संसदीय कार्यवाही का चलना ज़रूरी

दिल्ली में संसद का मानसून सत्र शुरू होते ही जिस तरह का माहौल बनता दिखाई दे रहा है, उससे यह प्रतीत होने लगा है कि इस बार भी यह सत्र हंगामों की भेंट ही चढ़ जाएगा। नीट की परीक्षा के समय पेपर लीक होने के समाचारों ने जहां देश भर में लाखों ही विद्यार्थियों के मन में रोष और अशांति पैदा की थी, उस कारण केन्द्र सरकार की कड़ी आलोचना भी हुई थी और उसका भारी नुक्सान भी हुआ था। एक छात्र नेता अभिजीत दीपके द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक छात्र वर्ग के संबंध में की गई टिप्पणियों को लेकर सोशल मीडिया पर जो अभियान चलाया गया था, उसको भारी समर्थन मिला था। इस उपरांत उसने अपने साथियों के साथ कॉकरोच जनता पार्टी (सी.जे.पी.) बनाने की घोषणा कर दी थी और फिर उनकी ओर से अमरीका से भारत लौट कर नीट प्रश्न पत्र लीक मामले को लेकर केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान से त्याग-पत्र और शिक्षा संबंधी अन्य मांगों को लेकर दिल्ली में आन्दोलन शुरू कर दिया गया। 
इस सन्दर्भ में ही प्रसिद्ध सामाजिक शख्सियत सोनम वांगचुक ने 28 जून को अपना आमरण अनशन शुरू कर दिया था, जिसने विपक्षी पार्टियों के नेताओं और अन्य सामाजिक कार्यकर्ताओं का ध्यान आकर्षित किया था। लगातार यह घटनाक्रम दिल्ली में केन्द्र बिन्दू बना रहा था। संसद के मानसून सत्र के शुरू होते अभिजीत दीपके और उनके साथियों ने उन्हें मिल रहे भारी समर्थन के दृष्टिगत ‘संसद चलो’ मार्च की घोषणा कर दी थी। 20 जुलाई को इस मार्च में भारी संख्या में युवा इकट्ठे हो गए थे। उन्होंने सुरक्षा बलों द्वारा संसद के आस-पास लगाए गए सभी अवरोधों को तोड़ दिया था और एक बड़ी भीड़ संसद के निकट पहुंच गई थी। पुलिस की ओर से इसे सख्ती से रोका गया और पैदा हुई गड़बड़ में ज्यादातर युवाओं के साथ-साथ पुलिस कर्मचारी भी बुरी तरह घायल हो गए थे। इससे पहले आमरण अनशन के 21वें दिन वांगचुक को उठा कर स़फदरजंग अस्पताल में भर्ती करवा दिया गया था। व्यापक स्तर पर हुई हिंसा के लिए दोनों ही पक्ष एक-दूसरे को आरोपी ठहरा रहे हैं। जहां तक नीट पेपरों के लीक होने का संबंध है, यह समाचार आते ही सरकार द्वारा तुरंत कार्यवाही करके इससे संबंधित 13 लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया था। उसके बाद बड़े कड़े सुरक्षा प्रबंधों के तहत पुन: नीट परीक्षा करवाने की लम्बी-चौड़ी कवायद की गई थी और उसके बाद पारदर्शी ढंग से बिना देरी किए इसके परिणाम घोषित कर दिए गए थे। संसद चलने के दूसरे दिन विपक्षी पार्टियों ने इस मामले को लेकर चर्चा की मांग की और दूसरे दिन भी हुए बड़े हंगामे के कारण लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाहियां न चल सकी। चाहे केन्द्र सरकार के आमंत्रण पर कॉकरोच जनता पार्टी के दो नेता केन्द्रीय मंत्री जे.पी. नड्डा से मिले थे परन्तु इसके बावजूद सोनम वांगचुक ने अस्पताल में अपनी 24वें दिन भी भूख हड़ताल जारी रखी। अभिजीत दीपके और उनके साथियों ने भी धर्मेन्द्र प्रधान के त्याग-पत्र की मांग को लेकर आगामी समय में आन्दोलन जारी रखने की घोषणा कर दी है। जिस तरह का माहौल बन रहा है, उससे मौजूदा समय में तो कोई हल निकलता दिखाई नहीं दे रहा, न ही बनी ऐसी अनिश्चितता वाली स्थिति में सरकारी पक्ष और  विपक्षी पार्टियों का आपस में कोई तालमेल बनना सम्भव प्रतीत होता है।
इस संबंध में राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने भी प्रधानमंत्री के आवास के समक्ष धरना शुरू कर दिया था और उनकी ओर से यह भी दोहराया गया कि जब तक धर्मेन्द्र प्रधान का त्याग-पत्र नहीं लिया जाता, तब तक वह अपना विरोध निरन्तर जारी रखेंगे। बाद में पुलिस ने राहुल गांधी, समाजवादी पार्टी के नेता अखिलेश यादव सहित कांग्रेस के और कई नेताओं को बसों में भर कर वहां से कहीं दूर भेज दिया और धरना उठवा दिया। हम समझते हैं कि इस बने जड़ता को तोड़ने के लिए सरकारी पक्ष को पहल करनी चाहिए। यदि इस मामले पर विपक्ष दोनों सदनों में बहस करवाने की मांग पर अडिग हुआ है, तो इसकी स्वीकृति दी जानी चाहिए, ताकि इस गम्भीर मामले पर सभी पक्ष अपने-अपने विचार रख सकें और मामला सड़कों पर आन्दोलन करने की बजाए संसद में विस्तारपूर्वक विचार करके इसका कोई सन्तोषजनक हल निकालने का यत्न किया जाए।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

#संसदीय कार्यवाही का चलना ज़रूरी