दलाल संस्कृति का महिमा-मंडन
जिन्होंने दुनिया को युद्ध का दावानल भेंट कर दिया है, वे पूरी बेशर्मी के साथ दुनिया में शांति स्थापित करने का सबसे बड़ा पुरस्कार मांग रहे हैं, और जनाब बार-बार मांग रहे हैं। इतना ही नहीं, अगर किसी कमज़ोर या ईमानदार को यह पुरस्कार मिल जाए तो उसे मजबूर कर देते हैं कि वह अपना पुरस्कार उन्हें भेंट कर दे, और यह भेंट करने का समारोह वह खुद ही आयोजित करे और उनके स्वागत में भाषण दे। यह आयोजित करना भी खूब है साहिब। आज अपने महान होने का उत्सव खुद आयोजित करने में कोई बुराई नहीं समझी जाती। देश के लगातार महान आर्थिक शक्ति बन जाने की घोषणाएं भी समय-समय पर कर दी जाती हैं। फुटपाथी लोग अपनी फटी जेबों में अपनी महानता तलाश करते हैं तो पाते हैं कि उनकी महानता इस बात में निहित है कि वह कल भी रियायती और सस्ता अनाज देने वाली सरकारी दुकानों की कतार में खड़े थे, आज भी देश के आर्थिक विकास दर की घोषणा दुनिया में सर्वाधिक हो जाने के बाद भी उसी कतार में खड़े हैं, और रियायत की रेवड़ियां बांटने की इस तिथि में विस्तार हो जाने के सच का बड़ी शिद्दत के साथ इंतज़ार कर रहे हैं।
आप उनसे पूछ सकते हैं, ‘अरे वह आर्थिक ताकत में महाबली हो जाने का सच कहां नज़र आया’ तो जवाब महाभारत से उधार लिया गया पौराणिक सत्य के रूप में मिल जाता है, ‘अन्धे का पुत्र अन्धा, गरीब का बेटा फटीचर।’
देखते नहीं हो जिन्होंने दुनिया को साम दाम दण्ड भेद से रंक से राजा बनना सिखाया है, वह टूटी झोंपड़ी से आलीशान प्रासाद बन गये हैं, और दुनिया को हथेलियों पर सरसों जमाने का फार्मूला सिखा रहे हैं। देश तेज़ी से सांस्कृतिक हो रहा है। हां, यह संस्कृतियां आपकी गौरवशाली परम्परा से नहीं, आपके लिए हवाओं से उतरती हैं। लोग आत्मालोचन की जगह प्रवचन देना पसन्द करने लगे हैं, और देश के सांस्कृतिक निरुपण के कायाकल्प में लगे हैं। सांस्कृतिक समझ जो आदर्शों के पालन, और नैतिकता एवं मर्यादा को अंगीकार करने से पैदा होती है, उसे गुज़रे ज़माने का दिवंगत मान कर अपने प्रोत्साहन भाषणों में शार्टकट संस्कृति की वकालत कर रहे हैं। इसमें जनता को उपलब्धि हो जाने का तरीका भी बता दिया जाता है, और वह है सम्पर्क संस्कृति। यह सम्पर्क संस्कृति एक नई समझ से पैदा होती है। इसका सबसे बड़ा आधार स्तम्भ है दावा करने की बड़ी से बड़ी सामर्थ्य। कोई आपको चाहे उन कारगर लोगों की दहलीज़ तक न फटकने दे, लेकिन आप में ताकत होनी चाहिए कि आप उसके साथ अपने निकट संबंधों या दांत-काटी रोटी का रिश्ता बरसों से होने का दावा कर सकें। किसी ने आपको उस भीड़ में पहुंचा दिया, जो देश के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री की भीड़ बनी थी। कहीं आपको उससे हाथ मिलाने का मौका मिल गया, तो आराम से अपने जीवन वृत्त में शामिल कर लीजिये कि इन महामानवों ने आपको बुला कर सम्मानित किया, अभिनंदित किया है, कि आपको कहा है, महोदय आपके बिना यह देश नहीं चल सकता। लीजिये यह हमारे सात-सात अभिनंदन।
वैसे भी आजकल तो सम्मानित होना या डिग्रियां प्राप्त करके महा-विद्वान कहलाना घोर व्यवसायिक बन गया है। देखते नहीं हो कि आकर्षक नामों वाली अकादमियां उभर आई हैं। अगर बड़ी से बड़ी डिग्री प्राप्त करनी है या कोई भी पुरस्कार लेना है तो इन्हें प्रार्थना-पत्र दीजिये। इसकी बाकायदा फीस चुकाइए, आपको वह उपाधियां या डिग्री प्रदान कर दी जाएगी। सिर्फ उसके साथ मानद लिख दिया जाएगा।
इतना ही क्यों, अब धनाढ्य और समर्थ लोगों ने वंचित सरस्वती पुत्रों की एक सेना भी अपने लिए सजा ली है। ये सैनिक आपके लिए संस्मरण से लेकर पुस्तकें तक लिख देते हैं। मारामारी इतनी हो गई कि अब तो इन घोस्ट लेखकों ने ऐसा लिखने की डिस्काऊंट सेल भी लगा दी है और बाकायदा समर्थ लोगों की जेबों का इंटरव्यू लेकर उनके लिए अपनी बड़ी-बड़ी डिग्रियों, उपाधियों या पुस्तकों का लेखक बना रहे हैं।
वैसे अपनी किसी भी हरकत से शर्मिन्दा हो जाना आज के वर्तमान शब्दकोष से गायब हो चुका है। लोग असत्य भाषण को अपनी ताकत मानने लगे हैं, और अपनी काल्पनिक सफलताओं को इतनी बार दोहरा देते हैं कि उन्हें खुद लगने लगता है कि उन्होंने तो वास्तव में दुनिया जीती थी, और वह आज के सिकंदर महान हैं। हां, जो असली सिकंदर था उसके बारे में तो रहस्योद्घाटन कर देते हैं, कि वह तो घिसट-घिसट कर मरा। जब उसकी अर्थी निकली तो उसके दोनों खाली हाथ कफन से बाहर निकाल दिये गये, कि देख लो वह मरते वक्त भी खाली हाथ रहा। क्योंकि जो उसे मिलना चाहिए था, वह तो रास्ते में खड़े दलालों ने हथिया लिया, और फिर चिल्लाये, दलाल संस्कृति ज़िन्दाबाद।



