क्या रवि लामिछाने की यात्रा से सुलझेगा नेपाल-भारत सीमा-विवाद ?
प्रथम जून को नेपाल की सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष रवि लामिछाने की भारत की पांच दिवसीय यात्रा बालेन शाह के नेतृत्व में नेपाल में नई सरकार के गठन के बाद सत्ताधारी पार्टी के किसी वरिष्ठ नेता की यह पहली भारत यात्रा है। लामिछाने का दौरा ऐसे समय में हो रहा है, जब एक दिन पहले ही प्रधानमंत्री बालेन शाह के संसद में पहले भाषण में भारत को लेकर दिए बयान पर नेपाल की राजनीति गरमाई हुई है। लामिछाने का यह दौरा भारत की सत्ताधारी भाजपा के अध्यक्ष नितिन नवीन के निमंत्रण पर हो रहा है। नई दिल्ली प्रवास के दौरान लामिछाने भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर, विदेश सचिव विक्रम मिसरी और सरकार के अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठकें करेंगे।
यात्रा से परिचित सूत्रों का कहना है कि लामिछाने की भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ बैठक आयोजित करने के प्रयास भी जारी हैं। इस यात्रा के दौरान लामिछाने की पत्नी निकिता पौडेल, महासचिव बिपिन आचार्य, सांसद दीपक बोहरा और प्रदीप आचार्य साथ रहेंगे। गौरतलब है कि नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह ने संसद में सीमा विवाद को लेकर कहा था कि नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्ज़ा किया है। इस बयान से नेपाल में विवाद पैदा हो गया, जिसके बाद अब वहां के विदेश मंत्रालय ने इस मामले पर सफाई भी दी है। रविवार को एक बयान जारी करते हुए विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि शाह की टिप्पणी दोनों देशों के बीच ‘नो-मैन्स लैंड’ और सीमा पार के कब्ज़े से जुड़ी हुई थी। बयान में कहा गया कि भारत के साथ नेपाल की वर्तमान सीमा 1816 की सुगौली संधि पर आधारित है। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने बयान में कहा, ‘नेपाल-भारत सीमा क्षेत्र में लिम्पियाधुरा, लिपुलेख, कालापानी और सुस्ता ऐसे क्षेत्र हैं जिनका सीमांकन किया जाना अभी बाकी है। नेपाल और भारत दोनों ने कूटनीतिक माध्यमों और आपसी चर्चा से सीमा मुद्दों को सुलझाने की प्रतिबद्धता जताई है।’ नेपाली प्रधानमंत्री की टिप्पणियों के बाद नेपाल में विवाद शुरू हो गया है। नेपाली कांग्रेस और नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं ने बालेन शाह की टिप्पणियों पर आपत्ति जताते हुए इन्हें संसद के रिकॉर्ड से हटाने की मांग की। विपक्ष ने कहा कि प्रधानमंत्री को सबूत पेश करने चाहिएं या अपना बयान वापस लेना चाहिए।
भारत और नेपाल के बीच वर्षों से चले आ रहे सीमा विवाद पर नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह की एक टिप्पणी अब एक और ने नया राजनीतिक विवाद खड़ा कर दिया है। उन्होंने कहा कि केवल भारत ने ही नहीं, बल्कि नेपाल ने भी भारत की जमीन पर कब्ज़ा किया है। संसद में दिए गए उनके बयान के बाद विपक्ष ने सवाल उठाए। इस पर नेपाल के विदेश मंत्रालय को आधिकारिक सफाई जारी करनी पड़ी।
ज्ञात हो कि इस वर्ष नेपाल के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने बालेन शाह पहली बार अपने देश की संसद को संबोधित करते हुए भारत और नेपाल के बीच कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को लेकर जारी सीमा विवाद का जिक्र किया। हालांकि, उन्होंने विवाद के समाधान के लिए दोनों देशों को मित्रतापूर्ण बातचीत की सलाह दी लेकिन इसी दौरान दिया गया उनका एक बयान चर्चा का विषय बन गया।
