सन्तान की लम्बी आयु का पर्व है अहोई अष्टमी


अहोई अष्टमी का पर्व दीपावली के आरम्भ होने की सूचना देता है। यह पर्व विशेष तौर पर माताओं द्वारा अपनी संतान की लम्बी आयु व स्वास्थ्य कामना के लिए किया जाता है। अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। जिन की संतान को शारीरिक कष्ट हो, स्वास्थ्य ठीक न रहता हो, बार-बार बीमार पड़ते हों या किसी भी कारण माता-पिता को अपने संतान की ओर से स्वास्थ्य व आयु की दृष्टि से चिंता बनी रहती हो, इस पर्व पर संतान की माता द्वारा समुचित व्रत व पूजा आदि का विशेष लाभ प्राप्त होता है तथा संतान स्वस्थ होकर दीर्घायु को प्राप्त करती है। जिन दंपतियों के पुत्र नहीं बल्कि पुत्री संतान है, वे भी अहोई माता की पूजा कर सकती हैं। संतान की कामना वाली महिलाएं भी यह व्रत रखकर अहोई माता से संतान प्राप्ति की प्रार्थना कर सकती हैं, लेकिन यह भी नियम है कि एक साल व्रत लेने के बाद आजीवन यह व्रत टूटना नहीं चाहिए। पहले धारणा थी कि सिर्फ सपूतों के लिए ही व्रत रखा जाता है। ऐसा नहीं है। आज के बदलते दौर में जब पुत्री भी माता पिता के लिए बराबर की मान्यता साकार करती है तो पुत्रियों के सुख सौभाग्य के लिए भी अहोई माता कृपालु होती हैं। अहोई माता के चित्रांकन में ज्यादातर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास सेह तथा उसके बच्चों की आकृतियां बना दी जाती हैं। उत्तर भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अहोई माता का स्वरूप वहां की स्थानीय परम्परा के अनुसार बनता है। सम्पन्न घर की महिलाएं चांदी की अहोई बनवाती हैं। जमीन पर गोबर से लीपकर कलश की स्थापना होती है। अहोई माता की पूजा करके उन्हें दूध-चावल का भोग लगाया जाता है। तत्पश्चात एक पाटे पर जल से भरा लोटा रखकर कथा सुनी जाती है। अहोई माता की पूजा के लिए गेरू से दीवार पर अहोई माता का चित्र बनाते हैं तथा साथ ही सेह और उसके बच्चों का चित्र भी बनाते हैं।  सन्ध्या में आरती के समय के उपरान्त मां का पूजन करने के बाद अहोई माता की कथा सुनते हैं।  पूजा के बाद सास-ससुर के पैर छूकर आशीर्वाद प्राप्त कर बाहर आकाश में दीपक अर्पित करके तारों की पूजा कर जल चढ़ाते हैं। तारों को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है। इस दौरान ओम जय अहोई माता का जाप भी करते हैं। अष्टमी का चांद देखने के उपरान्त व्रत पूजन पूरा हो जाता है और इसके पश्चात् व्रती को जल ग्रहण करके व्रत का समापन करना होता है। पूजा के उपरान्त इस दिन लाल धागे का रक्षा सूत्र बांधकर पुत्र अथवा पुत्री को दीर्घायु का आशीर्वाद देना चाहिए।कहा जाता है कि प्राचीन काल में एक साहूकार रहा करता था। साहूकार की पत्नी चंद्रिका बहुत गुणवती थी। साहूकार की बहुत संतानें थीं। वह अपने परिवार के साथ सुख से जीवन यापन कर रहा होता है। एक बार साहूकार की स्त्री घर की लीपा-पोती हेतु मिट्टी लेने खदान में जाती है और कुदाल से मिट्टी खोदने लगती है परन्तु उसी जगह एक सेह की मांद होती है और अचानक उस स्त्री के हाथ से कुदाल सेह के बच्चे को लग जाती है जिससे सेह के बच्चे की मृत्यु हो जाती है। इस घटना से साहूकार की पत्नी को बहुत दुख होता है। मन में पश्चाताप का भाव लिए वह घर लौट जाती है। कुछ दिनों बाद उसके अपने बच्चे की मृत्यु हो जाती है। अपने बच्चों की अकाल मृत्यु से पति-पत्नी दुखी रहने लगते हैं। बच्चे की शोक सभा में साहूकार की पत्नी विलाप करती हुई उन्हें बताती है कि उसने जान-बूझकर कभी कोई पाप नहीं किया लेकिन एक बार अनजाने में उससे एक सेह के बच्चे की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर औरतें साहूकार की पत्नी को दिलासा देती हैं और उसे अष्टमी माता की पूजा करने को कहती हैं। साहूकार की पत्नी दीवार पर अहोई माता और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर माता की पूजा करती है और अहोई मां से अपने अपराध की क्षमा-याचना करती है। तब मां प्रसन्न हो उनके बच्चे को नया जीवन प्रदान करती हैं, और उनकी शेष संतानों को दीर्घ आयु का वरदान देती हैं। तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रचलित हो गई। आज के समय में भी संस्कारशील माताओं द्वारा अपनी संतान की इष्ट कामना के लिए अहोई माता का व्रत रखा जाता है और सायंकाल अहोई माता की पूजा की जाती है तो निश्चित रूप से इसका शुभफल उनको मिलता है। संतान चाहे पुत्र हो या पुत्री, उसको भी निष्कंटक जीवन का सुख मिलता है। कार्तिक कृष्ण अष्टमी को महिलाएं अहोई अष्टमी के रूप में मनाती हैं। यह व्रत महिलाएं संतान की रक्षा, उसकी लंबी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की कामना के लिए रखती हैं। अहोई व्रत के दिन प्रात: उठकर स्नान करें और पूजा पाठ करके अपनी संतान की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन हेतु कामना करते हुए, व्रत का यह संकल्प करें— अहोई माता, मेरी संतान को दीर्घायु, स्वस्थ एवं सुखी रखें। अनहोनी को होनी बनाने वाली माता देवी पार्वती हैं इसलिए माता पार्वती की पूजा की जाती है (उर्वशी)

—रमेश सर्राफ धमोरा