खुशवंत सिंह साहित्य उत्सव और कुलवंत सिंह विर्क से जुड़ी यादें

मैं अपनी ज़िंदगी के तीन दशक दिल्ली में रहा हूं। दो-चार वर्ष को छोड़कर सभी ठिकाने इंडिया गेट के निकट होने के कारण (पंडारा पार्क, फिरोज़शाह रोड आदि) खुशवंत सिंह जैसे लेखक और पत्रकार मुझे अपना मानते थे। कसौली में होने वाला यह प्रसद्धि समारोह खुशवंत सिंह लिटरेरी फेस्टिवल खुशवंत सिंह के प्रशंसकों ने 2012 में  खुशवंत सिंह के जीवित रहते शुरू किया था। मेले का मतलब एक प्रसिद्ध लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह की याद और उनके साहित्यिक योगदान को समर्पित होता है, जिनका कसौली से गहरा नाता है या रहा है। तीन दिवसीय इस समारोह में देश-विदेश से जाने-माने लेखक, सांस्कृतिक और बौद्धिक इतिहासकार, कवि, पत्रकार, पर्यावरणविद और कलाकार हिस्सा लेते हैं। यहां किताबों पर चर्चा, कविता पाठ, पैनल डिस्कशन और विचार-विमर्श होते हैं। चील और देवदार के पेड़ों से घिरे कसौली क्लब का शांत माहौल इस साहित्यिक मेले को और भी खास बनाता है। आम पाठकों और साहित्य प्रेमियों के लिए विचारकों को सुनना और मिलना एक अच्छा अनुभव होता है। मैं खुशवंत सिंह का करीबी साथी रहा हूं जो अपने जीवित रहते हर गर्मियों में उनकी कसौली वाली कोठी में दो-तीन हफ्ते रहकर लिखने-पढ़ने का काम करता रहा हूं। उनके निधन के बाद उनके बेटे ने मुझे यह सुविधा दे रखी है, गायक मेले समेत। 
इस समय की शुरुआत साल 2012 में हुई थी। उस समय यह देश का एकमात्र साहित्यिक मेला था जो किसी जीवित लेखक के नाम पर शुरू किया गया था। इस साल इसका 15वां संस्करण 23 से 25 अक्तूबर तक हुआ। खराब स्वस्थ्य के कारण मैं खुद तो कसौली नहीं जा सका। इस तीन दिन के बौद्धिक और सांस्कृतिक मेले में कई तरह की गतिविधियां शामिल थीं। विभिन्न विषयों ऐतिहासिक, राजनीति, विदेश नीति, सिनेमा, पर्यावरण तथा समाज पर देश-विदेश के प्रसिद्ध लेखकों एवं चिन्तकों के बीच सीधी बहस तथा बातचीत हुई जो नोट करने वाली थी।  पर्यावरण संरक्षण (ग्रीन मिशन) मेले में हिस्सा लेने वाले हर वक्ता के नाम पर एक पौधा लगाया गया जो खुशवंत सिंह का मुख्य उद्देश्य था।
इस वर्ष की विशेष और नई उपलब्धि रहीं जिसने दर्शकों और श्रेताओं को मोह लिया, वह 15वें संस्करण का मुख्य विषय ‘द आर्ट ऑफ  डिसएग्रीमेंट’ (असहमति की कला) था। इसका उद्देशय यह संदेश देना था कि बिना कड़वाहट या निजी हमलों के, सम्मान के साथ विभिन्न विचारों पर खुल कर संवाद कैसे किया जाए। मुकुंद नरवणे की मौजूदगी में च्स्नशह्म्द्ग1द्गह्म् ङ्घशह्वठ्ठद्द ्यस्रुस्नज् नामक एक पहल शुरू की गई। 
इस बार देश-विदेश से 80 से ज़्यादा प्रसिद्ध लेखक, पूर्व डिप्लोमैट, पत्रकार और कलाकार कसौली पहुंचे। समकालीन मुद्दों पर चर्चा, सेना में एआई का बढ़ता इस्तेमाल, आधुनिक तकनीक, मानसिक स्वास्य और वर्तमान में निष्पक्ष रचना जैसे अहम विषयों पर सत्र हुए जो बहुत पसंद किए गए।
मेरी नज़र में विर्क की रचना
