‘सुपर अल नीनो ’ से निपटने के लिए कितने तैयार हैं हम ?
अल नीनो के प्रभाव से दुनिया में पांच लाख लोगों की जान जोखिम में आ सकती है। भारत पर भी इसका बुरा प्रभाव दिखना शुरू हो गया है। 150 साल पहले इसके प्रकोप से विश्व में 6 करोड़ और हमारे देश में एक करोड़ तीन लाख लोग मरे थे। उसकी तुलना में ‘सुपर अल नीनो’ से निपटने के लिए दुनिया कहीं अधिक बेहतर ढंग से तैयार है, परन्तु क्या हम भी हैं? मौसम का मिज़ाज इस महीने कुछ अटपटा सा रहेगा। दिन का तापमान सामान्य से ज्यादा और रातें पिछले साल के नवम्बर से कुछ ज्यादा ही सर्द रहेंगी। हैदराबाद में मानसून बीतने के बीस दिन बीते कि बीते साल के इस महीने के मुकाबले पानी के टैंकरों की बुकिंग 233 फीसदी बढ़ गई। शहर को जलापूर्ति करने वाला सिंगूर जलाशय में बस 10 प्रतिशत जल बचा है। केंद्रीय जल आयोग मानता है कि देश के जलाशयों में पानी पिछले साल के मुकाबले 31 फीसदी कम है। कई जलाशयों में पानी आधे से थोड़ा ही ज्यादा है। मौसम विज्ञानियों के मुताबिक यह सब अल नीनो का असर है। चीन, जापान, इंडोनेशिया, सूडान हर जगह इसके असर दिखने लगे हैं। प्रशांत महासागर में तूफान बढ़े तो पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में समुद्र का जलस्तर सामान्य से 40 सेंटीमीटर ऊपर हो गया और आने वाले कुछ हफ्तों में यह जलस्तर और भी ऊपर जाएगा। इससे विपरीत अटलांटिक महासगर में चक्रवाती गतिविधियां कमज़ोर पड़ गई हैं। अल नीनो के प्रभाव से पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में मानसूनी बारिश 26 फीसदी कम हुई तो दक्षिणी हिस्से में 24 प्रतिशत। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक अल नीनो से बहुत अधिक प्रभावित हैं।
सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी के जोंग-सियोंग कुग और उनके साथियों ने जो अध्ययन प्रकाशित किया है, उसके अनुसार मौजूदा अल नीनो पहले से ज्यादा ताकतवर है, जिससे ऐसे बड़े बदलाव होने की आशंका अधिक है। अल नीनो और वैश्विक तपिश मिलकर जलवायु प्रणाली में इस तरह के क्लाइमेट-रिजीम शिफ्ट ला सकते हैं। जो दशकों या उससे अधिक समय तक बने रहते हैं। मतलब इस अल नीनो के बाद दुनिया के कुछ हिस्सों में जलवायु पहले जैसी कभी भी नहीं हो पाएगी। हमारी सभ्यता 20वीं सदी की जलवायु के अनुकूल ढल जाने की वजह से अचानक होने वाले बहुत बड़े जलवायु परिवर्तनों का सामना करना हमारे लिए महंगा और विनाशकारी साबित हो सकता है। मौसम विज्ञानियों की चेतावनी है कि अल नीनो की वजह से ज्यादा गर्मी पड़ेगी।
स्वतंत्र शोध प्रदाता रोडियम ग्रुप की एमिली ग्रोवर-कोपेक और उनकी टीम का 4,50,000 मौतों की आशंका, जो शिकागो यूनिवर्सिटी की क्लाइमेट इम्पैक्ट लैब की एक रिपोर्ट में पब्लिश हुआ है, दुनियाभर में पिछले तापमान में बहुत ज्यादा बढ़ोत्तरी से कितनी मौतें हुई हैं, इस अनुमान पर आधारित है। भारत और पाकिस्तान पर इसका खास असर पड़ सकता है। बूढ़े और बच्चे इस मामले में सर्वाधिक संवेदनशील वर्ग होंगे।
फरवरी 2026 में ही आने वाले अल नीनो का संकेत मिल गया था और अप्रैल 2026 तक इसके दुष्प्रभावों के साफ संकेत भी। देश में अल नीनो का असर खरीफ की बुवाई, जलाशयों के स्तर, भू-जल, ग्रामीण रोज़गार, खाद्य महंगाई, बिजली की मांग और सार्वजनिक स्वास्थ्य तक पहुंचेगा। मौसम संबंधी जोखिम का पहले आकलन करते हुए प्रभावित क्षेत्रों और आबादी की पहचान की जाए तथा कृषि, जल, ऊर्जा, स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा के लिए पहले से अलग-अलग कार्ययोजनाएं तैयार की जानी चाहिएं। (एजेंसी)

