एक बूढ़े की वसीयत
बुढ़ा मर रहा है, और अपनी वसीयत लिख रहा है। बड़ा प्रतिभावान था यह बूढ़ा और बड़ा मेहनती। दिन को कभी उसने दिन नहीं समझा और रात को रात नहीं। नतीजा ठनठन गोपाल। उसने कहा, यह मेहनत नहीं जुनून है। जुनून की तो इज्ज़त करनी चाहिए, लेकिन क्या बैजू बावरा की किसी ने इज्ज़त की? अकबर का नवरत्न तो तानसेन ही रहा था। सुदामा अपनी पोटली में सत्तू बांध कर बचपन के दोस्त श्री कृष्ण से मिलने चला गया। शोभा उसकी है जिसने राजगद्दी से उतर कर उसके सत्तू खा लिये। भीलनी अपने श्री राम के आने की प्रतीक्षा में चख चख कर मीठे बेरों का खजाना रखती रही। श्री राम आये। उन्होंने जूठे मीठे बेर खा लिये। आह कितनी महानता। हम शिर-नत हैं लेकिन यादों के एक कोने में बैठी है भीलनी जो इतने बरसों से अपने राम के लिए बेर इकट्ठे करती रही। हमारे टूटे हुए स्कूल में फटे टाटों पर बिठा कर गुरु जी ने हमें जो पढ़ाया, वह तो आज कहीं दिखायी भी नहीं देता। गुरु जी कहते थे, मेहनत ही अंतिम सत्य है। जिसने की मेहनत उसके बने कर्म अर्थात उसके कर्म सार्थक हुए।
लेकिन शॉर्टकट की इस दुनिया में आज मेहनत को कौन पूछता है? हमने देखा है आजकल तो डॉक्टर की डिग्रियां भी मानद बिकने लगी हैं। कहीं-कहीं तो इनकी सेल भी लग गई। एक पति के साथ बीवी की डिग्री फ्री। पहले आओ पहले पाओ। कहीं-कहीं तो पढ़ाई से ड्रॉप आऊट भी इन डिग्रियों का वरण किए घूमते हैं। ज्ञान नहीं था, अशुद्ध लिखा जाता था। चिन्ता न कीजिये, अब बनावटी मेधा के उपकरण आ गए हैं। आपकी भाषा शुद्ध कर देंगे। वैसे आजकल अशुद्ध लिखना फैशन भी हो गया है। इससे मौलिकता झलकती है, उन्होंने हमें बताया। लेकिन लिखने की ज़रूरत क्या है? आजकल पता चला है हर आदमी ज़िन्दगी में एक न एक किताब अपने नाम से अवश्य लिखना चाहता है। जेब में दाम हैं न, घुट्टी में लिखने की योग्यता की क्या ज़रूरत? बहुत से फाक़ाकश लेखक अपनी कलम का बाज़ार सजाये बैठे हैं। पैसा फैंकों, किताब लिखवाओ। इतना ही क्यों, पैसा फैंकों और इसकी गोष्ठी भी करवाओ। इनाम इकराम की चाह है, अभिनन्दन करवाने की चाह है। जुगाड़ संस्थाएं बैठी हैं। माया भी महाठगिनी में जानी। वह आदमी को साधारण से शीर्ष पुरुष बनाये, उसकी खबर छपवाये। उसका चित्र मीडिया में फ्लैश करवाये।
अरे इसके लिए अब तो बाकायदा जन-सम्पर्क अधिकारी भी रखे जाने लगे हैं। जिनका काम ही आपको आदमी से एक अभिनन्दन बना देना है। अगर जेब का बजट इतना नहीं है तो किसी खबरची को मित्र बना लो। बस थोड़ी कीमत में भी आपके मिस्टर सुपरमैन होने की कहानी वह छपवा देगा लेकिन भाईजान एक और जमात भी पैदा हो गई है। जिसकी ज़िन्दगी का दर्शन है ‘बदनाम हुए तो क्या नाम न होगा।’ चुनाव करीब आ रहे हैं। आपको हर शहर में टीटू शट्टरां वाले जैसे लोग मिल जाएंगे, जिनका काम है हर चुनाव में उम्मीदवार बनना, और चुनाव हारना। हारने पर कह देते हैं, ‘भाई जान, हम सही बात बोलते हैं न। इसलिए हमारा परिवार भी हमें वोट नहीं देता। इसीलिए तो हम कहते हैं, दुनिया फानी है, आनी जानी है, इसलिए जितने चुनाव हारने हैं, हार लें। तेरे जैसे न रहे, तो चुनाव हारेगा कौन? सब नोटा हो जाएंगे।’
बूढ़ा वसीयत लिख रहा है, तो पाता है, उसके पास है ही क्या, अपने वारिसों के लिए छोड़ने के वास्ते। मिर्ज़ा गालिब तो फिर भी अपने बाद चन्द तस्वीरे बुतां चन्द हसीनों के खतूत छोड़ गये थे। उनके पास तो कुछ जले-भुने अनुभव हैं, जिनका खरीददार कोई नहीं। सब यही कहते हैं, ऐसी मूर्खता आजकल नहीं चलती, इस मूर्ख को गले कौन लगाये?
उनके लिए तो जनाब निदा फाजली साहिब भी कह गए हैं, ‘कोई हाथ भी न मिलायेगा, जो गले मिलोगे तपाक से, यह नये मिजाज़ का शहर है ज़रा फैसले से मिला करो।’ फासले का अर्थ जानते हो न! यह फासला मीलों का नहीं, आकाश पाताल का है। ज़माने ने नया सूत्र दिया है, जो आकाश पर हैं, वे सदा आकाश पर ही रहेंगे। वे नहीं, उनकी नाती-पौत्र भी वहीं रहेंगे। इसे परिवारवाद कहने की गुस्ताखी न करना और जो पाताल वासी हैं, उन्हें सदा पाताल में ही रहना है। उनके लिए मेंढकों का एक टोकरा आरक्षित है। जो मेंढक इस टोकरे से बाहर निकलने के लिए उछलता है, दूसरा उसकी टांग पकड़ कर नीचे घसीट लेता है और यह आकाश पाताल एक कर देने की बात आजकल न किया करो। इसमें से समतावाद की ध्वनि आने लगती है जिसे आजकल मरा हुआ दर्शन घोषित कर दिया गया है। आजकल तो वही स्वर्ण सूत्र है-यह एक अमीर देश है जहां गरीब बसते हैं। इसे नकारने की कोशिश न करना, नहीं तो अरबन नक्सली कह दिये जाओगे।



