मथुरा बनेगा उत्तर प्रदेश में अगले विधानसभा चुनावों का अखाड़ा    

मथुरा में पूरे देश से कारसेवकों को आने का आह्वान तथा कार सेवा का ऐलान, आजाद भारत में मंदिर निर्माण के लिए यह कारसेवा नंबर दो है। पहली कारसेवा 1992 अयोध्या में रामलला के मंदिर निर्माण के लिए हुई थी और यह दूसरी अब 34 साल बाद मथुरा में होने जा रही है। पहली कारसेवा का परिणाम सभी देख चुके हैं। अब दूसरी से क्या होगा, हर भारतवासी के दिल में कचोट रहा है। चर्चा है कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी विवाद की आंधी का जवाब अब मथुरा के श्री कृष्ण जन्मभूमि मंदिर में कारसेवा के तूफान से देने की तैयारी आरंभ हो गई है। मथुरा में कारसेवा का आह्वान करना एक ऐसी रणनीति का हिस्सा हो सकता है, जो अगले साल उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों में तहलका मचा दे। 
पहले इसके लिए जो तारीख तय की गई थी, वह 9 अगस्त 2026 थी। फिर अखाड़ा परिषद ने कुछ सोचकर 9 अगस्त को कैंसिल कर दिया और कहा कि अगली तारीख का ऐलान बाद में होगा। अब कहा यह जा रहा है कि कांवड़ मेला के बाद यह तारीख तय की जायेगी। कांवड़ मेला इस बार 11 अगस्त 2026 तक है। पहले शायद जल्दीबाजी में यह तारीख तय कर दी गई थी। कांवड़ मेले में काफी संख्या में संत-महात्मा जाते हैं और अमरनाथ यात्रा में भी संतों की भागीदारी बड़े स्तर पर होती है। ऐसे में 9 अगस्त को उनकी उपस्थिति कम हो सकती है। शायद यही सोचकर 9 अगस्त की तारीख को रद्द किया गया है। इस बात को जानने की उत्सुकता सभी में है कि इस कार सेवा में सिर्फ साधु-संत ही शामिल होंगे या सामान्य नागरिक भी होंगे और इस कारसेवा में क्या किया जायेगा?  
खैर, चढ़ावा चोरी का मामला समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव ने जून माह में एक प्रेस वार्ता करके उठाया था। इसके बाद पूरे देश में इसे मुद्दा बना दिया गया। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि अयोध्या में सन् 1990 में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने ही कारसेवकों पर गोली चलवाई थी। इस तरह पहले पिता और अब पुत्र, शायद कारसेवा के बायस बनेंगे। राम के नाम पर विवाद करने के लिए इन दोनों की ही आलोचना उनके विरोधी करते रहे हैं। इस वक्त मंदिरों में दान-पुण्य के नाम पर हो रहे घोटाले सामने आ रहे हैं। उनकी संख्या दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। राम मंदिर के बाद उत्तराखंड के बद्रीनाथ मंदिर में घोटाले की परतें उधड़ना आरंभ हो चुकी हैं। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मस्थान में भारी भरकम रकम के गबन के आरोप हैं। मध्यप्रदेश के मां बगलामुखी मंदिर में भी रकम चोरी की शिकायत है। राजस्थान में लकवा के उपचार के लिए प्रसिद्ध बुटाटी धाम में हेराफेरी की शिकायत है। वर्ष 2024 में केदारनाथ मंदिर से भी करीब 20 किलो से अधिक सोने की प्लेटों के गायब होने की बात सामने आयी थी, लेकिन बाद में इसे वहां की दीवारों में मढ़वाना बताया गया। इसके साथ ही कई और भी मंदिर हैं, जहां चढ़ावा चट किये जाने का शक गहराता जा रहा है। 
