब वह अपनी नैतिक विश्वसनीयता खो देता है।  -मो. 98110-51133

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