सलीबनामा

जी हां, उन्होंने हमारा सलीबनामा लिख दिया, क्योंकि उनके बहुत चाहने पर भी हमने उनके मुताबिक मरने से इन्कार कर दिया था। 
जी नहीं, असल मौत मरने से इन्कार नहीं। वह तो हमारा अभिनंदन करना चाहते थे, शायद हमारे गले में फूलों की माला भी पहना देते। शायद समय का सबसे बड़ा ईनाम भी हमें अता फरमा देते, अगर हम उनका जयघोष बन जाते। उनके हक में उठा हुआ एक और ज़िन्दाबाद का नारा बन जाते। जी हां, उनकी महफिल में कामयाबी या आपके नंगे सिर पर जीत का ताज तभी पहनाया जाता है, अगर आप उनकी स्वामी-भक्त कतार में शामिल हो जाएं। यह कतार सदियों से चल रही है, और अगली सदी तक चलती रहना चाहती है। एक व्यक्ति साम, दाम, दण्ड, भेद की चाणक्य नीति अपना कर कुर्सी पर बैठ जाता है। अब तो उसे खुदा भी इस कुर्सी से नहीं उठा सकता। वह बूढ़ा हो जाएगा, अक्षम हो जाएगा, तो उसके नाती-पोते इस कुर्सी पर विराजमान होंगे क्योंकि साबित किया जाएगा कि वैसे तो हम परिवारवाद के विरुद्ध हैं। यह पुरान सूक्त भी नहीं मानते कि ‘पिता पर पूत जात पर घोड़ा, बहुत नहीं तो थोड़ा-थोड़ा।’
बेशक ऐसे सभी पुराने सूक्तों से हमें बासी तासीर या बासी हो जाने की गन्ध आने लगती है। हम ठहरे इक्कीसवी सदी के कामयाब व्यक्ति। भला, किसी पुरानेपन की उतरन हम कैसे स्वीकार कर लेते? परिवारवाद को सिद्ध करने वाले ऐसे सब पुराने मुहाविरे सुनें तो बोले, ‘उतरन ही तो हैं।’
इसीलिए हम परिवारवाद के विरुद्ध बगावत का झण्डा बुलन्द करते हैं, लेकिन भाईजान, अपवाद तो हर सैद्धांतिक घोषणा में होते हैं। देश के भले के लिए हम इन अपवादों की उपेक्षा करके देश-द्रोह नहीं कमा सकते। इसीलिए कुर्सी पर आसीन हर बड़े नेता के घर में दो चार विलक्षण प्रतिभा वाले बेटे, नाती-पोते तो रहते हैं, जो इस देश का महा-कल्याण कर सकते हैं। इसलिए ये ऐसी विलक्षण प्रतिभा को नकार कर देश की विकास दर को कैसे धीमा कर देते? यह विकास दर इस समय दुनिया भर में सर्वश्रेष्ठ है, पता है न। इसलिए अपने लिए नहीं, देश की विकास दर को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बना कर रखने के लिए इन विलक्षण प्रतिभा वाले नाती-पोतों को नेता की वृद्धावस्था के कारण खाली हो गई गद्दी पर आसीन करवाया जाना चाहिए। अफसोस, वास्तविक युवा पीढ़ी जिसे नया खून कहा जाता है, इन राज परिवारों के रौशन चिरागों का विकल्प न बन सकी?
हां, जो चतुर बुद्धि हैं, वह कुछ न कुछ अवश्य बन गये, लेकिन इस सत्तासीन नेता के बेटे का जयघोष करने, उसकी जीत के लिए उठा हुआ ज़िन्दाबाद का एक हाथ बनने के बाद।
—तो जनाब यहां सलीबनामा किस का लिखा गया? बेशक उन उदीयमान युवा प्रतिभाओं का जिन्होंने बरसों से अपनी पारी का इंतज़ार किया है, लेकिन ऊंचे घरानों की फसीलों तक वे भी पहुंच नहीं पाए। बस उनके प्रासाद के सामने फैली एक सूखी टहनी ने उन्हें एक कटी पतंग की तरह थाम लिया, और खुद स्थापना का एक कुतुबमीनार बन गई।
हमने स्थापना के यह कुतुबमीनार पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होते देखी है और आप मज़े से लोकतंत्र की जय की बांसुरी पर लय निकालते हुए कृत्य-कृत्य होते रहिए। वोट सूचियों में नवीनीकरण के नाम पर लाखों वोटरों के नाम कटते देखिए और न्यायिक प्रक्रिया मुखर अभिव्यक्ति का दावा करते हुए परामर्श दे देती है, कि इस अन्याय के विरुद्ध ऊंची अदालत में दावा ठोक दो। याचिका दाखिल ही तो करनी है। कभी न कभी तो इसकी सुनी जाएगी। इस महा-चुनाव में नहीं तो अगले महा-चुनाव में वोट डाल लेना। वे कहेंगे, ऊंची अदालत से उनके असंतोष का यही निकाकरण है और नौकरशाही या उसकी जनक तारीख पर तारीख डालने वाली न्यायिक प्रक्रिया कहती है, ‘हम देर करते नहीं, देर हो जाती है।’
लेकिन ऐसी देर करने का दावा करने वालों को भी तरह-तरह के लाभ मिलते हैं। जानते हैं कि इस समय के फैसले को अंतरिम आदेश मान कर अपना लिया जाएगा और अपने-अपने घर की चौखट से उड़ान भरने के लिए आतुर युवा-शक्ति परीक्षा देने के बावजूद नकल के जिन्न के द्वारा चारों शाने चित्त कर गिरा दी जाएगी। मुर्दे एक उसांस भर कर उठ बैठेंगे। क्या इसीलिए तो लाखों सही छात्रों को सलीबनामा भेंट कर दिये गये? पूछते हैं। फिर अगर कोई सलीबमा कहीं कराहता नज़र आ जाए तो समझ लेना, यह पथ बंधु अपने असहमत रवैये को बदलने के लिए तैयार नहीं था। उसे एक सलीबनामा भेंट कर दिया गया। यही इसका उपहार है।
याद रखो, कलाकार हो या पत्रकार, अगर उसे अपने नेता जी की धुन पर नाचना आता है, तो यह नेता जी उसे भी बड़े-बड़े पुरस्कारों से नवाज़ देंगे। हां, यह धुन ठकुरसुहाती या गदगद हो जाने की धुन होती है। इसमें अगर मौलिकता की पद-चुम्बन की रवायती तस्वीर उभर आए तो समझ लेना जाने कितनी जैनुयन प्रतिभाओं को सलीबनामा भेंट कर ये ईनाम की सीढ़ी चढ़ पाये हैं इनका अभिनंदन अवश्य हो।

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