मानव सभ्यता के विकास की इबारत है विश्वकर्मा पूजा
दीपावली के उल्लास और रोशनी के बीच कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को मनाई जाने वाली विश्वकर्मा पूजा भारतीय संस्कृति के उस विराट दर्शन का प्रतीक है, जिसमें श्रम को साधना, हुनर को साधक की पहचान और सृजन को ईश्वरीय अभिव्यक्ति माना गया है। गोवर्धन पूजा के साथ मनाया जाने वाला यह पर्व केवल देवी-देवताओं के पूजन तक सीमित नहीं है बल्कि उन हाथों, औजारों, मशीनों और तकनीकी कौशल के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है, जिनके सहारे मानव सभ्यता निरंतर विकास की नई इबारत लिखती आई है। यह दिन हमें बताता है कि किसी भी निर्माण की वास्तविक शक्ति केवल संसाधनों में नहीं, उसे आकार देने वाले मस्तिष्क, परिश्रम और सृजनात्मक संकल्प में निहित होती है।
भगवान विश्वकर्मा को सनातन परंपरा में देवताओं का शिल्पकार, वास्तुकला का आदि प्रवर्तक और दिव्य निर्माण-कला का अधिष्ठाता माना गया है। वे उस सृजनशील चेतना के प्रतीक हैं, जिसने कल्पना को आकार, विचार को संरचना और संकल्प को साकार रूप प्रदान किया। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की, तब उसे सुव्यवस्थित स्वरूप प्रदान करने का दायित्व विश्वकर्मा ने निभाया। इसीलिए उन्हें ब्रह्मांड का प्रथम अभियंता और देवशिल्पी कहा जाता है। उनका व्यक्तित्व केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं बल्कि विज्ञान, वास्तु, अभियांत्रिकी, तकनीकी दक्षता और कलात्मक उत्कृष्टता के समन्वय का प्रतीक भी है। भगवान विश्वकर्मा के प्राकट्य को लेकर विभिन्न पुराणों में अलग-अलग आख्यान मिलते हैं। एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु के नाभिकमल से ब्रह्मा प्रकट हुए और उनसे धर्म, धर्म से वास्तु तथा वास्तु से विश्वकर्मा की उत्पत्ति हुई। वहीं अन्य पौराणिक परंपराओं में उन्हें वसु प्रभास और भुवना का पुत्र बताया गया है। विभिन्न ग्रंथों में उनके स्वरूप और वंश परंपरा का अलग-अलग वर्णन मिलता है। इन आख्यानों का मूल भाव यही है कि विश्वकर्मा समस्त निर्माण-कला, शिल्पविद्या और तकनीकी ज्ञान के दिव्य स्रोत हैं। उन्होंने देवताओं के लिए ऐसे अस्त्र-शस्त्र, भवन, विमान और नगरों की रचना की, जिनकी कल्पनाशीलता और भव्यता आज भी विस्मय उत्पन्न करती है।
पौराणिक गाथाओं में विश्वकर्मा की अद्वितीय शिल्प प्रतिभा के अनेक उदाहरण मिलते हैं। देवराज इंद्र के वज्र का निर्माण महर्षि दधीचि की अस्थियों से किया जाना उनकी दिव्य निर्माण-कला से जुड़ा प्रसिद्ध प्रसंग है। भगवान शिव का त्रिशूल, भगवान विष्णु का सुदर्शन चक्र, यमराज का कालदंड और पुष्पक विमान जैसी अद्भुत रचनाएं भी उनसे संबंधित परंपराओं में वर्णित हैं। इनका प्रतीकात्मक अर्थ केवल असाधारण शिल्प कौशल नहीं बल्कि यह भी है कि तकनीकी सामर्थ्य का सर्वोच्च उद्देश्य लोककल्याण और धर्म की प्रतिष्ठा होना चाहिए। स्वर्गलोक की दिव्य संरचना, रावण की स्वर्णनगरी लंका, भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका और पांडवों की इंद्रप्रस्थ नगरी का निर्माण भी विश्वकर्मा की स्थापत्य प्रतिभा से जोड़ा जाता है। लंका की स्वर्णिम भव्यता, द्वारका की समुद्रतटीय संरचना और इंद्रप्रस्थ की अद्भुत वास्तुकला भारतीय पौराणिक कल्पना में उत्कृष्ट नगर नियोजन के प्रतीक हैं। इन कथाओं में केवल वैभव का चित्रण नहीं बल्कि मनुष्य की उस अनंत आकांक्षा की अभिव्यक्ति भी है जो प्रकृति, संसाधनों और तकनीकी ज्ञान के सहारे असंभव प्रतीत होने वाली कल्पनाओं को साकार करना चाहती है।
विश्वकर्मा पूजा की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें पूजा का केंद्र केवल मंदिर या प्रतिमा नहीं, मनुष्य के कार्य से जुड़े साधन भी होते हैं। कारखानों में मशीनों की सफाई और सजावट होती है, निर्माण स्थलों पर औजारों का पूजन किया जाता है, कार्यालयों में कम्प्यूटर और उपकरणों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है तथा परिवहन क्षेत्र में वाहनों की पूजा होती है। कारीगर अपनी छेनी, हथौड़ी और आरी को नमन करते हैं तो अभियंता अपनी मशीनों और तकनीकी उपकरणों के समक्ष शीश झुकाते हैं। कलम से ज्ञान रचने वाला व्यक्ति भी अपनी लेखनी को इसी सृजन परंपरा का हिस्सा मानता है। वस्तुत: यह पर्व उन सभी हाथों का अभिनंदन है, जो अपने कौशल से समाज की आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। भारतीय दर्शन में कर्म को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। श्रीमद्भगवद्गीता का कर्मयोग इसी विचार को प्रतिष्ठित करता है कि मनुष्य को निष्ठा, समर्पण और उत्तरदायित्व के साथ अपने कर्त्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। विश्वकर्मा पूजा इसी कर्मदर्शन का व्यावहारिक उत्सव है। यह सिखाती है कि कोई काम छोटा या बड़ा नहीं होता और किसी भी पेशे की गरिमा उसके स्वरूप से नहीं बल्कि उसे करने वाले व्यक्ति की ईमानदारी, दक्षता और समर्पण से निर्धारित होती है। श्रमिक के हाथों में थमा औजार हो अथवा वैज्ञानिक की प्रयोगशाला में रखा उपकरण, दोनों ही मानव विकास की यात्रा के अनिवार्य आधार हैं।