खैर, मथुरा का श्रीकृष्ण जन्मभूमि विवाद, राम मंदिर की तरह खिंच रहा है और अब संत-महात्माओं की इस घोषणा के बाद क्या होगा, सवाल यह है। क्या अयोध्या की तरह कारसेवा को दोहराएंगे या फिर कोई और दूसरी रणनीति है। 13 अखाड़ा परिषदों के संगठन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के इस ऐलान के बाद यह बात भी उठ रही है कि श्रीकृष्ण के वंशज कहे जाने वाले यदुवंशी अर्थात यादवों के मुखिया का दावा करने वाली सपा के प्रमुख अखिलेश यादव क्या करेंगे? वैसे यह भी कहा जा रहा है कि वह खुद यहां आकर एक ईंट लगाकर श्रीकृष्ण मंदिर के निर्माण कार्य का शुभारंभ कराएं? अखाड़ा परिषद के प्रवक्ता डा. रविन्द्र पुरी के इस बयान के बाद कुछ दिन पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा अखिलेश यादव से पूछे गए इस प्रश्न कि वह मथुरा श्रीकृष्ण मंदिर मामले में अपनी राय स्पष्ट करें, को भी देखा जा रहा है। इस तरह देखा जाए तो अगले वर्ष होने वाले चुनावों से पहले उत्तर प्रदेश एक बार फिर राम के बाद श्रीकृष्ण के नाम पर राजनीतिक अखाड़ा बनने जा रहा है। इस बात से इन्कार नहीं है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति दूसरी बातों से कम धार्मिक भावनाओं से अधिक प्रभावित होती है और अगर कारसेवा की घोषणा हुई है तो इसके पीछे भी कहीं न कहीं सत्ता की रणनीति हो सकती है। 
कारसेवा का दबाव कांग्रेस और सपा के साथ ही बसपा पर भी आयेगा। इसका सीधा लाभ भाजपा को मिलेगा। कारण यह कि भाजपा चढ़ावा मामले में उस प्रकार से मुखर नहीं हो रही है, जिस तरह से सपा या दूसरे दल। चोरी के आरोप झूठे भी सिद्ध हो रहे हैं। काकभुशुंडि, सोना मढ़ी रामायण, बड़ा हार चोरी हो गया, गबन कर लिया गया जैसे आरोप मीडिया में तो खूब लगे पर जब वह सामने आ गए, तो इस तरह के आरोप लगाने वालों की लानत-मलामत भी खूब हुई। हालांकि अभी पूरी तरह से चढ़ावा मामला सुलझा नहीं है और इस बीच  अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव होने हैं और यहां के नतीजे पूरे देश की राजनीति को प्रभावित करते हैं। चुनावों के लिए अब एक साल भी नहीं बचा है और भाजपा का यह आधार रहा है कि वह चुनावों से बहुत पहले उसकी तैयारियां आरंभ कर देती है। हाल में बंगाल में हार के बाद से सभी दल इस बात से सतर्क भी हैं कि जब भाजपा वहां पर अपना झंडा फहरा सकती है, तो उसके लिए उत्तर प्रदेश को जीतना बहुत कठिन नहीं है। 
कारसेवा का स्वरूप क्या हो सकता है? इस पर अब हर कहीं माथापच्ची आरंभ हो गई है। हो सकता है इसे रामलला आंदोलन की तरह कोई एक राह दे दी जाए। बहुत संभावना है कि अखाड़ा परिषद इस दिन यहां पर प्रतीकात्मक काम आरंभ करे, प्रतीकात्मक संकल्प दिलाए और भारत छोड़ो आंदोलन की तरह मथुरा छोड़ो आंदोलन का आहान् करे। 
यहां पर भव्य मंदिर है तथा गर्भगृह में श्रीकृष्ण की पूजा हो ही रही है। शाही ईदगाह मस्जिद को लेकर माना जाता है कि इसे श्रीकृष्ण जन्मस्थान पर बने पुराने मंदिर को तोड़कर बनाया गया है। अब मांग यह है कि यहां की पूरी भूमि श्रीकृष्ण जन्मभूमि ट्रस्ट को मिले और मंदिर का पुन:निर्माण हो। हो कुछ भी, पर इससे इनकार नहीं कि कारसेवा के ऐलान ने हिंदू विरोधी घोषित राजनेताओं के लिए एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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