सड़क पर हुड़दंग की राजनीति से राहुल को क्या हासिल होगा ?

राहुल गांधी को आश्चर्य है कि दुनिया भर में एंटी इनकम्बेंसी सत्ता की राजनीति का अनिवार्य आयाम रहा है लेकिन नरेन्द्र मोदी के राज में यह बेअसर है। इसके लिए उन्होंने ‘वोट चोरी’ और ‘चुनाव चोरी’ की थ्योरी भी बताई है। चूंकि चुनाव आयोग के जिम्मे ही मतदान की प्रक्रिया होती है, इसलिए उनकी नज़र में एंटी इनकम्बेंसी बेअसर होने का जवादेह मूल रूप से इलेक्शन कमीशन ही है। वे साफ-सुथरे चुनाव के लिए इलेक्शन कमीशन की ओर से शुरू की गई विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया में ही खोट बता रहे हैं। उनका सीधा आरोप है कि सरकार की मिलीभुगत से चुनाव आयोग ऐसे कदम उठा रहा है।
आरोप तो वह यह भी लगा चुके हैं कि एसआईआर के क्रम में जान-बूझकर वोटर लिस्ट से लोगों के नाम काटे जा रहे हैं। हालांकि चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को देश की सर्वोच्च अदालत ने सही करार दिया है पर राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस और उसके सहयोगी कई अन्य विपक्षी दल इसे लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क से संसद तक कोहराम मचाते रहे हैं। इस काम में अब आभासी दुनिया की उपज सीजेपी भी जेन जी की ताकत के सहारे मददगार बन कर उभरी है। इन दिनों  इन गैर भाजपाताकतों ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन शुरू कर दिया है। वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिए बिना मानने के तैयार नहीं हैं।
राहुल गांधी के अनुसार एंटी इनकम्बेंसी एक बुनियादी फैक्टर है। भारत में सत्ता परिवर्तन की यह बुनियादी ताकत रही है। इसका असर ऐसा रहा है कि बहुत जल्दी यह किसी भी सरकार के खिलाफ काम करने लगती है। यह किसी को नहीं बख्शती। वह अपनी दादी का उदाहरण देते हैं कि इंदिरा गांधी ने बांग्लादेश युद्ध जीता था और अपनी लोकप्रियता के चरम पर थीं। फिर भी एक-दो साल के अंदर उनके खिलाफ जबरदस्त एंटी इनकम्बेंसी पैदा हो गई। यही बात हर नेता और हर पार्टी के साथ होती है।
 दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में एंटी इनकम्बेंसी न होने जैसी बात नहीं होती। इसके बावजूद नरेंद्र मोदी के राज में ऐसा न होना उन्हें अबूझ पहेली लगता है। उनकी बातों का लब्बोलुआब यही है कि कोई न कोई तिकड़म ज़रूर है, जिसकी वजह से भाजपा सरकार के प्रति एंटी इनकम्बेंसी नहीं दिखाई देती है। उनका संदेह चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर है। उनका मानना है कि दोनों की मिलीभुगत से ही भारत में एंटी इनकम्बेंसी नहीं दिखती।
जानकारों के अनुसार राहुल गांधी एंटी इनकम्बेंसी को राजनीति का अनिवार्य आयाम बताते वक्त यह भूल जाते हैं कि 1947 से 1977 तक देश में लगातार कांग्रेस की ही सरकार बनती रही। यह भी कि उनके परिवार से ही पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनते रहे। बाद में राजीव गांधी भी उनके परिवार से ही पीएम बने। मौका तो सोनिया गांधी को भी मिला, लेकिन उन्होंने विवादों से बचने के लिए मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनवा दिया, जो 2014 तक सत्ता में रहे। आज़ादी के बाद से दर्जनों मुख्यमंत्रियों के खाते में यह उपलब्धि दर्ज है। कई तो 3 से भी ज्यादा बार लगातार मुख्यमंत्री बने हैं। हालिया उदाहरण दो मुख्यमंत्रियों का है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ही लगातार तीन बार मुख्यमंत्री रहीं। बिहार में नितीश कुमार को लगातार 20 साल मुख्यमंत्री रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। ओडिशा में नवीन पटनायक ने भी रिकॉर्ड बनाया था। तब एंटी इनकम्बेंसी की बात किसी ने क्यों नहीं की।
राहुल गांधी की एंटी इनकम्बेंसी वाली बात कुछ हद तक सही है पर यह उन्हीं नेताओं या पार्टियों पर लागू होती है, जिनके काम या नीतियां लोगों को पसंद नहीं आते। कई नेता अपनी छवि, कल्याणकारी योजनाओं, संगठनात्मक ताकत और विपक्ष की कमजोरी के कारण इसे पार कर जाते हैं। अगर नरेंद्र मोदी की सरकार पर एंटी इनकम्बेंसी का कोई खास असर नहीं दिखता तो इसका प्रथम दृष्टया यही मायना निकलता है कि उनके काम और भाजपा की नीतियों को लोगों का समर्थन मिल रहा है। जानकारों के अनुसार राहुल गांधी को सामने रख कर कांग्रेस सत्ता में आने की लगातार कोशिश करती रही है पर उसकी संगठनात्मक और नीतिगत कमजोरियां उसे कामयाब नहीं होने देतीं। कांग्रेस के संगठन की स्थिति तो यह है कि वहां एक ही परिवार (गांधी परिवार) की चलती है। इसके विपरीत जब भी आवाज उठी, उसे दबा दिया गया। साल 2020 में कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक आंतरिक चिट्ठी लिखकर संगठन की कमजोरी की ओर इशारा किया था। पार्टी के लगातार चुनावी पतन पर चिंता जताते हुए ऊपर से नीचे तक संगठनात्मक चुनाव कराने की मांग की गई थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
बिहार में ही कांग्रेस के बड़े नेता रहे शकील अहमद खां ने एसआईआर में कटे नामों के बाबत कहा था कि जिन 65 लाख लोगों के नाम कटे, उनमें 65 ने भी इसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं की। इसके बावजूद राहुल गांधी ने वोटर जागरूकता रैली निकाली। नतीजा सबने देख लिया। चुनाव आयोग और एसआईआर के बजाय कांग्रेस को अपनी दुर्गति की असल वजहों पर ध्यान देने की ज़रूरत है। यह भी सच है कि भाजपा का विकल्प बनने की राष्ट्रीय पार्टियों में से कांग्रेस में ही कूवत दिखती है पर उसे कामयाबी तभी मिलनी संभव है, जब वह जन भावना के अनुरूप अपनी नीतियां बनाए और आचरण करे। सिर्फ हंगामा खड़ा करने एवं सड़कों पर हुड़दंग मचाने से जनता कंधों पर नहीं बैठाने वाली।

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