ताज़ा रचना मेरे साथ कुलवंत सिंह विर्क की किसी संक्षिप्त मुलाकात पर आधारित है। कुलवंत सिंह विर्क से मेरी पहली मुलाकात 1957 में नई दिल्ली के कनाट प्लेस स्थित यॉर्क रेस्टोरेंट में एम.एस. रंधावा की स्वागती पार्टी में हुई थी। रेस्टोरेंट में रंधावा साहिब ने विर्क को अपने साथ बिठा लिया। रंधावा साहिब सबके सलाम का जवाब देते रहे, लेकिन  विनम्रता से जवाब विर्क ही देते। पार्टी के बाद जब मैंने विर्क को अपना परिचय दिया कि मैं रंधावा के दफ्तर (आईसीएआर) में उप सम्पादक हूं तो विर्क ने बहुत संक्षेप में कहा, ‘मुझे पता है’। वहां गुरमुख सिंह जीत ने विर्क की एक नई कहानी की शुरुआत और अंत के बारे में तो विर्क ने तीव्र जवाब दिया, और कहा फिर वह अंत काट कर आरंभ रख लें। इस हाज़िर जवाबी से दोनों की बातचीत खुली और पहली मुलाकात में ही गहरी दोस्ती हो गई। जब उन्होंने अपनी कहानी ‘धरती हेठला बौलद’ पर फिल्म बनाकर दर्शकों को दिखाई तो आम लोग मुझे ऐसे बधाई देते जैसे यह मेरी रचना है। 20 मार्च, 1986 को विर्क को पक्षाघात (पैरालिसिस) का दौरा पड़ा तो और मैं ही उन्हें पीजीआई ले जाने वाला था। वह एक स्ट्रेचर पर बेबस पड़े थे और बोल नहीं पा रहे थे। मैं विर्क की हालत देख नहीं पा रहा था।  बीमारी की वजह से विर्क लंबे समय तक अपने घर में कैद रहे। बाद में बच्चे उन्हें अमरीका ले गए जहां बातचीत करने वालों के बिना वह और भी अकेले हो गए। कुलवंत विर्क की हालत क्या होगी, मैं ही जानता हूं। 24 दिसम्बर, 1987 को उनकी पत्नी हरबंस भाभी ने कनाडा से फोन करके बताया कि विर्क इस दुनिया से चले गए हैं। बाद में पता चला कि बेबसी की हालत में उन्होंने नींद की गोलियां खाकर अपने जीवन का अंत कर लिया था। अपनी कहानियों की किताब में विर्क ने लिखा था। 
पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला ने उनकी रचनाओं का 350 पन्नों का वह संग्रह प्रकाशित किया जिसमें 28 कहानियां और निबंध शामिल हैं। पंजाब कला परिषद की गैलरी में विर्क को पंजाब के प्रमुख निर्माताओं की कतार में सम्मानजनक स्थान दिया गया तो मैं डॉ. एम.एस रंधावा  का भी सदैव के लिए प्रशंसक हो गया जिन्होंने उन्हें भाई वीर सिंह, अमृता प्रीतम, मोहन सिंह माहिर और प्रो. पूरन की कतार में स्थान दिया। 
विर्क की कहानीकारी बिल्कुल संकोचवीं और यथार्थवादी थी। विभाजन से पहले और उसके दौरान वह पुनर्वास अधिकारी थे, जिसके कारण उन्होंने विभाजन के दर्द को बहुत करीब से देखा था। ‘ओपरी धरती’, ‘खब्बल’, ‘मुर्दे की ताकत’और ‘धरती हेठला बलद’ इस दौर की प्रमुख कहानियां हैं। बिना किसी हथियार या नारे के विर्क ने आम इंसानी फितरत और धरती और पानी के चिन्हों के ज़रिए समाज की सच्चाई को पेश किया, जिसकी वह बहुत तारीफ करते थे। 1965 में जब विर्क का दिल्ली तबादला हुआ तो वह पूसा रोड पर मेरे घर रहने आए। विर्क का स्वभाव गांव वालों जैसा था। वे बहुत कम खाते थे और बहुत चलते थे। देश के बंटवारे के समय विर्क परिवार शेखपुरा से करनाल और कुरुक्षेत्र में बस गया था और विर्क ने अपने इलाके के लोगों की जितनी हो सके मदद की।   कहानी लिखते समय वह जल्दबाजी नहीं करते थे। विर्क महिलाओं का बहुत सम्मान करते थे।

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