बालेन शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें एक ऐसी जानकारी मिली जिसने उन्हें भी हैरान कर दिया। उनके अनुसार केवल भारत ने ही नेपाली क्षेत्र में अतिक्रमण नहीं किया है, बल्कि नेपाल ने भी कई स्थानों पर भारतीय भूमि पर कब्जा किया है। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को इतिहासकारों, सर्वेक्षकों और विशेषज्ञों की मदद से तथ्यों का अध्ययन करना चाहिए और फिर मित्र देशों की तरह बैठकर इस मुद्दे का समाधान निकालना चाहिए। बालेन शाह ने नेपाली संसद को बताया कि नेपाल ने सीमा विवाद से जुड़े मुद्दों को चीन और ब्रिटेन के समक्ष भी उठाया है। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन को इस पर रुचि लेनी चाहिए, क्योंकि यह मुद्दा उसी समय का है, जब उन्होंने देश छोड़ा था। ब्रिटेन का उल्लेख उन्होंने क्षेत्र में उसके औपनिवेशिक इतिहास के संदर्भ में किया।
प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर नेपाल की राजनीति में तुरंत प्रतिक्त्रिया देखने को मिली। नेपाली कांग्रेस की बसना थापा और नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी के रमेश मल्ला समेत कई विपक्षी सांसदों ने बयान पर आपत्ति जताई। उन्होंने मांग की कि प्रधानमंत्री या तो अपने दावे के समर्थन में प्रमाण पेश करें या फिर बयान वापस लें। पूर्व विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञवाली ने भी कथित तौर पर प्रधानमंत्री से माफी मांगने की मांग कर डाली। नेपाल-भारत सीमा मामलों के विशेषज्ञ और भूगोलवेत्ता बुद्धि नारायण श्रेष्ठ ने प्रधानमंत्री के दावे को खारिज किया। उन्होंने कहा कि नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र पर अतिक्रमण किए जाने का कोई उदाहरण नहीं है। हालांकि, उन्होंने माना कि कुछ सीमावर्ती इलाकों में सीमा स्तंभों के गायब होने और लोगों के आवागमन के कारण दोनों देशों के किसानों ने एक-दूसरे की जमीन का उपयोग किया है, लेकिन इसे सरकारी स्तर पर अतिक्रमण नहीं कहा जा सकता।
प्रधानमंत्री के बयान के कुछ घंटों बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी किया। मंत्रालय ने कहा कि प्रधानमंत्री का आशय यह नहीं था कि नेपाल ने आधिकारिक तौर पर भारतीय भूमि पर कब्जा कर लिया है। मंत्रालय के अनुसार, उन्होंने सीमा क्षेत्र में मौजूद ‘नो मैन्स लैंड’ और दोनों देशों के लोगों द्वारा एक-दूसरे की जमीन के उपयोग से जुड़ी परिस्थितियों का उल्लेख किया था। सफाई में कहा गया कि कुछ ऐसे क्षेत्र हो सकते हैं जहां भारतीय नागरिकों द्वारा उपयोग की जा रही भूमि नेपाल की सीमा में आती हो और इसी तरह कुछ नेपाली नागरिक भारतीय क्षेत्र में स्थित भूमि का उपयोग कर रहे हों।
प्रधानमंत्री का यह बयान ऐसे समय आया है जब कुछ सप्ताह पहले ही नेपाल ने लिपुलेख मार्ग से होने वाली कैलाश मानसरोवर यात्रा पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई थी। नेपाल के विदेश मंत्रालय ने कहा था कि 1816 की सुगौली संधि के अनुसार लिम्पियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी नेपाल के अभिन्न हिस्से हैं। वहीं, भारत का कहना है कि ये इलाके उत्तराखंड का हिस्सा हैं। दोनों देश इन क्षेत्रों पर अपना दावा करते हैं। भारत, चीन और नेपाल के त्रि-जंक्शन के निकट स्थित ये क्षेत्र कई वर्षों से विवाद का केंद्र रहे हैं। जून 2021 में तत्कालीन प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली सरकार ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को नेपाल का हिस्सा दिखाया था। भारत ने नेपाल के इस दावे को खारिज करते हुए इसे एकतरफा और कृत्रिम रूप से सीमा विस्तार का प्रयास बताया था। भारत का कहना है कि इन क्षेत्रों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता के जरिए होना चाहिए।



