युद्ध और शांति के दोराहे पर
इसी वर्ष 28 फरवरी को अमरीका और इज़रायल ने ईरान पर हमला किया था। जिसमें ईरान के प्रमुख नेता खामेनेई सहित अनेक अन्य महत्त्वपूर्ण नेता और सैन्य प्रमुख मारे गए थे। इससे पहले महीनों तक अमरीका और ईरान में अलग-अलग स्थानों पर बातचीत चलती रही थी, जिसमें मुख्य मुद्दा ईरान द्वारा परमाणु बम बनाने का रहा था। इस युद्ध में ईरान का बहुत बड़ा नुकसान हो चुका है। उसकी आर्थिकता लड़खड़ा गई है। पिछले साढे तीन दशकों से इस्लामिक गणराज्य की नीतियों के विरुद्ध समय-समय पर बड़ी संख्या में ईरानियों का रोष फूटता रहा है। इसकी सेना द्वारा अब तक हज़ारों ही उठे विरोधी स्वरों को दबा दिया गया है और हज़ारों ही सरकार विरोधी जेल में बंद हैं, परन्तु अमरीकी हमले के बाद एक तरह से पूरा देश एकजुट हो गया है।
वहां के विशेष सैन्य दस्ते रिवोल्यूशनरी गार्ड का प्रभाव प्रशासन पर बहुत भारी हुआ दिखाई दे रहा है। इन हमलों की प्रतिक्रिया स्वरूप ईरान ने मिसाइलों से इज़रायल पर और अमरीका के खाड़ी देशों के सहयोगियों पर हमले किए, जिससे तेल और गैस के उत्पादन पर बड़ा प्रभाव पड़ा और इन बेहद ज़रूरी वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लग गईं। ईरान ने अपने साथ लगते होर्मुज़ समुद्री मार्ग पर प्रभावशाली ढंग से कब्ज़ा कर लिया है। जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप अमरीका ने ईरान की बंदरगाहों की नाकाबंदी की हुई है। इस पूरे समय में अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मनमज़र्ी वाली नीतियों के कारण आज ज्यादातर देश उसके साथ खड़े दिखाई नहीं देते। यहां तक कि नाटो संधि के सहयोगी देश जिसका सदस्य अमरीका भी है, उसके साथ खड़े होने से हिचकिचा रहे हैं। चाहे डोनाल्ड ट्रम्प ने उन्हें होर्मुज़ समुद्री जल मार्ग को खुलवाने संबंधी कई बार गुहार भी लगाई है परन्तु इटली, फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने इस संबंधी कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। ब्रिटेन ने भी इस युद्ध में उसका साथ देने से इनकार कर दिया है। भारी विनाश और विश्व भर के दबाव के कारण 4 अप्रैल को युद्ध-विराम की घोषणा कर दी गई थी। पिछले 34 दिनों में इस मामले पर बहुत कुछ घटित हो चुका है। पाकिस्तान युद्ध-विराम करवाने के लिए सक्रिय रहा है परन्तु इस्लामाबाद में दोनों पक्षों में एक बैठक के बाद बड़े यत्नों के बाद भी दोनों पक्षों की दूसरी बैठक नहीं हो सकी। रूस और चीन ने भी अपने-अपने ढंग से युद्ध रुकवाने के लिए बड़े यत्न किए हैं, क्योंकि चीन भी ईरान से भारी मात्रा में तेल आयात करता रहा है। ईरान चाहे होर्मुज़ जल मार्ग से अपनी पकड़ छोड़ने से इनकार कर रहा है परन्तु उसका यह फैसला अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर उसके विरुद्ध जाता दिखाई दे रहा है। यदि युद्ध संबंधी समझौते में देरी होती है तो इस मामले में ईरान बचाव की नीति पर आ जाएगा। ईरान द्वारा ऐसा प्रतिबन्ध अन्तर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन है। संयुक्त राष्ट्र की समुद्री कानून संबंधी संधि के तहत सभी देशों को अपने क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय आवागमन के लिए स्वीकृति देनी पड़ती है। इस समुद्री मार्ग को लम्बे समय तक रोका जाना ईरान को महंगा पड़ेगा। यहां तक कि चीन ने भी ईरान को यह मार्ग खोलने के लिए कहा है।
चाहे दोनों पक्षों द्वारा हो रही बातचीत और सम्भावित समझौते के यत्नों को अपने-अपने पक्ष से पेश किया जा रहा है, जिस पर कोई शांतिपूर्ण हल ढूंढने की उम्मीद भी बनती है परन्तु इसके साथ ही होर्मुज़ मामले पर युद्ध पुन: शुरू होने की सम्भावना भी बनती दिखाई देने लगी है। यदि ऐसा होता है तो इससे ईरान का भारी विनाश होने की सम्भावना बन जाएगी, परन्तु दूसरी तरफ अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर इस भारी विनाश के लिए अमरीका की छवि भी पूरी तरह धूमिल हो जाएगी, जो आज विश्व की इस बड़ी शक्ति के लिए प्रत्येक पक्ष से बेहद बुरा संदेश सिद्ध होगा। इस विनाश से पहले अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर इस युद्ध को रुकवाने के लिए यत्न और अधिक तेज़ होने चाहिएं।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

