हिमाचल में निगम चुनाव का संदेश
हिमाचल प्रदेश के चार नगर निगमों के विगत दिवस सम्पन्न हुए चुनावों के परिणामों ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि देश की जनता अब ऊंची आवाज़ में लगाये जाते नारों और बड़ी-बड़ी जनसभाओं में उमड़ती भीड़ों से प्रभावित नहीं होती, अपितु वह अपने राजनीतिक-सामाजिक हितों के संरक्षण हेतु दूरगामी परिणामों संबंधी विचार के बाद ही मतदान करती है। चुनावों के अन्तर्गत आये ये चार निगम हैं धर्मशाला, सोलन, मण्डी और पालमपुर। चुनाव परिणामों के अनुसार इनमें से सिर्फ पालमपुर निगम में कांग्रेस अपनी साख और छवि को बचाने में सफल रही है जबकि मण्डी, सोलन और धर्मशाला निगमों में भाजपा ने अपना ध्वजारोहण बड़े जोश-खरोश के साथ किया है। इसके साथ ही, हिमाचल के इन स्थानीय निकाय चुनावों ने यह भी जताया है कि प्रदेश में व्याप्त दो दलीय राजनीति में बारी-बारी से सत्ता के हस्तांतरण की प्रथा आज भी पूर्व की भांति जारी है।
हिमाचल प्रदेश में पिछली सरकार मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के नेतृत्व में भाजपा की थी, किन्तु वर्ष 2022 में हुए चुनावों में कांग्रेस ने जीत दर्ज करके मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू के नेत्व में सरकार बनाई थी। अब 2027 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं, तो प्रदेश के लोगों में यह माना जा रहा था कि मौजूदा चार नगर निगमों के चुनाव इस हेतु सेमीफाइनल कहे जा सकते हैं।
प्रदेशों की राजनीति में प्राय: यह माना जाता है कि सत्तारूढ़ पार्टी अधिकतर उप-चुनाव और स्थानीय निकाय तथा ज़िला परिषद चुनावों को साम, दाम, दण्ड, भेद किसी भी ज़रिये से जीत लेती है, किन्तु हिमाचल प्रदेश में इस बार यह अजब बात हुई है कि सत्ता में रहते हुए भी कांग्रेस चार में से तीन निगमों के चुनाव हार गई है। इससे पूर्व परोक्ष रूप से ज़िला परिषद चुनावों में भी भाजपा ने अधिकतर ज़िलों में जीत दर्ज की थी हालांकि ये चुनाव पार्टी चुनाव चिन्हों पर नहीं लड़े गये थे। परिणाम के बाद बेशक कांग्रेस और भाजपा, दोनों ने अपने-अपने समर्थकों की जीत का दावा किया था, और दोनों ने अपने समर्थकों की सूचियां भी जारी की थीं किन्तु राजनीतिक विश्लेषकों ने दावा किया था कि भाजपा ने इन चुनावों में भी दो तिहाई बहुमत तक जीत दर्ज की। इन स्थानीय निकाय चुनावों का एक पक्ष यह भी है कि प्रदेश सरकार किसी न किसी बहाने इन चुनावों को टालना चाहती थी। इसके लिए अतीत में आई बाढ़ों को भी बहाना बनाया गया। मामला पहले उच्च न्यायालय और फिर सर्वोच्च न्यायालय में भी गया। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार सरकार को अन्तत: चुनाव कराने ही पड़े जिसके परिणाम-स्वरूप भाजपा ने सेमीफाइनल जीत लिया। यहां तक कि मुख्यमंत्री के अपने गृह ज़िला में भी किला भेद लिया।
इन चुनावों में एक दिलचस्प मुकाबला ज़िला मण्डी नगर निगम में रहा जहां कुल 15 सीटों में से 14 पर चुनाव हुआ, और इन चौदह में से 12 सीटें भाजपा जीत गई। यहां कांग्रेस को केवल एक ही सीट मिल सकी जबकि एक सीट पर निर्दलीय कामयाब हुआ। मण्डी ज़िला हमेशा से कांग्रेस और भाजपा के लिए नाक का सवाल रहता आया है। वर्ष 2024 में हुए लोकसभा चुनावों में यहां से भाजपा की मुख्य नेत्री, अभिनेत्री कंगना रनौत कांग्रेसी दिग्गज पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह को लगभग एक लाख से अधिक मतों के अंतर से हरा कर सांसद चुनी गई थीं। यह इलाका कभी कांग्रेस का गढ़ समझा जाता रहा है। कांग्रेस के लिए सितम की बात यह भी रही है कि विधानसभा चुनावों के बाद हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस जहां चारों लोकसभा सीटें हार गई थी, वहीं इसके उपरांत सम्पन्न हुए सभी प्रकार के चुनावों में भाजपा बाज़ी मार ले जाती रही है। सोलन निगम में कांग्रेस अपनी पुरानी 9 सीटों में से तीन हार गई। उसे अब केवल 6 सीटों पर संतोष करना पड़ा।
हम समझते हैं कि प्रदेश में कांग्रेस के इस अवसान के लिए पार्टी का भीतरी घमासान बड़ी सीमा तक ज़िम्मेदार हो सकता है। पिछले कुछ समय में कांग्रेस के कई बड़े नेता पार्टी को छोड़ कर भाजपा में चले गये। वर्तमान में भी पार्टी संगठन और कांग्रेस सरकार के भीतर चेहमगोइयां सुलगने के समाचार मिलते रहते हैं। सत्ता व्यवस्था के विरुद्ध रुझान की सुगबुगाहट भी समय-समय पर सुनाई देती रहती है। पार्टी के अपने विधायक भी अक्सर मुद्दों पर विरोधी स्वर अलापते रहते हैं। हम समझते हैं कि बेशक हिमाचल प्रदेश में प्राय: प्रत्येक चुनाव में सत्ता का राजनीतिक अदल-बदल होता रहता है। मुख्यमंत्री सुक्खू को यदि इस परम्परा को तोड़ना है, और अगली सरकार फिर कांग्रेस की बनानी है, तो उन्हें एक ओर जहां पार्टी के भीतरी असंतोष की अग्नि का शमन करना होगा, वहीं जन-साधारण के बीच सत्ता-विरोधी असंतोष को खत्म करने हेतु त्वरित यत्न करने होंगे। भाजपा ने अनुशासित रह कर नि:संदेह अपनी पार्टी के आधार को मजबूत किया है। कांग्रेस को भी जन-साधारण के बीच उतर कर उनकी बात सुननी होगी।



