हताश और निराश है देश का अन्नदाता


भारत देश जहां एक बड़ा वर्ग सिर्फ  और सिर्फ  किसानी पर ही निर्भर है, जहां अन्नदाता दिन-रात मेहनत करके अपने और अपने परिवार का भरण-पोषण करता है। देश की आर्थिक स्थिति और खरीददारी पर सीधा असर किसानों के आर्थिक जीवन का भी पड़ता है, पर यही किसान जो सबको अनाज उपलब्ध कराता है, खुद ही कई बार भूख,गरीबी और लाचारी के चलते जीवन भी समाप्त कर देता है। ये दुर्भाग्य है कि किसी कारण यदि किसान की फसल चौपट हो जाये तो किसान का बहुत नुकसान होता है और यदि कभी बंपर फसल हो जाये तो भी किसान का ही नुकसान होता है। बड़ी विडम्बना है कि खून-पसीना एक करने के बावजूद भी देश का अन्नदाता गरीबी से उबर ही नहीं पाता। ये अन्नदाता अगर अन्न उगाना ही बंद कर दे तो हम खाएंगे क्या? ये सवाल अगर हर इंसान स्वयं से पूछे तो नि:संदेह उत्तर डराने वाला ही मिलेगा। किसान अन्न उगाता है और ग्राहक उसे खरीदता है। ग्राहक और किसान के बीच एक कड़ी और आती है जिसे आढ़ती कहते हैं। अगर हम देखें तो यही पाएंगे कि किसान से जो सब्जी, अनाज उपभोक्ता तक पंहुचती है वो कई गुना अधिक कीमत की होती है। 
यही कारण है कि पूरे साल अन्न उगाने वाला किसान गरीबी के कारण आत्महत्या तक कर जाता है और आढ़ती धनवान हो जाता है। कई बार खुद का चार या पांच रुपये बेचा हुआ प्याज या कोई भी सब्जी को किसान कई गुना ज्यादा कीमत में खरीदता है। ये क्षण नि:संदेह किसान के लिए सबसे ज्यादा हताशा वाले होते हैं। किसानों की लगातार हो रही आत्महत्या इस तरह की कई हकीकत बताता है कि देश का अन्नदाता कितना हताश और निराश है। 2016 के आंकड़े जो अभी कुछ समय पहले ही जारी किए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार 2016 में कुल 11,370 किसानों ने खुदकुशी की अर्थात हर दिन लगभग 31 किसानों ने अपनी जीवन लीला समाप्त की है। इसमें सबसे ज्यादा आत्महत्या की खबर महारष्ट्र से आई। हालांकि 2015 के मुकाबले आत्महत्या के मामलों में कुछ कमी अवश्य आयी है परंतु फि र भी अगर अन्नदाता पैसे के अभाव में आत्महत्या करता है तो ये न केवल सरकार बल्कि समाज के लिए भी प्रश्न-चिन्ह ही है। हालांकि आत्महत्या के मामलों में कई व्यक्तिगत, पारिवारिक कारण भी होते हैं।कृषि प्रधान देश भारत जिसकी आधी से अधिक आबादी कृषि पर ही निर्भर है। देश का किसान अगर यूं ही दम तोड़ता रहा तो किसानी में किसका मन लगेगा और कौन अपने बच्चों को किसानी जैसे व्यवसाय में भेजेगा। किसान एक ऐसा मुद्दा है जिसकी आमदन ज्यादा करने का और जिसकी हालात सुधारने का वादा लगभग हर चुनावी रैली में होता है। किसान सबसे जरूरी अंग समाज का है तो यही इतना बेहाल, बेसहारा और हताश क्यों है, क्यों सबको भोजन मुहैय्या कराने वाला खुद के परिवार को भोजन नहीं करा पा रहा है। किसान हैं तो अन्न है, अन्न है तो जीवन है और अगर ये कड़ी ही टूट जाये तो क्या जीवन की कल्पना की जा सकती है। सोचने की जरूरत है और किसान को नए उपकरण, नई तकनीक, उच्च क्वालिटी का बीज, पानी की व्यवस्था, प्राकृतिक आपदा के समय हम सबके साथ की जरूरत है. अगर किसान ही नहीं रहेगा तो कैसे हम जिएंगे? यही प्रश्न होना चाहिए और किसान को बचाने की मुहिम में सबको साथ आना ही होगा।